जनवरी की एक शाम को एक ख़ुश-पोश नौजवान डेविस रोड से गुज़र कर माल रोड पर पहुँचा और चेरिंग क्रास का रुख़ कर के ख़िरामाँ-ख़िरामाँ पटरी पर चलने लगा। ये नौजवान अपनी तराश-ख़राश से ख़ासा फ़ैशनेबल मालूम होता था। लंबी-लंबी क़लमें, चमकते हुए बाल, बारीक-बारीक मूंछें गोया सुरमे की सलाई से बनाई गई हों। बादामी रंग का गर्म ओवरकोट पहने हुए जिस के काज में शरबती रंग के गुलाब का एक-आध खिला फूल अटका हुआ, सर पर सब्ज़ फ़्लैट हैट एक ख़ास अंदाज़ से टेढ़ी रखी हुई, सफ़ेद सिल्क का गुलूबंद गले के गिर्द लिपटा हुआ, एक हाथ कोट की जेब में, दूसरे में बेद की एक छोटी छड़ी पकड़े हुए जिसे कभी-कभी मज़े में आ के घुमाने लगता था।
ये हफ़्ते की शाम थी। भरपूर जाड़े का ज़माना। सर्द और तुंद हवा किसी तेज़ धार की तरह जिस्म पर आ के लगती थी मगर उस नौजवान पर उस का कुछ असर मालूम नहीं होता था। और लोग ख़ुद को गर्म करने के लिए तेज़ क़दम उठा रहे थे मगर उसे उस की ज़रूरत न थी जैसे इस कड़कड़ाते जाड़े में उसे टहलने में बड़ा मज़ा आ रहा हो।
उस की चाल ढाल से ऐसा बाँकपन टपकता था कि तांगे वाले दूर ही से देख कर सरपट घोड़ा दौड़ाते हुए उस की तरफ़ लपकते मगर वो छड़ी के इशारे से नहीं कर देता। एक ख़ाली टैक्सी भी उसे देख कर रुकी मगर उस ने नो थैंक यू कह कर उसे भी टाल दिया।
जैसे-जैसे वो माल के ज़्यादा बा-रौनक़ हिस्से की तरफ़ पहुँचता जाता था, उसकी चोंचाली बढ़ती जाती थी। वो मुँह से सीटी बजा के रक़्स की एक अंग्रेज़ी धुन निकालने लगा। इस के साथ ही उसके पाँव भी थिरकते हुए उठने लगे। एक दफ़ा जब आस-पास कोई नहीं था तो यकबारगी कुछ ऐसा जोश आया कि उसने दौड़ कर झूठ-मूठ बॉल देने की कोशिश की, गोया क्रिकेट का खेल हो रहा हो। रास्ते में वो सड़क आई जो लॉरेंस गार्डन की तरफ़ जाती थी मगर उस वक़्त शाम के धुंधलके और सख़्त कोहरे में उस बाग़ पर कुछ ऐसी उदासी बरस रही थी कि उसने उधर का रुख़ न किया और सीधा चेरिंग क्रॉस की तरफ़ चलता रहा।
मलिका के बुत के क़रीब पहुँच कर उसकी हरकात-ओ-सकनात में किसी क़दर मतानत आ गई। उसने अपना रूमाल निकाला जिसे जेब में रखने की बजाय उसने कोट की बाईं आस्तीन में उड़स रखा था और हल्के-हल्के चेहरे पर फेरा, ताकि कुछ गर्द जम गई हो तो उतर जाए। पास ही घास के एक टुकड़े पर कुछ अंग्रेज़ बच्चे बड़ी सी गेंद से खेल रहे थे। वो रुक गया और बड़ी दिलचस्पी से उनका खेल देखने लगा। बच्चे कुछ देर तक तो उसकी परवा किए बगै़र खेल में मसरूफ़ रहे मगर जब वो बराबर तके ही चला गया तो वो रफ़्ता-रफ़्ता शर्माने से लगे और फिर अचानक गेंद सँभाल कर हंसते हुए एक दूसरे के पीछे भागते हुए घास के उस टुकड़े ही से चले गए।
