“ज़रा बच कर रहना भैया। बड़ी हरामज़ादी है साली!”
शायद रामधीन ने जिसे सर्वेंट क्वार्टरों की आबादी रमधू कहा करती थी गुलबया को मेरे क्वार्टर से निकलते देख लिया था। उस के जाते ही आन धमका।
मैं समझ गया उस का इशारा गुलबया की तरफ़ है, मगर मैंने अंजान बन कर पूछा “कौन?”
“बड़े भोले जान पड़ो हो भैया, वही गुलबया और कौन!”
मैंने कहा, “ओह, गुलबया! हाँ अभी अभी गई है।”
“तभी तो ख़बरदार कर रहा हूँ। नागिन है नागिन! साली ने प्रोफ़ेसर को ऐसा फाँसा है अपनी जुल्फ़ों के जाल में कि बुड्ढा लट्टू की तरह नाचत है। उंगली पर निचाती है साली और वह ऐसा बुद्धू है कि नाचे जाता है।”
मैंने गुफ़्तुगू जारी रखने की ख़ातिर कहा, “ऐसा!”‘
“और नहीं तो क्या। मैंने तो ख़बरदार कर दिया, अब आगे तुम जानो। उस के काटे का इलाज नहीं!”
मैं नया-नया आया था नौकरों की इस बस्ती में। कोई पंद्रह दिन हुए होंगे। साहब सलामत सब से हो चुकी थी सिवाय गुलबया के सो आज उस से भी हो गई। हालाँकि उस का हमारी बस्ती से कोई ताल्लुक़ नहीं था। सड़क के दोनों तरफ़ और जितने बंगले थे उन के नौकर क्वार्टरों में रहते थे। बस ये गुलबया ऐसी थी जो क्वार्टर में नहीं रहती थी। बंगले में रहती थी। प्रोफ़ेसर साहब के साथ।
मैं बैठा हुआ डरबी जूता जो मुझे छोटे साहब ने दिया था चमका रहा था कि अंदर घुस आई।
“तू ही रमजानी है?”
मैं चौंक पड़ा। दरवाज़े में खिड़की थी। एक हाथ से किवाड़ पकड़े, दूसरा कमर पर रखे। अंग-अंग से जवानी फूटी पड़ती थी। गाल तने हुए। देखते ही जी चाहा बढ़ कर चुटकी ले लूँ। गेहुआँ रंगत, नाटा सा क़द, गदराया हुआ बदन, चोटी से ऐड़ी तक जोबन ही जोबन।
मैंने कहा, “हाँ, मैं ही हूँ रमज़ानी।”
वह क्वार्टर के अंदर आ गई।
“मेरा नाम गुलबया है”
मैंने चारपाई की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “बैठ जा, मैं जूता चमका लूँ, फिर तुझ से निमटूंगा।”
बिल्कुल अनाड़ी लग रही थी। मैंने सोचा वक़्त क्यों ख़राब करूँ, इसलिये मैंने ये “निमटूंगा” वाला वार कर दिया।
वह खाट की पट्टी पर बैठे हुए बोली, “तू क्या निमटेगा, तुझ जैसों को तो मैं तिगनी का नाच नचा दूँ।”
ये बात है। मैंने सोचा और फ़ौरन पीछे हट गया, “तू तो मुझे ग़लत समझ बैठी। निमटूँगा कोई बुरा हर्फ़ थोड़ी है। बड़े-बड़े शायरों ने इसे बांधा है अपने शेरों में। वह जो दाग़ का शेर है…।”
“रहने दे तू अपने सेर। तू भी उस बुड्ढे की तरह मालूम पड़े है। हर बखत सेर और न जाने क्या-क्या बकवास!”
“कौन बुड्ढा?” मैंने दायाँ पैर ख़त्म कर के बायाँ पैर उठाते हुए पूछा।
“बोही मेरा बुड्ढा!”
“तेरा बुड्ढा! तो तेरा बाप भी है!”
“बड़ी मसखरी करनी आबे है तुझे। बाप नहीं है तो क्या तेरी तरयों बगैर बाप के पैदा हुई थी। ये और बात हुई कि बोह परलोक सिधार गया।”
“तो फिर कौन सा बुड्ढा?”
“बही मेरा मालिक, पिरोभ।”
“ये पिरोभ क्या बला होती है, पिरोभ नहीं प्रोफे़सर।”
“तू जियादा जानता है कि मैं! उस के सारे दोस्त उसे पिरोभ कहते हैं। रोज सुनती हूँ। क्या बेढंगा नाम है!”
