ये अनूठी बौद्धिकता और ये अप्सराओं की सी ख़ूबसूरती । इन दो चीज़ों का इतना प्यारा संगम मैंने आज तक नहीं देखा। नौजवान दानिशवर ने उस की आँखों में ग़ौर से देखते हुए कहा, ”तुम ख़ुद भी अपनी ख़ूबियों को अभी नहीं जानतीं। कितना तेज़ है तुम्हारा Wit जानती हो…? मेरी रचनाओं को एक दुनिया ने सराहा है। मगर किसी स्त्री ने आज तक इस अंदाज़ से उन्हें समझा ही नहीं। ये तुम्हारा लिबास, ये रंगों का चुनाव, ये काँधे, ये हाथ, तुम! तुम सबसे अनोखी, सबसे अलग हो। कितनी अच्छी हो तुम! कितनी अच्छी तबीयत की मालिक।‘
और वह ख़ामोश हो कर सुन रही थी। उस की शख़्सियत के जादू में खोई हुई, साथ ही हैरान भी थी कि आज वह बात बदल क्यों नहीं रहा। आज से पहले उसने इतनी देर तक कभी उस की ख़ूबसूरती की बातें नहीं की थीं। दो एक जुमले बीच बीच में कह कर वह ज़रूर कोई और बात करने लग जाता था और उसकी यही बात उसे पसंद थी कि वह हर दूसरे आदमी की तरह उस के हुस्न की तारीफ़ों के पुल नहीं बांधता। इस में कोई शक नहीं था कि वह बे-इंतिहा हसीन थी मगर उस में कुछ ऐसी ख़ूबियाँ भी थीं जो ख़ुद उसे अपने हुस्न से कहीं ज़्यादा प्रिय थीं।
वह बहुत मेहनती और समझदार लड़की थी। अक्सर बौद्धिक लोग मेहनत कम करते हैं मगर उस में दोनों ही बातें बराबर थीं। उसे अपनी बुद्धिमत्ता पर गर्व था मगर वह इतनी ख़ूबसूरत बिल्कुल नहीं होना चाहती थी। उसका बस चलता तो वह अपनी ख़ूबसूरती को अपनी बुद्धिमत्ता के मुक़ाबले में कई दर्जे कम कर देती। उसे इस बात से हमेशा चोट पहुँचती कि लोग उसकी मेहनत को भूल जाते हैं और सिर्फ़ उसका ख़ूबसूरत होना याद रखते हैं। वह एक इन्सान भी तो है। एक मशहूर पत्रकार, एक मेहनती क़लमकार। जब जब उसका कोई लेख छपता तो प्रशंसकों के पत्र और ई मेल्ज़ के ढेर लग जाते। टेलीफ़ोन बार-बार बजता। लोग उसकी रचना को खुले दिल से सराहते। मगर व्यक्तिगत रूप से वह जिस किसी से भी मिली, वह उसके बेपनाह सौंदर्य के आगे गूँगा भी हो गया और बहरा भी। अपनी सब ख़ूबीयों से घट कर वह सिर्फ़ एक ख़ूबसूरत लड़की रह जाती। और देखने वाला न उसके कलाकार होने का क़द्र-दान रहता न उसकी बौद्धिकता उस पर वैसा प्रभाव डाल पाती। उसका अपना वजूद उसकी रूह का दुश्मन और उसकी तरक़्क़ी में रुकावट बन जाता। उसकी संजीदा शख़्सियत का रौब अकसर सामने वाले के हौसले को हल्का कर देता, और फिर जो दिल हारकर पीछे हटते, वे उसे एक पल में ही न सिर्फ़ नज़रअंदाज़ कर देते बल्कि दिल ही दिल में उसके ख़िलाफ़ भी हो जाते।