नौजवान की नज़र सीमेंट की एक ख़ाली बेंच पर पड़ी और वो उस पर आ के बैठ गया। उस वक़्त शाम के अंधेरे के साथ-साथ सर्दी और भी बढ़ती जा रही थी। उसकी ये शिद्दत ना-ख़ुशगवार न थी बल्कि लज़्ज़त परस्ती की तर्ग़ीब देती थी। शहर के ऐश-पसंद तब्क़े का तो कहना ही क्या, वो तो इस सर्दी में ज़्यादा ही खुल खेलता है। तन्हाई में बसर करने वाले भी इस सर्दी से वरग़लाए जाते हैं और वो अपने अपने कोनों खदरों से निकल कर महफ़िलों और मजमों में जाने की सोचने लगते हैं ताकि जिस्मों का क़ुर्ब हासिल हो। हुसूल-ए-लज़्ज़त की यही जुस्तुजू लोगों को माल पर खींच लाई थी और वो हस्ब-ए-तौफ़ीक़ रेस्तोरानों, काफ़ी हाउसों, रक़्स-गाहों, सिनेमाओं और तफ़रीह के दूसरे मक़ामों पर महज़ूज़ हो रहे थे।
माल रोड पर मोटरों, तांगों और बाई-साईकिलों का ताँता बंधा हुआ तो था ही, पटरी पर चलने वालों की भी कसरत थी। अलावा-अज़ीं सड़क की दो रूया दुकानों में ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त का बाज़ार भी गर्म था। जिन कम नसीबों को न तफ़रीह-ए-तब्अ की इस्तिताअत थी न ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त की, वो दूर ही से खड़े-खड़े इन तफ़रीह-गाहों और दुकानों की रंगा-रंग रौशनियों से जी बहला रहे थे।
नौजवान सीमेंट की बेंच पर बैठा अपने सामने से गुज़रते हुए ज़न-ओ-मर्द को ग़ौर से देख रहा था। उस की नज़र उन के चेहरों से कहीं ज़्यादा उन के लिबास पर पड़ती थी। उन में हर वज़्अ और हर क़िमाश के लोग थे। बड़े-बड़े ताजिर, सरकारी अफ़्सर, लीडर, फ़नकार, कॉलेजों के तलबा और तालिबात, नर्सें, अख़्बारों के नुमाइंदे, दफ़्तरों के बाबू। ज़्यादा-तर लोग ओवर कोट पहने हुए थे। हर क़िस्म के ओवर कोट, क़राक़ली के बेश-क़ीमत ओवर कोट से लेकर ख़ाली पट्टी के पुराने फ़ौजी ओवर कोट तक जिसे नीलामी में ख़रीदा गया था।
नौजवान का अपना ओवर कोट था तो ख़ासा पुराना मगर उसका कपड़ा ख़ूब बढ़िया था। फिर वो सिला हुआ भी किसी माहिर दर्ज़ी का था। उसको देखने से मालूम होता था कि उसकी बहुत देख-भाल की जाती है। कॉलर ख़ूब जमा हुआ था। बाहों की क्रीज़ बड़ी नुमायाँ, सिलवट कहीं नाम को नहीं। बटन सींग के बड़े-बड़े चमकते हुए। नौजवान उस में बहुत मगन मालूम होता था।
एक लड़का पान बीड़ी सिगरेट का सन्दूक़चा गले में डाले सामने से गुज़रा। नौजवान ने आवाज़ दी,
पान वाला!
जनाब!
दस का चेंज है?
है तो नहीं। ला दूँगा। क्या लेंगे आप?
नोट ले के भाग गया तो?
अजी वाह। कोई चोर-उचक्का हूँ जो भाग जाऊँगा। एतिबार न हो तो मेरे साथ चलिये। लेंगे क्या आप?