मैं चुप हो गया। अब इस जाहिल औरत से क्या बहस करना जो नाम भी नहीं जानती। मैंने सोचा, गंवार कहीं की मुझे सबक़ पढ़ाने आई है। पाँच जमातें पढ़ीं। हमेशा साहब लोगों की बैरा-गीरी की।
वह चारपाई की पट्टी पर बैठी ज़ोर-ज़ोर से टांगें हिलाती रही।
“तुझे पालिस करनी तो खूब आती है। मनुस अपना मुँह देख ले इस जूते में।” उस ने दाएँ पैर के जूत को ठोकर लगाते हुए कहा।
“तू नहीं चमकाती अपने पिरोभ के जूते?”
“मैं क्यों चमकाने लगी उस के जूते! वह खुद कर लेता है आठवें-दसवें रोज पालिस।”
“तो फिर तेरी नौकरी तो मज़े की हुई!”
“इत्ती मजे की भी नहीं जित्ती तू समझे है। खाना पकाती हूँ।”
“एक आदमी का खाना पकाना भी कोई काम हुआ।”
“खाली खाना थोड़ी पकाती हूँ। सारा घर मेरे कंधों पर है। सफाई करती हूँ। झाड़ू पोंछा करती हूँ। पिरोभ को सफाई का मरज है। हर बखत धूल की तलाश में रहता है। कुर्सियों, मेजों पर उंगलियाँ रगड़े है। उसके कपड़े धोती हूँ और बजार करती हूँ और…”
वह कहते-कहते रुक गई।
मैंने पूछा, “और क्या?”
“अरे तू क्या जाने! तू अभी बच्चा है। जब सारा घर संभालना पड़ता है तो तू क्या जाने क्या-क्या करना पड़ता है एक स्त्री को। तू तो बस बैरा-गीरी करना जाने है।”
ये कह कर वह उठ खड़ी हुई।
“मैं चली अब। सुना था तू नया-नया आया है। तुझ से मिलने आ गई।”
और वह धड़-धड़ करती। मटकती क्वार्टर से बाहर चली गई।
उसके जाने के बाद रमधू आन धमका और लगा मुझे गुलबया पर लेक्चर पिलाने।
मैंने उससे कहा, “तूने मुझे क्या बच्चा समझ रखा है! घाट-घाट का पानी पिया है मैंने। ऐसी तो न जाने कितनी छोकरियों से निमट चुका हूँ। मैं क्या ख़बरदार रहूँ उससे। उससे कह दे जा कर, वह मुझ से ख़बरदार रहे।”
रमधू बोला… “निमटने की बात मत करो भैया! निमट तो उससे सब चुके हैं।”
“ऐसा?”
“सच बोलूँ हूँ भैया! सायद ही कोई बचा हो अपनी बस्ती में।”
“तू भी नहीं? “मैंने उसकी सूखी टांगें की तरफ़ देखते हुए पूछा जो आधी नंगी थीं।
वह सीना फुला कर बोला, “और नहीं तो क्या, कह जो दिया एक भी नहीं बचा।”
“फिर इस में डरने की कौन सी बात है?”
जवाब में वह कुछ आएँ बाएँ शाएँ बक कर चलता बना।
इसके बाद मैंने दो-तीन मरतबा गुलबया को नौकरों की बस्ती में देखा। दनदनाती आती और दनदनाती चली जाती। कभी किसी से मज़ाक़ किया, कभी किसी को छेड़ा। किसी के बच्चे को गोद में उठा लिया, किसी का मुँह चिड़ा दिया, किसी तरफ़ ज़बान निकाल दी। मगर मैंने एक बात नोट की कि नौकरों की बीवियाँ उससे बिल्कुल न कतरातीं। लंडूरे नौकर उनकी मौजूदगी में खुल खेलने से बाज़ रहते। कोई मनचला आँख बचा कर उसके चुटकी भर लेता तो उसे ऐसे घूरती जैसे निगल जाएगी। या थूक देती उस पर या उसे एक मोटी सी गाली दे देती या उसे कोसती और गुलज़ारी को तो मैंने थप्पड़ खाते भी देखा।
एक दिन मैं साइकिल पर बड़े साहब के लिये स्कॉच विह्स्की की बोतल ले कर लौट रहा था कि रास्ते में गुलबया नज़र आ गई।
मैंने साइकिल रोक कर पूछा, “कहाँ जा रही हो गुलाबो?”