उसने अपने आप को हमेशा अपने उसूलों के क़िले में सँभाल कर रखा और ज़िंदगी की कई बहारें तन्हा गुज़ार दीं और शायद ज़िंदगी यूँ ही अपनी क़ाबिलियत के एक सच्चे क़द्रदान के इंतज़ार में गुज़रती रहती, अगर वह इस महफ़िल में न आई होती और वह आज भी यूं ही भीड़ में अकेली रह जाती, अगर कोई उसका परिचय उस से न करवाता, जिसकी वह प्रशंसक थी। जिसकी हर रचना में वह डूब जाती थी। जिसकी हर रचना हक़ीक़त की इतनी साफ़ और सादगी भरी झलक देती कि उसमें कोई पेचीदगी नज़र नहीं आती, और फिर भी हर जुमले पर ज़हन सोचने पर मजबूर हो जाता। दिमाग़ की नई खिड़कियाँ खुलने लगतीं, और लगता जैसे दुनिया का कोई नया अर्थ समझ में आने लगा है।
वह था ही ऐसी जादूई ताक़त रखने वाला क़लमकार। वह उसे इस दौर का सबसे बड़ा विचारक मानती थी। सबसे बड़ा साहित्यकार समझती थी। मगर उसकी किताबों के कवर पर छपी उसकी तस्वीर पर उसने कभी ग़ौर करना ज़रूरी न समझा था, इस तरफ़ उसका ध्यान ही नही गया और उस में ऐसी कोई बात थी भी नहीं। तंग सा माथा। छोटी छोटी आँखें। चपटी सी नाक। बिखरी बिखरी सी दाढ़ी। उसकी हर किताब के साथ उसकी वही एक तस्वीर छपा करती थी। मगर आज जब उसे सामने से देखा तो, अपनी रचनाओं की तरह ही वह भी बड़ा अनोखा और ख़ूबसूरत नज़र आया।
उसकी संजीदा शख़्सियत ने ख़ुद अपने आपसे भी उस साहित्यकार को देखने या समझने का मौक़ा नहीं ढूँढा था। मगर आज…. उसने समझ लिया कि ये ही वह स्वरुप है जिसे उसने सामने से देखना चाहा था… हमेशा। वह लम्बे क़द का था। उसके काँधे चौड़े थे। नाक कुछ बड़ी तो थी मगर बैठी हुई न थी और नाक की बनावट को दाढ़ी ने एक अनुपात दे दिया था। माथा चौड़ा था मगर टेढ़ी मांग निकालने की वजह से उसके आधे माथे पर बाल बिखरे से रहते थे जो सामने से देखने पर बहुत भले लगते थे। आँखें छोटी नहीं थीं बल्कि उसके मुस्कुराने का अंदाज़ ऐसा था कि उस वक़्त आँखें कुछ सिकुड़ जाती थीं और आँखों के गिर्द शायद लिखने पढ़ने से हल्के सुरमई घेरे से थे। आँखों में गहराई के साथ साथ चमक भी थी और कुछ हल्की हल्की शरारत का अक्स भी, बिलकुल जैसे उसकी रचनाओं में हुआ करता था, संजीदगी के साथ साथ इक ज़रा सी हास्यपूर्ण या व्यंग्यात्मक चुभन भी उसके हाव भाव में नज़र आती थी। चेहरे से बुद्धिमत्ता झलकती थी, और उसके भावों में नर्मी, संतुलन और एक शांत-सी आत्मविश्वास की आभा दिखाई देती थी।
इस समझदार और धीर चेहरे के साथ, हल्के सुरमई घेरों में डूबी हुई उसकी चमकती-सी, मगर कुछ कुछ शरारत से भरी आँखें जैसे उसकी शख़्सियत से पूरी तरह मेल नहीं खाती थीं। मगर जिस अपनाईयत से वह उसे ”हेलो‘ कहते हुए मुस्कुराया था, उस वक़्त उसकी उन आँखों ने भी अपनाईयत ओढ़ ली थी जैसे कोई रिश्ता, कोई जान पहचान पहले से हो। शायद उन्होंने उसे कहीं पढ़ा होगा। वह सोचने लगी।।। और जवाब में वह भी मुस्कुरा दी। अचानक ही उसका दिल किया कि वह अपनी उँगलियों के पोरों से उस के माथे पर बिखरे हुए बालों को एक तरफ़ सँवार दे और मुट्ठी बंद करके इस लम्स को महफ़ूज़ कर ले। वह बस उसे मुस्कुराते हुए देखती जा रही थी। फ़रिश्तों जैसे उसके निश्छल सौंदर्य को देखकर।।। वह भी उसे ही देख रहा था, लेकिन उसके चेहरे के भावों में एक ठहराव था। फ़ौरन ही वह भी जैसे होश में आ गई और औपचारिक सलाम दुआ के बाद दूसरी तरफ़ चली गई।
