हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ लिखने की सहूलत इतनी ज़्यादा है कि इसके लिए पढ़ने को ही बहुत हद तक ‘ग़ैर ज़रूरी‘ समझ लिया गया है। हमारे आस पास किताबें जितनी तादाद में बिक रही हैं, उन पर जितनी बात हो रही है, जितनी रीलें बन रही हैं, उतना उन्हें पढ़ा नहीं जा रहा है। पढ़ना एक कठिन काम है, ये अपनी बुनत में उतना क़ुदरती नहीं है, जितना कि खाना या सोना। मगर ऐसे संजीदा पाठकों की कमी नहीं है जो किताबों से इस रिश्ते को हर गुज़रते बरस के साथ मज़बूत कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ अदीबों और फ़नकारों से हम इस बार उनकी पसंद की किताबों के हवाले से सवाल कर रहे हैं। ओमा शर्मा हिंदी के मुमताज़ कहानीकार हैं, मगर वह अदब के अलावा दूसरे मैदानों की किताबें भी बारीकी और दिलचस्पी से पढ़ते हैं। यहाँ 2025 में उनकी पढ़ी गई कुछ किताबों के नाम उन्हीं के मुख़्तसर तब्सरों के साथ पेश किये जा रहे हैं। हमारी दरख़्वास्त पर उन्होंने इसे लिखा, इसके लिए हम उनके शुक्र-गुज़ार हैं। उम्मीद है आप दोस्त भी इससे फ़ायदा हासिल करेंगे। शुक्रिया!
– तसनीफ़ हैदर, सम्पादक ‘और‘
यूं ऐसे कभी गिना नहीं लेकिन मैं अंग्रेजी और हिंदी दोनों की किताबें शायद बराबर मात्रा में ही पढ़ता रहा हूं जिसका एक कारण, उपलब्धता के अलावा हिंदी अनुवादों पर उतने भरोसे का ना होना भी है। इसलिए अनुमोदित करने लायक किताबों की सूची में कुछ अंग्रेजी किताबें भी आएंगी। कहानी उपन्यासों के अलावा जीवनी और आत्मकथाओं को भी बराबर पसंद करता हूं। अच्छा कथेतर और कविताएं भी।
ये रही कुछ किताबें:
अगम बहै दरियाव:
चर्चित कथा लेखक शिवमूर्ति का यह उपन्यास आया तो पिछले वर्ष था लेकिन पढ़ना इसी वर्ष हुआ। यह पिछले पचास वर्षों की भारतीय ग्रामीण जीवन के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परतों, प्रगति और परेशानियों का दिलचस्प और दस्तावेजी उपन्यास है। लेखक ने जिस तरह के विभिन्न किरदारों और कथा स्थितियों को गढ़ा है और जिस तरह कानून और व्यवस्था के प्रश्नों को कथा के बीच पिरोया है, वह इसे विरल ऊंचाई प्रदान करता है।
शहर जो खो गया:
हमारे समय के ग़ालिबन सबसे उदार और सक्रिय चिंतक कवि विजय कुमार की यह किताब यूं तो मुंबई का शहरनामा है लेकिन मुंबई के बहाने विजय कुमार ने हमारे समय और उसकी जटिलताओं, परतों, अंतरविरोधों और विसंगतियों के बीच जो सुंदर और बेहतर की संभावना लिए है, जिसके साथ सामूहिक स्मृति की रेखाएं विन्यस्त रहती हैं, इसका एक बहुआयामी और शानदार लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। यह जितना मुम्बई शहर के वर्तमान को संबोधित है उतना ही शहर के अतीत और इतिहास को। और यह इतनी सहज संलग्नता से आया है, दोनों उस समावेशी संस्कृति का कंट्रास्ट रचते चलते हैं। वह चाहे फिल्मों या कला की दुनिया से ताल्लुक रखती हो या विभिन्न वर्गों और व्यक्तियों के आपसी संबंधों को लेकर। कई जगह एक वीतराग भी आ घेरता है लेकिन यह पाठक को कई तरह की दुनियाओं का कैलिडोसकोप दिखाते हुए उसे ऐसे अतःस्थलों पर जा छोड़ता है जिनका आस्वाद उसकी निगाह को कई स्तरों पर समृद्ध करता है।