“बंगले।”
“चल मैं तुझे छोड़ दूँ।”
वह उचक कर कैरियर पर बैठ गई।
मैंने कहा, “सामने आ जा डंडे पर।”
वह ज़रा झिझकी। फिर आ कर डंडे पर बैठ गई और बोली, “ले तू भी क्या याद करेगा, पर देख साइकिल ठीक से चलाइयो वरना गिरा दूंगी। उस हरामी के पिल्ले गुलजारी ने भी एक दिन मुझे साइकिल पर बिठाया था। यहीं सामने। पर जब साइकिल चलाने लगा तो न जाने कैसे चला रहा था कि साले घुटने बरोबर मेरे लगे जा रहे थे। मैं कूद पड़ी साले की साइकिल से।”
मैं हंसने लगा।
“तू फ़िक्र मत कर, समझ ले उड़न खटोले पर बैठी हुई है।”
उसके हाथ में तरकारी का झोला था।
मैंने पूछा… “बाज़ार करने गई थी?”
वह “हूँ” कर के चुप हो गई।
“तेरा प्रोफ़ेसर…”
“प्रोफेसर नहीं, पिरोभ। तुझे पहले भी टोंक चुकी हूँ।”
“अच्छा बाबा, पिरोभ। तो तेरा पिरोभ कोई और नौकर क्यों नहीं रखता। सौदा-सुलफ़ लाने के लिये, झाड़-पोंछ करने के लिये।”
“क्यों रखे दूसरा नौकर!” उसने झल्ला कर कहा।
“तुझे सारा काम जो करना पड़ता है।”
“मैं कोई घबराती हूँ सारा काम करने से।”
“तेरा पिरोभ कंजूस मालूम पड़ता है।”
“तू क्या जाने! बोह कंजूस नहीं।”
“तो फिर दूसरा नौकर क्यों नहीं रख लेता?”
“क्यों रखे दूसरा नौकर! और देखे तो रख कर! मैं रखने दूंगी उसे!”
“क्यों?”
“फुजूल पैसे खराब करेगा। इत्ता काम थोड़ी है कि दो नौकर रखे।”
“तो तू ख़िलाफ़ है दूसरे नौकर के।”
“मैं भी खिलाफ़ हूँ और…”
और तेरा पिरोभ भी?”
“उसने कभी उसकी बात ही नहीं की। उसने तो सारा घर मुझ पर छोड़ रखा है और मुझे दूसरे की जरूरत नहीं मालूम पड़ती।”
“तू तो घर की मालकिन है।”
“और नहीं तो क्या।”
“और तुझे अपने पिरोभ का बड़ा ख़याल है?”
“बोह जो रखता है मेरा ख्याल।”
इतने में प्रोफ़ेसर साहब का बंगला आ गया। मैंने साइकिल रोक दी और वह कूद कर ये जा वह जा।
एक दिन गुलज़ारी ने मुझे बताया कि गुलबया प्रोफ़ेसर साहब के पास उस वक़्त से है जब वह छ: सात बरस की थी। अब उसकी उम्र कोई अठारह उन्नीस बरस की होगी। या उससे कुछ ऊपर। इसके मानी ये हुए कि वह प्रोफ़ेसर साहब के पास ग्यारह या बारह साल से है। गुलज़ारी ने बताया कि वह प्रोफ़ेसर साहब को कहीं खोई हुई मिल गई थी या वह उसे किसी यतीम ख़ाने से ले आए थे या कुछ और हुआ था। ये सारी बस्ती में किसी को ठीक से नहीं मालूम था कि वह प्रोफ़ेसर साहब के पास कैसे पहुँची पर ये सब को पता था कि प्रोफ़ेसर साहब ने उसे बड़े ख़याल से पाला और हमेशा अपनी बेटी की तरह।
लेकिन रमधू और कई और नौकरों का ख़्याल था कि प्रोफ़ेसर साहब ने गुलबया को बेटी की तरह पाला हो ये ठीक हो सकता है लेकिन अब वह उसे बेटी की तरह नहीं रखते हैं।
मैंने रमधू से पूछा, “प्रोफ़ेसर में अब भी इतना दम है क्या?”
कहने लगा, “भैया, उसके सफेद बालों पर मत जाओ। बुड्ढे की काठी अच्छी है। पुराने जमाने का जो है ना।”
एक दिन मैं अपने बंगले के बग़ीचे में बैठा हुआ था कि “रमजानी” की आवाज़ आई। मैंने गर्दन घुमा कर देखा। गुलबया अपने बंगले और मेरे बंगले के बीच की दीवार पर बड़े आराम से बैठी हुई थी।
“मक्खियाँ मार रहा है?”