फिर कुछ दिन बाद उसने जब उसे फ़ोन करके अपनी नई किताब के विमोचन समारोह में बुलाया तो वह नहीं गई। उसे अपनी उस कमज़ोरी से डर लगता था जो उसकी मौजूदगी में वह अपने अंदर महसूस करती थी। इस के बाद भी वह उसे कभी न कभी टेलीफ़ोन करता और उस के काम, उस के प्रोफ़ैशन के बारे में बात करता। कभी कभी बात चीत लम्बी हो जाती। वह दुनिया-भर की बातें करता मगर उस के सौन्दर्य की कभी तारीफ़ न करता। उसकी ये बात वह इतना ज़्यादा पसंद करती कि उसे अपने अंदर ख़ुशियों के छोटे छोटे से झरने फूटते महसूस होते।
फिर जब वह उससे मिली तो वह उसे और भी ज़्यादा अच्छा लगा। सादा सा, अपने आप से बे ख़बर सा। उसकी ख़ूबसूरती से बेपरवाह सा। अब उसे अपने कमज़ोर हो जाने का डर महसूस नही होता था क्योंकि वह ख़ुद को उस के साथ ख़ुश भी पाती और महफ़ूज़ भी। वह पहला इन्सान था जिसने उसे सौंदर्य के परे जा कर भी कुछ समझा था। उसने उसकी रचनाओं के अलग अलग पहलुओं की उसी अंदाज़ में तारीफ़ की थी जिस अंदाज़ में उसने महसूस करके उन्हें लिखा था। उसने तारीफ़ का जुमला जब भी इस्तिमाल किया, उसकी बौद्धिकता के लिए किया। इस के बाद के एक-आध जुमले ने उसकी सुन्दरता के किसी पहलू को छू लिया हो तो छू लिया हो। यूं ही जैसे मौसम का ज़िक्र किया जाता है या किसी किताब के कवर पेज की बात की जाती है। सादा से, सरल से अंदाज़ में कभी अचानक वह कह देता, ”तुम्हारा कल वाला लेख देखा, भई वाह! यक़ीन नहीं आता कि इस छोटे से सर में इतना बड़ा दिमाग़ है।‘ वह उसका सर हाथ से पकड़ कर हिलाता, दोस्ताना अंदाज़ में। फिर अचानक उसे देखकर कह देता, ”अरे तुम तो सफ़ेद लिबास में कहानियों की परी मालूम होती हो।‘ बिल्कुल यूं ही। बिना किसी भाव के। और वह चुप-चाप उसकी बातों को ग़ौर से सुनती हुई उसे टुकुर टुकुर निहारा करती, अपनी चोटी से खेलती हुई और कभी कभी बात करते हुए अचानक रुक कर वह उसकी आँखों को ग़ौर से देखता फिर ख़ुद ही हंस पड़ता। फिर कुछ सोच कर कहता, ”तुम्हारी आँखों से कितनी क़ाबिलीयत झलकती है। वैसे तुम्हारी आँखें हैं भी बहुत ख़ूबसूरत।‘ इस अंदाज़ से जैसे उसकी जानकारी के लिए कहा जा रहा हो। और वह हौले से मुस्कुरा देती।
फिर वह कुछ सोचता, और कुछ और कहता, ”अगर तुम इस से भी ज़्यादा हसीन होतीं… ख़ैर वह तो मुम्किन नहीं था। हाँ अगर होतीं भी तो भी मेरा तुमसे कोई राब्ता रखना हरगिज़ मुम्किन न था, अगर तुम इतनी क़ाबिल जर्नलिस्ट न होतीं, इतनी मेहनती लड़की न होतीं। ये तुम्हारी नाक ऐसी तीखी है कि दिल में चुभ जाती है। अच्छा ये बताओ आजकल तुम्हारे लिखने की रफ़्तार कुछ कम नहीं हो गई? तुम्हें क्या लगता है। लिक्खो ना….। ख़ूब जी लगा कर। बहुत बड़ी राइटर बन जाओ। इस से भी अच्छी।‘ वह उसकी नाक पकड़ कर हिला देता। वह खिलखिलाकर हंस देती। फिर एक दम ख़ामोश हो कर कुछ सोचती फिर मुस्कुराती। कितनी अपनाईयत थी उस की बातों में।