नहीं-नहीं, हम ख़ुद चेंज लाएगा। लो ये इकन्नी निकल आई। एक सिगरेट दे दो और चले जाओ।
लड़के के जाने के बाद मज़े-मज़े से सिगरेट के कश लगाने लगा। वो वैसे ही बहुत ख़ुश नज़र आता था। सिगरेट के धुएँ ने उस पर सुरूर की कैफ़ियत तारी कर दी।
एक छोटी सी सफ़ेद रंग बिल्ली सर्दी में ठिठुरी हुई बेंच के नीचे उस के क़दमों में आ कर म्याऊँ-म्याऊँ करने लगी। उसने पुचकारा तो उछल कर बेंच पर आ चढ़ी। उसने प्यार से उस की पीठ पर हाथ फेरा और कहा, पूअर लिटिल सोल।
इस के बाद वो बेंच से उठ खड़ा हुआ और सड़क को पार करके उस तरफ़ चला जिधर सिनेमा की रंग-बिरंगी रौशनियाँ झिलमिला रही थीं। तमाशा शुरू हो चुका था। बरामदे में भीड़ न थी। सिर्फ़ चंद लोग थे जो आने वाली फिल्मों की तस्वीरों का जाएज़ा ले रहे थे। ये तस्वीरें छोटे-बड़े कई बोर्डों पर चस्पाँ थीं। उनमें कहानी के चीदा-चीदा मनाज़िर दिखाए गए थे।
तीन नौजवान ऐंग्लो इंडियन लड़कियाँ उन तस्वीरों को ज़ौक़-ओ-शौक़ से देख रही थीं। एक ख़ास शान-ए-इस्ति़ग़ना के साथ मगर सिन्फ़-ए-नाज़ुक का पूरा-पूरा एहतिराम मल्हूज़ रखते हुए वो भी उन के साथ-साथ मगर मुनासिब फ़ासले से उन तस्वीरों को देखता रहा। लड़कियाँ आपस में हंसी-मज़ाक़ की बातें भी करती जाती थीं और फ़िल्म पर राय-ज़नी भी। इतने में एक लड़की ने, जो अपनी साथ वालियों से ज़्यादा हसीन भी थी और शोख़ भी, दूसरी लड़की के कान में कुछ कहा जिसे सुन कर उसने एक क़हक़हा लगाया और फिर वो तीनों हंसती हुई बाहर निकल गईं। नौजवान ने उसका कुछ असर क़ुबूल न किया और थोड़ी देर के बाद वो ख़ुद भी सिनेमा की इमारत से बाहर निकल आया।
अब सात बज चुके थे और वो माल की पटरी पर फिर पहले की तरह मटर-गश्त करता हुआ चला जा रहा था। एक रेस्तोराँ में आर्केस्ट्रा बज रहा था। अंदर से कहीं ज़्यादा बाहर लोगों का हुजूम था। उनमें ज़्यादा-तर मोटरों के ड्राईवर, कोचवान, फल बेचने वाले, जो अपना माल बेच के ख़ाली टोकरे लिये खड़े थे। कुछ राहगीर जो चलते-चलते ठहर गए थे। कुछ मज़दूरी पेशा लोग थे और कुछ गदागर। ये अंदर वालों से कहीं ज़्यादा गाने के रसिया मालूम होते थे क्योंकि वो ग़ुल-ग़पाड़ा नहीं मचा रहे थे बल्कि ख़ामोशी से नग़मा सुन रहे थे। हालाँकि धुन और साज़ अजनबी थे। नौजवान पल भर के लिए रुका और फिर आगे बढ़ गया।
थोड़ी दूर चल के उसे अंग्रेज़ी मौसीक़ी की एक बड़ी सी दुकान नज़र आई और वो बिला-तकल्लुफ़ अन्दर चला गया। हर तरफ़ शीशे की अलमारियों में तरह-तरह के अंग्रेज़ी साज़ रखे हुए थे। एक लंबी मेज़ पर मग़रिबी मौसीक़ी की दो-वर्क़ी किताबें चुनी थीं। ये नए चलनतर गाने थे। सर-वरक़ ख़ूबसूरत रंग-दार मगर धुनें घटिया। एक छिछलती हुई नज़र उन पर डाली फिर वहाँ से हट आया और साज़ों की तरफ़ मुतवज्जेह हो गया। एक हस्पानवी गिटार पर, जो एक खूँटी से टंगी हुई थी, नाक़िदाना नज़र डाली और उसके साथ क़ीमत का जो टिकट लटक रहा था उसे पढ़ा। उससे ज़रा हट कर एक बड़ा जर्मन पियानो रखा हुआ था। उसका कोर उठा के उंगलियों से बाज़ पर्दों को टटोला और फिर कवर बंद कर दिया।
पियानो की आवाज़ सुन कर दुकान का एक कारिंदा उसकी तरफ़ बढ़ा।
गुड इवनिंग सर। कोई ख़िदमत?