मैं मक्खियाँ तो नहीं मार रहा था, मगर कुछ कर भी नहीं रहा था।
“क्या है?” मैंने पूछा।
“जरा इधर आ।”
“क्यों?”
“आ तो!”
मैं उठ कर चला तो उस ने फिर आवाज़ दी, “इधर ही से आ जा। दीवार फलांग कर।”
मैंने कहा, “मैं कोई चोर-उचक्का हूँ जो दीवारें फांदता फिरूँ!”
“तेरी मरजी” कह कर वह दीवार पर से कूद पड़ी और मैं अपने बंगले के फाटक से निकल कर उसके बंगले के अहाते में दाख़िल हो गया।
वह मेरा इन्तिज़ार कर रही थी।
मैंने पूछा, “क्या बात है?”
“आ तुझे अपना बंगला दिखाऊँ।”
मैं उसके साथ हो लिया और वह मुझे चार कमरों के इस बंगले में घुमाती फिरी। ड्राइंग-रूम दिखाया, डाइनिंग-रूम दिखाया, प्रोफ़ेसर साहब के सोने के कमरे में ले गई। और उस कमरे में ले गई जहाँ बड़ी-बड़ी अलमारियों में बहुत सी किताबें ठसा-ठस भरी हुई थीं। हर कमरे में हर चीज़ बड़े सलीक़े से रखी हुई थी। धूल का कहीं नाम तक नहीं था। गुलदानों में फूल थे, कॉर्निस पर पीतल की चीज़ें चम-चम कर रही थीं।
वह अंदर वाले बरांदे में रुक गई और मेरी तरफ़ देख कर पूछने लगी, “कैसा है मेरा घर?”
“बहुत अच्छा, अगर ये घर तू चलाती है तो तेरी दाद देना पड़ेगी।”
वह ख़ुश हो कर हंसने लगी।
“अच्छा, अब तू जा, पिरोभ के आने का समय हो रहा है।”
“डरती है?”
“नहीं तो, पर पिरोभ ने तुझे घर में देख लिया तो बिगड़ेगा।”
“क्यों?”
“उसे बंगले में उसके पीछे किसी का आना अच्छा नहीं लगता।”
मैं जाने ही वाला था कि मुझे एक ख़याल आया।
“और तू कहाँ रहती है?”
“हाय तुझे अपना कमरा दिखाना तो भूल गई!”
वह मुझे अपने कमरे में ले गई। ये स्टोर-रूम था। बावरची-ख़ाने की बग़ल में। कमरे के बीचों बीच एक खाट बिछी हुई थी। दीवार में लगे हुए लकड़ी के तख़्ते पर नारियल के तेल की एक बोतल, एक छोटा सा आईना, दो एक शीशियाँ, एक कंघी और एक कंघा रखा हुआ था। कमरे के एक कोने में एक टीन का ट्रंक रखा हुआ था। जिस में शायद उसके कपड़े होंगे। एक दूसरे कोने में दो तीन सैंडलें और चप्पलें पड़ी हुई थीं। खाट पर बिछा हुआ बिस्तर मामूली था मगर साफ़-सुथरा। सारा कमरा और उसकी तमाम चीज़ें मामूली थीं मगर साफ़-सुथरी।
मैंने कहा, “ये है तेरा कमरा!”
वह मेरा मतलब समझ गई, “चाहूँ तो मैं किसी भी कमरे में रहने लगूँ पर मुझे खुद पसंद नहीं।”
“क्यों पसंद नहीं?”
“मुझे यहीं अच्छा लगता है और पिरोभ को भी यही बात पसंद है कि मैं जैसी हूँ वैसी रहूँ।”
“इस का क्या मतलब हुआ भला?”
“मतबल ये हुआ कि मनुस को बैसे ही रहना चहिए जैसा उसे भगवान ने बनाया।”
“ये क्या बात हुई! भगवान ने मनुस को नंगा बनाया तो वह नंगा ही रहे?”