हीरापुर मोक्षधाम:
युवा लेखिका ऊषा दशोरा के इस पहले कहानी संग्रह में कई गौरतलब कहानियां ध्यानाकर्षित करती हैं जिसमें शीर्षक कहानी के अलावा ‘रसबाली’ और ‘तुम्हारा रणवीर’ खासकर उल्लेखनीय हैं। ऊषा मानवीय जिंदगियों – स्त्री-पुरुष दोनों – के कई अल्प/अलक्षित कोनों को अपनी खास संवेदनात्मक भाषा में तरतीब देती हैं।
प्रेम में पेड़ होना:
जसिंता केरकेट्टा के इस कविता संग्रह की लगभग सभी कविताएं सुंदर और शानदार हैं। उसमें शिल्प की कोई जबरन कारीगरी नहीं की गई है। प्रेम के अहसास को बहुत गहरे और आधुनिक संदर्भों के साथ प्रेम से छूते हुए ही रचा गया है। कविताएं छोटे आकार की ही हैं इसलिए मन में और उतरती जाती हैं। जैसे, स्त्री :
उन्हें ऐसा लगता है वह घर संभालते हैं
पर असल में भी अपना सर संभालते हैं
स्त्री उनका सर और घर दोनों संभालती है।
गोधूलि की इबारतें:
कथाकार जयशंकर की यह डायरीनुमा कृति हिंदी साहित्य में कथेतर गद्य का नायाब उदाहरण है। एक लेखक अपनी पवित्रतम जिज्ञासाओं को पाठकों से साझा करते हुए जिस तरह कला, साहित्य, सिनेमा और संगीत के मिले-जुले अंतरजगत से उनका परिचय कराता है, वह इसे संग्रहणीय और बार बार पढ़ने लायक बनाता है। एक ऐसी पुस्तक जो साहित्य के नए पाठक की दृष्टि को संवारते हुए पहले से स्थापित लेखकों को भी समृद्ध करती है।

नेहरू का भारत:
इतिहासकार आदित्य मुखर्जी की मूल अंग्रेजी में लिखी यह बौद्धिक जीवनी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से संबद्ध कई बुनियादी प्रश्नों को उनके कहे, लिखे या उनके कुछ समकालीनों के आकलन को प्रामाणिकता और यथासंभव तथ्यात्मकता बरतते हुए विचार के लिए प्रस्तुत करती है। सार्वजनिक जीवन के एक विवादास्पद बना दिए नायक की वस्तुपरक पड़ताल कई स्तरों पर समृद्ध करती है जिसमें इतिहास और राजनीति के अलहदा दायरों को उसी तरह देखे जाने की जरूरत है।
भारतीय लोकतंत्र का कोरस:
कथाकार- उपन्यासकार प्रियंवद द्वारा इतिहास पर लिखी यह तीसरी पुस्तक उनकी इस श्रृंखला की संभवतः सबसे महत्वपूर्ण किताब भी है क्योंकि यह आजादी के बाद के भारत के ढाई दशकों के उस खंडकाल की एक बारीक विवेचना है जो हिंदी में इससे पहले कभी नहीं हुई। यह पुस्तक समकालीन इतिहास की है लेकिन एक कथाकार की दृष्टि से रची गई है, इसलिए यह इतिहासकारों द्वारा लिखी पुस्तकों से परे और पार जाकर रस प्रदान करती है। ऐसे समय में जब लोकतंत्र चौतरफा रक्तरंजित हुआ पड़ा है, सन 1950 के बाद का समय वस्तुतः लोकतंत्र के स्थापत्य के विकास के होने का भी है जिसकी बुनियाद में भारतीय संविधान की शक्ति संचित है। इसलिए यह हमारे समय की और भी जरूरी पुस्तक हो जाती है: यह जानने और महसूस करने के लिए कि हम कहां से चले थे और किधर जा लगे हैं।