उसकी घटाओं सी ज़ुल्फ़ों के तो बहुत दीवाने थे मगर उस के सर की किसी ने तारीफ़ नहीं की थी। उसकी कश्मीरी बादाम जैसी लम्बी और बड़ी आँखों में डूबने को एक ज़माना तैयार था मगर इन आँखों से किसी को क़ाबिलियत झलकती हुई नज़र नहीं आती थी और इधर वह जो कितने ही लोगों की Inspiration था उस का कितना ख़याल करता था। उस की एक बात के जवाब में उसे कितनी बातें समझाता। सौ तरह से बयान करता। बोलते बोलते कहीं दूर चला जाता। अपने हासिल किए हुए इल्म के समुन्दर में डूब कर लफ़्ज़ों के मोती बिखेरता और उसकी रूह में ख़ुशियों की तितलियाँ उड़ने लगतीं, वह उस के इल्म के किसी तार को अपने किसी सवाल से बस ज़रा सा छेड़ देती और वह पूरे साज़ की तरह बज उठता। वह उसकी ज़हानत की आशिक़ थी। उसकी शख़्सियत की बड़ी प्रशंसक थी, उसकी रचनाओं की दीवानी थी, हमेशा उस के बारे में सोचा करती थी और वह भी उससे मुलाक़ात को सबसे पहले रखता, मगर अपना कोई ज़रूरी काम उसकी ख़ातिर छोड़ता नहीं था।
लेकिन इधर वह अपने काम से इन्साफ़ नहीं कर पा रही थी क्योंकि वह उस के हवासों पर मदहोश कर देने वाली महक की तरह छाया रहता था। और वह था कि अपनी हर रचना को बराबर वक़्त देता। सेमिनार बुलाता, कान्फ़्रैंसें अटेंड करता, मीटिंगें करता, मुलाक़ात करता तो सोच समझ कर, वक़्त का सही इस्तिमाल करके, वक़्त गंवाकर नहीं। वही बात करता जो वह पसंद करती। वह आलिम था, इल्म को ज़ाया नहीं करता था। किसी न किसी उपयोग में लाता था। और वह ख़ुद को उसका समझने लगती थी। मगर फिर भी उसने अपने अब तक के इस अहसास में उसे राज़दार नहीं बनाया था। कहीं कहीं से वह अब भी एहतियात करती थी। शायद ये औरत की वह छटी हिस थी जो सदैव से पुरुष के प्रभाव के सामने ढाल बन कर उसे महफ़ूज़ रखती है या उसका अपनी ख़ूबसूरती के प्रति बना रहने वाला ख़ौफ़।
कभी कभी वह अचानक ख़ामोश हो जाता और फिर अचानक ये कह देता कि ये दूरी अब उस से बर्दाश्त नहीं होती। वह उस के क़रीब होना चाहता है। वह चुपचाप सुना करती। क़रीब होने से वह क्या कहना चाहता है? क्यों कि उम्र-भर साथ रहने की बात तो उसने कभी नहीं की। या शायद वह इसी तरह कहना चाहता हो।
और फिर एक दिन वह कहीं दूर पिकनिक पर गए जहाँ उनके अलावा पानी, पेड़, फूल और तितलियाँ थीं। उस दिन उस ने और कोई बात नहीं की। वह उस के सरापे को बादलों और फूलों से उपमाएं देता रहा मगर वह जानती थी कि ये ज़िक्र तो जाने कैसे ऐसे ही हमेशा की तरह जान बूझ कर छिड़ गया और अभी विषय बदल जाएगा। मगर विषय नहीं बदला और वह बोलता गया, ”ये अनूठी बौद्धिकता और ये अप्सराओं की सी ख़ूबसूरती इन दो चीज़ों का इतना प्यारा संगम मैंने आज तक नहीं देखा।‘ वह उसकी बातों में छिपे इशारे कुछ समझती कुछ न समझती उसे ख़ामोशी से देखती, अजीब से भावों के साथ। ”हमारे विचार, अहसास, सोचें सब एक सी हो गई हैं। तो हम क्यों अलग हैं? हमें अब और अलग नहीं रहना चाहिए।