“अब मैं तुझे कैसे समझाऊँ। ये देख बात यूँ है। तू मेरे ये कपड़े देख रहा है, ये सब के सब मामूली हैं और…” उस ने ट्रंक खोल कर उसमें से कई कपड़े निकाल कर मुझे दिखाए। “और ये कपड़े भी सब मामूली हैं। मैं चाहूँ तो अच्छे-अच्छे रेसमी कपड़े पहनूँ। पिरोभ कुछ नहीं कहेगा। पिरोभ कहता है, गुलबया तू जैसी है बैसी रह। तेरी सुंदरता उसी में है कि तू किसी की नकल न करे। अब मैं तुझे कैसे समझाऊँ। बोह बड़ी-बड़ी बातें करता है। बड़ी निराली बातें, जो मेरी समझ में तो क्या तेरी समझ में भी नहीं, किसी की समझ में भी नहीं आने की। एक दिन मैं एक साड़ी खरीद लाई और पहन कर उसे दिखाई। इत्ती अच्छी थी बोह साड़ी पर पिरोभ को भली नहीं लगी। कहने लगा, गुलबया तुझ पर लहंगा जैसा सजता है बैसी कोई चीज नहीं सजती। तू जैसी है बैसी रह। तभी तो बोह कहता है मैं इस कमरे में रहूँ और इस खाट पर सोऊँ। बैसे घर में एक और पलंग भी है। उस पर जोर से लेटो तो उछलता है पर बोह कहता है, तू इन कमरों में रहेगी और ऐसे पलंग पर सोएगी तो तू बदल जाएगी और तू बदल जाएगी तो तेरी सुंदरता बदल जाएगी… अब मैं तुझे कैसे बताऊँ बोह कैसी-कैसी बातें करता है। मेरी समझ में खुद नहीं आतीं उस की बातें तो, तुझे कैसे समझाऊँ। पढ़ी-लिखी होती तो…”
“उसने तुझे पढ़ाया-लिखाया क्यों नहीं?”
“बोही, ‘गुलबया तू बदल जाएगी’ बाली बात। तू तो जंगल का फूल है, हिरनी है…”
मुझे रमधू की बात याद आ गई।
“पर लोग तो कहते हैं कि वह तुझे बिल्कुल बेटी की तरह रखता है।”
“बेटी की तरियों…” उस का लहजा एक दम बदल गया। बोह क्या रखेगा बेटी की तरियों! उस की माँ।”
मैंने हिम्मत कर के कहा “कुछ लोग ये भी कहते हैं कि वह तुझे…”
उस ने मुझे जुमला ख़त्म न करने दिया और मुझे कमरे से बाहर धकेलते हुए बोली, “तू अब जा। बहुत कर लीं तूने बातें। जा, भाग अब। मुझे बहुत काम करना है”
मैं एक हफ़्ते तक बड़े साहब के साथ दौरे पर रहा। वापस आया तो रमजानी ने बताया कि गुलबया ने एक-दो दफ़ा मेरे बारे में दरयाफ़्त किया कि “रमजानी को क्या हैजा हो गया या कहीं डूब मरा जा कर।”
फिर एक दिन वह आप ही आप मेरे क्वार्टर में घुस आई।
“तू कहाँ मर गया था जा कर?”
“क्यों? क्या मेरी याद आती थी तुझे?” मैंने उसे छेड़ा।
“मेरी जूती को आए तेरी याद, मैं तो यूँ ही पूछ रही थी।”
“दौरे पर गया था।”
वह खाट पर बैठ कर टांगें हिलाने लगी और “जिया बेकरार है, तेरा इन्तिजार है” गुनगुनाने लगी।
मैंने पूछा “तू सिनेमा देखती है?”
“नहीं।”
“क्यों?”
“बुड्ढा जो नहीं देखता।”
“तो क्या हुआ”
“बाह। कुछ हुआ ही नहीं। मैं अकेली तो जाने से रही। किसी और संग वह मुझे जाने नहीं देगा। उसे सिनेमा पसंद भी नहीं। मैंने एक दफे कहा भी तो बोला कि सिनेमा बुरी चीज होती है। बोह तो हर बखत इत्ती-उत्ती मोटी पुस्तकें पढ़ा करता है और रात को बगीचे में टहलता है।”
“और उस के बाद।“
उसने मुझे घूरा
“उसके बाद क्या, सो जाता है पड़ के।”
मैंने उसे घेरने की कोशिश की।
“देख गुलबया मैंने बहुत ज़माना देखा है। घाट-घाट का पानी पिया है, तू मुझे नहीं चला सकती।”
वह मुझे घूरती रही।
“मुझे सब मालूम है कि वह तेरे साथ क्या करता है।”
उसने फुंकार मारी।
“क्या करता है मेरे सात?”
वह तुझे सुलाता है अपने सात।”
मैंने डरते-डरते ये बात कही थी और सोच रहा था कि जवाब में वह मुझ पर झपट पड़ेगी या कम-अज़-कम मुझे एक गाली ज़रूर सुनाएगी। मगर उसने न तो गाली दी और न झपटी मेरे ऊपर।
“तुझे कैसे मालूम?”