नहीं शुक्रिया। हाँ इस महीने की ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डों की फ़ेहरिस्त दे दीजिये।
फ़ेहरिस्त ले के ओवर कोट की जेब में डाली। दुकान से बाहर निकल आया और फिर चलना शुरू कर दिया। रास्ते में एक छोटा सा बुक स्टॉल पड़ा। नौजवान यहाँ भी रुका। कई ताज़ा रिसालों के वरक़ उल्टे। रिसाला जहाँ से उठाता बड़ी एहतियात से वहीं रख देता। और आगे बढ़ा तो क़ालीनों की एक दुकान ने उसकी तवज्जोह को जज़्ब किया। मालिक-ए-दुकान ने जो एक लंबा सा चोग़ा पहने और सर पर कुलाह रखे था। गर्मजोशी से उसकी आव-भगत की।
ज़रा ये ईरानी क़ालीन देखना चाहता हूँ। उतारिये नहीं यहीं देख लूँगा। क्या क़ीमत है इसकी?
चौदह सौ तीस रुपये है।
नौजवान ने अपनी भवों को सिकोड़ा जिस का मतलब था, ओहो इतनी।
दुकानदार ने कहा, आप पसंद कर लीजिये। हम जितनी भी रियायत कर सकते हैं कर देंगे।
शुक्रिया, लेकिन इस वक़्त तो मैं सिर्फ़ एक नज़र देखने आया हूँ।
शौक़ से देखिये। आप ही की दुकान है।
वो तीन मिनट के बाद उस दुकान से भी निकल आया। उसके ओवर कोट के काज में शरबती रंग के गुलाब का जो अध-खिला फूल अटका हुआ था, वो उस वक़्त काज से कुछ ज़्यादा बाहर निकल आया था। जब वो उस को ठीक कर रहा था तो उस के होंठों पर एक ख़फ़ीफ़ और पुर-असरार मुस्कुराहट नुमूदार हुई और उसने फिर अपनी मटर-गश्त शुरू कर दी।
अब वो हाईकोर्ट की इमारतों के सामने से गुज़र रहा था। इतना कुछ चल लेने के बाद उसकी फ़ित्री चोंचाली में कुछ फ़र्क़ नहीं आया। न तकान महसूस हुई थी न उकताहट। यहाँ पटरी पर चलने वालों की टोलियाँ कुछ छट सी गई थीं और उन में काफ़ी फ़ासला रहने लगा था। उसने अपनी बेद की छड़ी को एक उंगली पर घुमाने की कोशिश की मगर कामयाबी न हुई और छड़ी ज़मीन पर गिर पड़ी, ओह सॉरी कह कर ज़मीन पर झुका और छड़ी को उठा लिया।
इस अस्ना में एक नौजवान जोड़ा जो उसके पीछे पीछे चला आ रहा था उसके पास से गुज़र कर आगे निकल आया। लड़का दराज़-क़ामत था और सियाह कॉडराए की पतलून और ज़िप वाली चमड़े की जैकेट पहने था और लड़की सफ़ेद साटिन की घेरदार शलवार और सब्ज़ रंग का कोट। वो भारी भरकम सी थी। उसके बालों में एक लंबा सा सियाह चुटला गुंधा हुआ था जो उसकी कमर से नीचा था। लड़की के चलने से उस चुटले का फुंदना उछलता कूदता पै-दर-पै उस के फ़र्बा जिस्म से टकराता था। नौजवान के लिये जो अब उनके पीछे-पीछे आ रहा था ये नज़ारा ख़ासा जाज़िब-ए-नज़र था। वो जोड़ा कुछ देर तक तो ख़ामोश चलता रहा। उसके बाद लड़के ने कुछ कहा जिस के जवाब में लड़की अचानक चमक कर बोली,