टेक्नोफ्यूडलिज्म: व्हाट किल्ड कैपिटल्सम :
यूनानी अर्थशास्त्री और राजनयिक यानिस वरोफाकिस की यह पुस्तक भूमंडलीकरण के अधुनातन काल की समष्टिगत मोडस ऑपरेंडी का ऐसा कथ्य है जो इस विषय पर अर्थशास्त्र की दस किताबों पर इक्कीस पड़े। ‘क्लाउड कैपिटल’ यानी वैश्विक पूंजी के नव्य स्वरूप की वृत्तियों और पहुंच को क्रमशः उधेड़ते हुए यानि इसे परंपरागत पूंजीवाद के निधन से जोडक़र दर्शाते हैं कि कैसे मार्क्सवाद के उदय की गुंजाइश अब नहीं बची है क्योंकि वैश्विक आर्थिकी के खेल के नियम ही बदल चुके हैं। पुस्तक सरल भाषा में लिखी गई है लेकिन हिंदी पाठकों को अपने समय को समझने के लिए यदि कॉमन सेंस से जरा अधिक श्रम करना पड़े तो उन्हें गिला नहीं होगा।
थैंक यू गांधी :
शिक्षाविद और विचारक कृष्ण कुमार की यह पुस्तक हमारे समय को गांधी की नजर से देखने का औपन्यासिक और मार्मिकता से गढ़ा दिलचस्प प्रयास है। एक सेवानिवृत्त नौकरशाह के अपने बचपन, शहर-कस्बे और कार्यकाल की स्मृति के साथ वर्तमान की विसंगतियों को देखने की कथा ऐसी लुभावनी है कि गल्प और यथार्थ की सीमाएं डांवाडोल पड़ जाती हैं। नहीं, यह गांधी को ‘जो और जैसे हैं’ से कम या अधिक करने की कोशिश नहीं करती; केवल उनकी अंतर्दृष्टि से समय के तंतुओं को परखती है। नितांत पठनीय और संग्रहणीय।
होम इन द वर्ल्ड:
अर्थशास्त्र के लिए पहले भारतीय नोबेल विजेता अमर्त्य सेन की उपलब्धियों से पूरा विश्व वाकिफ है। वे पहली पंक्ति के अर्थशास्त्री तो रहे ही हैं, फिलॉसफी और तर्क विज्ञान के सीमांतों का विस्तार करने के लिए भी ख्यात हैं। कैंब्रिज, ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड और स्टेनफोर्ड जैसे विश्व विद्यालय उन्हें सिर आंखों पर रखते रहे हैं। लेकिन कैसा था उनका भारत में बिताया शुरूआती जीवन और वे अनुभव जिन्होंने उनके करियर को शुरुआती दिलचस्पी की विषयों – गणित -संस्कृत – को छोड़कर अर्थशास्त्र की तरफ जाने को उकसाया, उनका पारिवारिक परिवेश, भारत और केंब्रिज के वे साथी और गुरु( सुखमय चक्रवर्ती,पियरे श्राफा,मॉरिस डॉब, सिम्युएलसन) जिन्होंने उन्हें ऊर्जा प्रदान की और कैसे कई विश्व विद्यालयों में उन्होंने ‘वेलफेयर इकोनॉमिक्स’ को अलग विषय की तरह पढ़ाए जाने की जिदें की…यह पुस्तक उस सबको ऐसी बारीकबीनी से प्रस्तुत करती है कि एक बौद्धिक कथा का आनंद आता है। आर्थिकी के अलावा सेन किस कदर दुनिया भर के साहित्य और इतिहास के मर्मज्ञ हैं, यह उनके मुरीदों को और सुकूनदेह लगेगा। आत्मकथा की अगली कड़ी का मुझे तो इंतजार है।