जितना ताज्जुब मुझे उसके गाली न देने और झपटने पर हुआ था। उससे ज़्यादा उसके सवाल पर हुआ और बड़ी सादगी थी उसके सवाल में जिसे उसने बड़ी मासूमियत से किया था।
वह ज़रा देर चुप रही। उसकी टांगें ज़ोर-ज़ोर से हिलती रहीं। फिर उसने झिझकते हुए कहा, “तुझे एक बात कहूँ रमजानी!”
“बोल”
“तू सौगंध खा कि किसी से कहेगा नहीं।”
“तेरे सर की सौगंध।”
“सौगंध भी खाई तो मेरे सर की, अपने सर की सौगंध क्यों नहीं खाता!”
“मेरे सर की सौगंध।”
वह फिर चुप हो गई और टांगें हिलाती रही।
मैं आ कर उसके पास चारपाई पर बैठ गया।
“बोल न, क्या कह रही थी?”
उसने रुक-रुक कर कहना शुरू किया, “तू जो ये सोने की बात कर रहा था, अभी तो ये सच है पर तुझे एक बात नहीं मालूम, वह किसी को भी नहीं मालूम।”
“वह क्या है?”
“बोह ये कि मैं इस बुड्ढे की जोरू नहीं।”
मैं हँसने लगा।
“ये तो सब को मालूम है।”
वह झल्ला गई।
“तू बड़ा बुद्धीमान बनता है पर इत्ती सी बात तेरी समझ में नहीं आती और ऊपर से ही ही करता है।”
“इस में समझने की क्या बात है, तू उसकी बीवी नहीं है, ये मुझे भी मालूम है, तुझे भी और सब को भी।”
“यही तो नहीं मालूम तुझे और किसी को सिवाय मेरे। देख, बात यूँ है कि बुड्ढा मुझे सुलाता तो है अपने पास पर मैं उसकी जोरू नहीं। मेरा मतबल है कि…” वह जुमला अधूरा छोड़ कर शरमा गई और फिर बोली, “अब तो समझ गया तू?”
“मैं समझ तो गया पर बड़ा हैरान हुआ।
“ये कैसे हो सकता है।”
“यही तो बात है, ये मैं खुद सोचती हूँ।”
मैं खिसक कर उसके क़रीब आ गया।
“तूने कभी बात की उससे इस बारे में?”
“बड़ा बे-सरम है तू, कोई ऐसी बात भी करता है, बैसे मैंने एक दिन उसे मारा ज़रूर।”
मैं चौंक पड़ा।
“मारा?”
“तेरे सर की सौगंध, अपनी बकबास कर रहा था। यही सुंदरता, जंगली फूल बाली बकबास, मैं तेरी सुंदरता खराब नहीं करना चाहता, मुझे तुझ से और कोई गरज नहीं बस इत्ती गरज है तू मेरे पास रहे, तू मेरे पास होती है तो मेरी आत्मा जगमगाने लगती है, मेरे सरीर में बिजली चमकने लगती है और फिर ये बिजली मेरे दिमाग में जाती है और यहाँ से आत्मा में और फिर नए-नए संसार मेरी आँखों के सामने नाचने लगते हैं और फिर मैं बड़ी-बड़ी चीजें लिखता हूँ। कुछ इस किसिम की बकबास किये जा रहा था, जिसे मैं हजार बार सुन चुकी हूँ।”
वह हँसने लगी।
“उस ने कुछ नहीं कहा?”
“कहता क्या, मैं क्या डरती हूँ उससे। मेरे बिना तो बोह जिंदा नहीं रह सकता। कहता है, गुलबया तेरे बगैर मैं बह जो बड़ी-बड़ी पुस्तकें लिख रहा हूँ सब अधूरी रह जाएँगी”
“तब तो रमधू सच कहता था।”
“क्या कहता था रमधू?”
“यही कि तू बुड्ढे को उंगली पर नचाती है।”
“ये बात नहीं रमजानी। मैं उसे परेसान थोड़ी करती हूँ। बोह जो भी कहता है मैं करती हूँ, पर बोह मुझे बहुत परेसान करता है। इत्ते साल हो गए पर मेरी समझ में ये बुड्ढा आज तक नहीं आया। न जाने क्या चाहता है मुझ से और ये कविताओं बाली बातें जो करता है, उन से मैं और भी परेसान हो जाती हूँ। मेरे पल्ले खाक नहीं पड़ता, बोह क्या बक रहा है”
मैं खिसक कर उसके बिल्कुल क़रीब आ गया।
“तू क्यों बेकार अपना जी जलाती है, मैं जो मौजूद हूँ।”
उसने मुझे घूरा।
“तेरा मतबल?”