हरगिज़ नहीं। हरगिज़ नहीं। हरगिज़ नहीं।
सुनो मेरा कहना मानो, लड़के ने नसीहत के अंदाज़ में कहा, डॉक्टर मेरा दोस्त है। किसी को कानों कान ख़बर न होगी।
नहीं, नहीं, नहीं।
मैं कहता हूँ तुम्हें ज़रा तकलीफ़ न होगी।
लड़की ने कुछ जवाब न दिया।
तुम्हारे बाप को कितना रंज होगा। ज़रा उनकी इज़्ज़त का भी तो ख़याल करो।
चुप रहो वर्ना मैं पागल हो जाऊँगी।
नौजवान ने शाम से अब तक अपनी मटर-गश्त के दौरान में जितनी इंसानी शक्लें देखी थीं उनमें से किसी ने भी उसकी तवज्जोह को अपनी तरफ़ मुनअतिफ़ नहीं किया था। फ़िल-हक़ीक़त उनमें कोई जाज़बियत थी ही नहीं। या फिर वो अपने हाल में ऐसा मस्त था कि किसी दूसरे से उसे सरोकार ही न था मगर उस दिलचस्प जोड़े ने जिस में किसी अफ़साने के किरदारों की सी अदा थी, जैसे यकबारगी उसके दिल को मोह लिया था और उसे हद दर्जा मुश्ताक़ बना दिया कि वो उनकी और भी बातें सुने और हो सके तो क़रीब से उनकी शक्लें भी देख ले।
उस वक़्त वो तीनों बड़े डाकखाने के चौराहे के पास पहुँच गए थे। लड़का और लड़की पल भर को रुके और फिर सड़क पार कर के मैक्लोड रोड पर चल पड़े। नौजवान माल रोड पर ही ठहरा रहा। शायद वो समझता था कि फ़िलफ़ौर उनके पीछे गया तो मुम्किन है उन्हें शुबह हो जाए कि उनका तआक़ुब किया जा रहा है। इसलिए उसे कुछ लम्हे रुक जाना चाहिये।
जब वो लोग कोई सौ गज़ आगे निकल गए तो उस ने लपक कर उनका पीछा करना चाहा मगर अभी उसने आधी ही सड़क पार की होगी कि ईंटों से भरी हुई एक लारी पीछे से बगूले की तरह आई और उसे रौंदती हुई मैक्लोड रोड की तरफ़ निकल गई। लारी के ड्राईवर ने नौजवान की चीख़ सुन कर पल भर के लिए गाड़ी की रफ़्तार कम की। फिर वो समझ गया कि कोई लारी की लपेट में आ गया और वो रात के अंधेरे से फ़ायदा उठाते हुए लारी को ले भागा। दो-तीन राहगीर जो इस हादसे को देख रहे थे शोर मचाने लगे कि नंबर देखो नंबर देखो मगर लारी हवा हो चुकी थी।
इतने में कई और लोग जमा हो गए। ट्रैफ़िक का एक इन्सपेक्टर जो मोटर साइकिल पर जा रहा था रुक गया। नौजवान की दोनों टांगें बिल्कुल कुचली गई थीं। बहुत सा ख़ून निकल चुका था और वो सिसक रहा था।