वह उसका चेहरा पढ़ने की कोशिश करता। और वहां उसे उसकी दो भोली आँखों के दरमियान भौहों के बीचो बीच खिंची हुई एक लकीर नज़र आती, जैसे वह कुछ समझ नहीं पा रही हो या जैसे अभी उसने पूरी बात ही न सुनी हो। वह कुछ और कहता। रुक कर समझाने के अंदाज़ में, ”तुम्हारा क्या ख़याल है। मैं ठीक कहता हूँ ना?’ वह उस का चेहरा ग़ौर से देखता। वहां एक शर्मीली सी मुस्कुराहट खेल रही होती। मगर आँखों में पूरी बात सुनने की ललक भी होती जैसे वह ख़ामोश चेहरा बोल रहा हो, ‘तो फिर मेरे घर वालों से मुझको मांग लीजीए ना। मगर लब नहीं हिलते और वह फिर कहता, उस के चेहरे के सामने अपना चेहरा ले जाकर, उसकी आँखों से अपनी आँखों तक एक सिलसिला सा बांध कर, ”मैं तुमसे तुम्हारा वजूद मांग रहा हूँ! मुझे समझ रही हो ना? तुमसे ज़्यादा मुझे कौन समझेगा?
ये वजूद हमारे बीच में दीवार बन गए हैं। आओ इन दीवारों को गिरा दें कि इस मोड़ पर आके हमारी सोचें हमें बाँटे दे रही हैं। ये ख़ेमा-बंदी क्यों? वह कुछ देर रुका था…. और वह, ख़ामोश देख रही थी उसे। चेहरे पर यक़ीन और बे-यक़ीनी के बीच बना हुआ दुविधा भरा सवालिया निशान लिए। वह फिर कहने लगा, ”कहो! हमारे बीच चाहतों का, नज़दीकियों का रिश्ता है फिर ये झिझक क्यों ?’ वह ख़ामोश हो गया। वह आहत नज़रों से उसे कुछ देर तक देखती रही फिर उसने नज़र फेर ली।
उसकी साकित नज़रें दूर आसमान पर एक मंज़र में उलझ गईं जहाँ अचानक गरजते, शोर मचाते, घने मटियाले बादलों का रेला हरी हरी चमकती हुई पहाड़ की चोटियों को अपने अँधियारे काले धुंए में ग़ायब करने के लिए झुका आ रहा था। और पानी के किनारे एक चट्टान पर नीले, फ़ीरोज़ी और गहरे लाल परों वाला ख़ूबसूरत नील कंठ बे-ख़बर मछलियों की घात में अपनी लंबी शिकारी चोंच ऐसे बंद किए बैठा था जैसे कभी उसे खोलता ही न हो। दानिशवर ने उसे ग़ौर से देखते हुए एक दूसरा अंदाज़ अपनाया कि वह उस के बारे में सब जानता था। उसने अपनी कोई बात उससे छुपाई ना थी। वह उसकी उसूल परस्ती को भी जानता था और ये भी जानता था कि वह उस के बारे में किस तरह के भाव रखती है। वह अपने नफ़ीस अंदाज़ में फिर से बात करने लगा।