मैंने उस की कमर पर हाथ रखते हुए कहा, “तुझे बीवी बनने की जो फ़िक्र है ना सो मैं हाज़िर हूँ।”
उसने झपाक से उठ कर एक ज़ोर का थप्पड़ मेरे मुँह पर मारा। मेरा हाथ हटाया। मुझे हरामी का पिल्ला कहा और ये जा वह जा।
उसके जाते ही रमधू जो शायद ताक में था आन धमका।
“आज तो बड़ी देर बैठी?”
“मैंने सुनी अन सुनी करते हुए पूछा, ”ये गुलबया जो है ना। तो तू उससे निमट चुका है, है ना?”
“तुम्हारे सर की कसम भैया!”
मैंने छूटते ही उसे दो-तीन मोटी-मोटी गालियाँ दीं और क्वार्टर से बाहर निकाल दिया।
उसके बाद गुलबया लम्बा ग़ोता खा गई। कई दिन तक नज़र न आई। एक दिन मैं बाज़ार जा रहा था कि पीछे से आवाज़ आई।
“रमजानी, ओ रमजानी।”
गुलबया की आवाज़ थी। साली का जिस्म ऐसा कि नज़रें जम जाएँ और आवाज़ ऐसी कि पैर गड़ जाएँ। मैं रुक गया। मेरे पास आ कर बोली, “किधर जा रहा है?”
मैंने कहा, “बाज़ार।”
कहने लगी, “चल मैं भी चलती हूँ। बुड्ढे के लिये दारू लानी है।”
“बुड्ढा क्या पीता भी है?”
“तू तो निरा गधा है, सराब नहीं दारू, दारू समझता है? दबाई, समझा?”
“अच्छा, दवाई, क्या हो गया है तेरे बुड्ढे को?”
“कुछ भी नहीं, मालिस की दबाई है, बुड्ढे को मालिस कराने का बड़ा सौक है?”
थोड़ी दूर चल कर मैंने कहा, “बहुत दिनों बाद दिखाई दी तू।”
“मैं बताऊँ क्यों नहीं दिखी?”
“बता”
“तू भी तो बदमास है गुलजारी, रमधू और मुरारी की माफिक। मैं समझी थी तू अच्छा आदमी होगा पर तू भी गंदा निकला।”
मैं गुलबया का इशारा समझ गया।
“देख गुलबया, बात यूँ है कि मुझ से ग़लती हो गई, मैं तुझे कुछ और समझ बैठा। अब ऐसी बात नहीं होगी।”
“खा मेरे सर की सौगंध।”
“तेरे सर की सौगंध”
“हाँ मेरे सर की सौगंध”
मैंने उसके सर की सौगंध खा ली।
“जा तुझे माफ कर दिया, पर फिर न करियो ऐसी गलती, नहीं तो खून पी जाऊँगी तेरा।”
मैं हँसने लगा।
दूसरे दिन वह मेरे क्वार्टर में आ धमकी।
“बड़ा गजब हो गया रमजानी।”
“क्या क़यामत आ गई?”
“मेरे बुड्ढे ने तुझे देख लिया, मेरे सात।”
“कब?”
“कल जब तू और मैं बजार जा रहे थे।”
“तो क्या हुआ।”
तू क्या जाने क्या हुआ, बड़ा नराज था।’
“पर मैं कहता हूँ इस में हुआ ही क्या अगर तू मेरे साथ थी और उसने हमें देख लिया।”
“तेरे भेजे में नहीं आने की ये बात। उसे जरा भी पसंद नहीं मेरा किसी से मिलना और वह भी सर्वेंट क्वाटर बालों से। बोह कहता है ये लोग तुझे खराब कर देंगे गुलबया।”
“ऐसी बात”
“और पूछ रहा था कौन था बोह आदमी तेरे सात?”
“तूने बता दिया?”
“और नहीं तो क्या, मैंने कह दिया रमजानी था और तुझे मालूम है, मैंने थोड़ी सी तेरी तारीफ भी कर दी। मैंने कहा रमजानी बाकी नौकरों समान नहीं।”
“तेरी मरम्मत नहीं की उसने?”