फ़ौरन एक कार को रोका गया और उसे जैसे तैसे उस में डाल कर बड़े हस्पताल रवाना कर दिया गया। जिस वक़्त वो हस्पताल पहुँचा तो उस में अभी रमक़ भर जान बाक़ी थी। इस हस्पताल के शोबा-ए-हादिसात में अस्सिटेंट सर्जन मिस्टर ख़ान और दो नौ-उम्र नर्सें मिस शहनाज़ और मिस गुल ड्यूटी पर थीं। जिस वक़्त उसे स्ट्रेचर पर डाल के ऑप्रेशन रुम में ले जाया जा रहा था तो उन नर्सों की नज़र उस पर पड़ी। उस का बादामी रंग का ओवर कोट अभी तक उस के जिस्म पर था और सफ़ेद सिल्क का मफ़लर गले में लिपटा हुआ था। उसके कपड़ों पर जा-बजा ख़ून के बड़े-बड़े धब्बे थे। किसी ने अज़-राह-ए-दर्दमंदी उसकी सब्ज़ फ़्लैट हैट उठा के उसके सीने पर रख दी थी ताकि कोई उड़ा न ले जाए।
शहनाज़ ने गुल से कहा,
किसी भले घर का मालूम होता है बेचारा।
गुल दबी आवाज़ में बोली, ख़ूब बन ठन के निकला था बेचारा हफ़्ते की शाम मनाने।
ड्राइवर पकड़ा गया या नहीं?
नहीं भाग गया।
कितने अफ़सोस की बात है।
ऑप्रेशन रुम में अस्सिटेंट सर्जन और और नर्सें, चेहरों पर जर्राही के नक़ाब चढ़ाए, जिन्होंने उन की आँखों से नीचे के सारे हिस्से को छुपा रखा था, उसकी देख भाल में मसरूफ़ थे। उसे संग-ए-मर-मर की मेज़ पर लिटा दिया गया। उसने सर में जो तेज़ ख़ुशबूदार तेल डाल रखा था, उसकी कुछ महक अभी तक बाक़ी थी। पट्टियाँ अभी तक जमी हुई थीं। हादसे से उसकी दोनों टांगें तो टूट चुकी थीं मगर सर की मांग नहीं बिगड़ने पाई थी।
अब उसके कपड़े उतारे जा रहे थे। सब से पहले सफ़ेद सिल्क गुलूबंद उसके गले से उतारा गया। अचानक नर्स शहनाज़ और नर्स गुल ने ब-यक-वक़्त एक दूसरे की तरफ़ देखा। इससे ज़्यादा वो कर भी क्या सकती थीं। चेहरे जो दिली कैफ़ियात का आइना होते हैं, जर्राही के नक़ाब तले छुपे हुए थे और ज़बानें बंद।
नौजवान के गुलूबंद के नीचे नेक-टाई और कालर क्या सिरे से क़मीस ही नहीं थी… ओवरकोट उतारा गया तो नीचे से एक बोसीदा ऊनी स्वेटर निकला जिसमें जा बजा बड़े बड़े सूराख़ थे। उन सूराख़ों से स्वेटर से भी ज़्यादा बोसीदा और मैला कुचैला एक बनियान नज़र आ रहा था। नौजवान सिल्क के गुलूबंद को कुछ इस ढब से गले पर लपेटे रखता था कि उसका सारा सीना छुपा रहता था। उसके जिस्म पर मैल की तहें भी ख़ूब चढ़ी हुई थीं। ज़ाहिर होता था कि वो कम से कम पिछले दो महीने से नहीं नहाया, अलबत्ता गर्दन ख़ूब साफ़ थी और उस पर हल्का हल्का पॉउडर लगा हुआ था। स्वेटर और बनियान के बाद पतलून की बारी आई और शहनाज़ और गुल की नज़रें फिर ब-यक-वक़्त उठीं। पतलून को पेटी के बजाए एक पुरानी धज्जी से जो शायद कभी नेक-टाई रही होगी ख़ूब कस के बांधा गया था। बटन और बकसुवे ग़ायब थे। दोनों घुटनों पर से कपड़ा मसक गया था और कई जगह खोंचें लगी थीं मगर चूँकि ये हिस्से ओवर कोट के नीचे रहते थे इसलिए लोगों की उन पर नज़र नहीं पड़ती थी। अब बूट और जुराबों की बारी आई और एक