‘ये बुत बनी क्या सोच रही हो? इस क़दर ख़ामोश क्यों हो? शायद तुम्हे कोई उलझन है, जिसने तुम्हें इसी तरह ज़िंदगी के नर्म और ख़ुशनुमा पहलुओं से दूर रखा है। तुमने रेशम के कीड़े की तरह अपने चारों ओर यह कठोर जाल क्यों बना रखा है? एक दिन इसी में तुम्हारी साँस घुट जाएगी। ग़ैर–ज़रूरी बातों को इतनी अहमियत मत दो। मैंने अक्सर तुम्हारे चेहरे पर बेहद संभले हुए से भाव देखे हैं जिन तक पहुँच पाना हर किसी के लिए मुश्किल है, तुम इंसान हो, अपने ऊपर इतना ज़ोर क्यों डालती हो? छोड़ दो इन झूठे Illusions को। बी ए प्रैक्टीकल गुड गर्ल!, दिलों को जिस्मों से यूं अलग मत सोचो। इस वजूद की वजह से ही हम मिले।‘
वह कहे जा रहा था। आगे जाने फिर उसने और क्या-क्या कहा। मगर वह सुन ही कब रही थी। वह तो पानी को देख रही थी। जाने क्या सोच रही थी। शायद यही कि अगर पानी का कोई रंग होता तो वह कभी अपना रंग न बदलता। नीले आसमान तले नीला न हो जाता और हरियाली के बीच हरा न नज़र आता। और कभी अचानक सब रंग झाड़कर इस बग़ैर नाम के रंग में न लौट आता। मगर ये ही तो पानी की असल पहचान है कि बहता है तो हर रंग समेट लेता है और ठहरता है तो असली शक्ल में उभर आता है। दानिशवर कह रहा था, ”तुम्हारी समझ में ज़िंदगी का एक नया अर्थ आएगा। तुम्हारे विचारों की उड़ान को नया आसमान मिलेगा ! वह कुछ नहीं सुन रही थी। उसे अपनी गर्दन थकी थकी महसूस होने लगी। उसने अपनी ठुड्डी अपने घुटने पर टिका दी। आँसू का एक क़तरा उस के पांव पर गिरा, लुढका और मिट्टी में समा गया।
सहसा उस के अंदर की बेदार औरत को ध्यान आया कि इस वक़्त उसे किसी बहुत ज़रूरी काम का याद आना कितना आवश्यक है। उसने दूसरी आँख की पलक पर अटके हुए आँसू को चुपके से बह जाने दिया और भीगी आँखों को मूंद कर उनकी नमी को कहीं अंदर जज़्ब कर के दानिशवर की तरफ़ कहने के लिए मुड़ी कि उसको कोई ज़रूरी काम याद आ गया है मगर वह उससे भी पहले उठ चुका था और अपने बालों में कंघा कर रहा था। उसका सामना होते ही बोला, ”याद ही नही रहा आज मेरी एक ज़रूरी मीटिंग थी। अभी आधे घंटे में शुरू होने वाली है। चांस ले लेता हूँ, हो सकता है पहुँच जाऊं। रास्ते में तुम्हें भी Drop करता चलूँगा….. ।
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उर्दू की प्रसिद्ध लेखिका एवं शायरा तरन्नुम रियाज़ का जन्म 9 अगस्त 1960 में कश्मीर में हुआ। तरन्नुम रियाज़ पुरुष सत्तात्मक समाज में नई औरत की समस्याओं के सृजनात्मक वर्णन के लिए जानी जाती हैं। साल 2014 में उन्हें अपने लेखन के लिए सार्क साहित्य पुरुस्कार से नवाज़ा गया। भादों के चाँद तले, पुरानी किताबों की ख़ुशबू, बर्फ़ आश्ना परिंदे उनकी मशहूर रचनाएँ हैं। 20 मई 2021 को कोविड-19 से उनकी मृत्यु हुई। ‘और हिंदी‘ के लिए इस कहानी का अनुवाद फ़हमीना अली ने मेहनत से किया है। इसके लिए हम उनके शुक्रगुज़ार हैं। उर्दू की ऐसी ही अहम कहानियों को पढ़ने के लिए आप ‘और हिंदी‘ का पहला अंक नीचे दिए गए मेल आई डी और फ़ोन नम्बर हासिल कर सकते हैं।
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