“मरम्मत, उस की माँ की… उसकी मजाल जो छू भी दे मुझे।”
वह थोड़ी देर और बैठी रही। टांगें हिलाती रही। गुनगुनाती रही और फिर कूल्हे मटकाती और पाइल छनकाती चली गई।
रात का वक़्त था। कोई ग्यारह बारह बजे होंगे। किसी ने मेरा दरवाज़ा खटखटाया।
मैंने पूछा “कौन है?”
बाहर से गुलबया की घुटी हुई आवाज़ आई, “मैं हूँ गुलबया।”
मैं लिहाफ़ फेंक कर उछला। दरवाज़ा खोला तो गुलबया सामने खड़ी थी। गड़ाप से क्वार्टर में आ गई।
“दरवज्जा बंद कर के कुंडी चढ़ा दे।”
मैंने उसके हुक्म की तामील की।
वह कमरे के बीच में खड़ी थी। मैंने उसके पास जा कर पूछा, “तू आ गई गुलबया?”
“हाँ, मैं आ गई रमजानी।”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रख दिया। उसके बदन में हलकी सी कपकपी थी।
“रौशनी कर दूँ?”
“नहीं-नहीं, बत्ती मत जलइयो।”
मैंने हाथ कंधे पर से हटा कर उसकी कमर पर रख दिया।
“चल, खाट पर बैठ चल के”
वह आ कर खाट पर बैठ गई और मैं भी।
“तुझे जाड़ा लग रहा है, आ लेट जा।”
“मुझे जाड़ा-बाड़ा कुछ नहीं लग रहा।”
मगर वह चुपके से लेट गई और मैं भी।
वह बोली, “मालूम है मैं क्यों आई हूँ तेरे पास इस समय?”
मैं चुप रहा।
“मैं उस बुड्ढे से लड़ आई और अब उसके पास कभी नहीं जाऊँगी चाहे कुछ हो जाए। पर मैं उसके पास अब हरगिज नहीं जाऊँगी।”
मैंने उसकी बात में दिखावे के लिये इंट्रेस्ट लेते हुए कहा।
“क्या हुआ?”
“अब कभी नहीं जाऊँगी उसके पास।”
“आख़िर हुआ क्या?”
“बोही जोरू बाली बात, और क्या होता।”
मैं चुप हो गया। और वह भी।
कोई आध घंटे बाद वह हंस-हंस कर बता रही थी कि वह क्यों और कैसे प्रोफ़ेसर साहब से लड़ी। कैसे झल्ला कर उसके पलंग पर से उछल कर दनदनाती हुई उसके कमरे से बाहर निकल गई। कैसे वह उसकी ख़ुशामदें करता रहा और कैसे वह उन ख़ुशामदों की परवा किये बग़ैर सीधी मेरे क्वार्टर पहुँची।
यकायक वह ख़ामोश हो गई। उसकी हँसी रुक गई। वह पाँच-छ: मिनट ख़ामोश पड़ी रही। फिर उसके बदन को हरकत हुई। उसने लिहाफ़ उलट दिया और खड़ी हो कर अपने कपड़े ठीक करने लगी।
वह दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी तो मैंने पूछा, “क्या जा रही हो गुलाबो?”
उसने “हाँ” की
मैंने पूछा “कहाँ?”
कहने लगी, “अपने बुड्ढे के पास, और कहाँ, मेरे बिना हुड़क जाएगा बेचारा?” फिर उसने कुंडी खोल कर आहिस्ता से कहा, “दरवज्जा बन्द कर ले, मैं चली।”
***
ज़मीरुद्दीन अहमद की ये कहानी 1955 में दिल्ली में ही लिखी गई और उस दौर में कराची से निकलने वाले मशहूर अदबी रिसाले ‘नया दौर‘ में प्रकाशित हुई थी। 1989 में शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने ज़मीरुद्दीन अहमद को अपने एक ख़त में लिखा : ‘मुझे अब तक वह Shock और Distaste और Fascination और Thrill याद है जो ‘गुलबया‘ पढ़ कर मुझ में पैदा हुआ था। Distaste शायद सही लफ़्ज़ नहीं लेकिन और कुछ समझ में न आया कि गुलबया ने मुझमें जो Emotional Upset पैदा किया था और आपके Impersonal Tone बल्कि तक़रीबन Clinical Tone ने जिस तरह मुझे दहला दिया था उसके लिए क्या लफ़्ज़ लिखूं। अंग्रेज़ी अलफ़ाज़ के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ। बात शायद अब भी वाज़ेह नहीं कर सका हूँ।‘
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