मर्तबा फिर मिस शहनाज़ और मिस गुल की आँखें चार हुईं। बूट तो पुराने होने के बावजूद ख़ूब चमक रहे थे मगर एक पाँव की जुराब दूसरे पाँव की जुराब से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ थी। फिर दोनों जुराबें फटी हुई भी थीं, इस क़दर कि उन में से नौजवान की मैली मैली एड़ियाँ नज़र आ रही थीं। बिला-शुब्हा उस वक़्त तक वो दम तोड़ चुका था। उसका जिस्म संग-ए-मर-मर की मेज़ पर बेजान पड़ा था। उसका चेहरा जो पहले छत की सम्त था। कपड़े उतारने में दीवार की तरफ़ मुड़ गया। मालूम होता था कि जिस्म और उसके साथ रूह की बरहनगी ने उसे ख़जिल कर दिया है और वो अपने हम-जिंसों से आँखें चुरा रहा है।
उसके ओवरकोट की मुख़्तलिफ़ जेबों से जो चीज़ें बरामद हुईं वो ये थीं,
एक छोटी सी सियाह कंघी, एक रूमाल, साढे़ छः आने, एक बुझा हुआ सिगरेट, एक छोटी सी डायरी जिसमें नाम और पते लिखे थे। नए ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डों की एक माहाना फ़ेहरिस्त और कुछ इश्तिहार जो मटर-गश्त के दौरान इश्तिहार बाँटने वालों ने उसके हाथ में थमा दिये थे और उसने उन्हें ओवर कोट की जेब में डाल दिया था।
अफ़सोस कि उसकी बेद की छड़ी जो हादिसे के दौरान में कहीं खो गई थी उस फ़ेहरिस्त में शामिल न थी।
٭٭٭
इंसान अपने ऊपरी रंग–ओ–रूप के अलावा भी कुछ है, वो महज़ धोखा और छलावा नहीं है. मगर हमने जो दुनिया बनाई है, वहां उसको बहुत हद तक इस बात पर मजबूर किया है कि वो ऊपर से हमारी तरह नज़र आये, हमें अपने से अलग दिखने वाले लोग गंदे, वहशी और कुरूप मालूम होते हैं. हम उनसे चिढ़ते हैं और कई बार उन्हें देखना भी पसंद नहीं करते, इसलिए अक्सर लोगों की ज़िन्दगी अपने असली सच को छुपाने में गुज़र जाती है, अंदर अंदर उनका सच और मैला और चीकट होता जाता है और ऊपर ऊपर वो इस दुनिया में अपने झूठ की चमक और भरम के साथ जिए चले जाते हैं और ये सच तब तक सामने नहीं आता जब तक कोई भयानक हादसा उसे अचानक किसी शाम बे–नक़ाब न कर दे. कहानी में उर्दू के मुश्किल अल्फ़ाज़ के मानी नहीं दिए गए हैं, जो दोस्त उन्हें मालूम करना चाहते हैं, वो गूगल की मदद ले सकते हैं. शुक्रिया!
ग़ुलाम अब्बास (1909-1982) उर्दू के मशहूर और बे–हद अहम कहानीकारों में से एक हैं. कहा जा सकता है कि उनकी कहानियों में आनंदी के बाद अगर कोई कहानी सबसे ज़्यादा मशहूर हुई तो वो ओवरकोट ही थी. इस कहानी को हिंदी के पढ़ने वालों तक पहुंचा कर हमें ख़ुशी हो रही है.
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