ये बात तो वो जानता था कि औरत कई तह-दर-तह और पेच-दर-पेच घुंडियों से बनी हुई है। मगर ये कि औरत पहले लड़े, फिर कोसे, फिर ताने दे, फिर लड़ाई को जंग में तब्दील कर दे और मर्द पर इतने हथगोले फेंके कि उसकी रूह के चीथड़े उड़-उड़ कर माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल की खूँटियों पर लटक जाएँ और जब उनमें से क़तरा-क़तरा होकर हसरतों का ख़ून टपकने लगे, तो मजबूर और ज़ख़्मी मर्द से फिर वो चित लेट कर शुरू से आख़िर तक पूरा प्यार कराए और फिर इस तरह सुकून से सो जाए जैसे उन दोनों में ठनी न है। इसका उसे इल्म नहीं था।
तूफ़ान गुज़रने के बाद उजड़े हुए आशियाने को बनाना ख़ुद-एतिमादी का उनवान होता है, मगर जब बार-बार सैलाब और आँधियाँ आकर दीवारों को गिराएँ और सामान बहा ले जाएँ, तो आदमी थक-हार कर हाथ-पाँव डाल देता है। हुवैदा कई महीनों से उस्मान के पुर्ज़े उड़ा रही थी, जिन्हें वो फिर जोड़ लेता। ये उसका बड़ा कारनामा था। हुवैदा के अंदर बेज़ारी और ग़ुस्से की चिंगारियाँ भरी रहतीं मगर उस्मान हमेशा से समझदारी से काम लेता।
वो अपने दोस्तों और उनकी बीवियों से हुवैदा को अम्न और राहत की ख़ातिर मिलवाता मगर हुवैदा घर पहुँचते-पहुँचते आग-बगूला हो जाती। ग़ुस्से की चिंगारियाँ छिपा लेती, जो रात को अनार बन कर फूटतीं और ख़तरनाक बारूद के पटाख़े और टोटके बनकर उस्मान के मर्दाना वक़ार और अना के लिए ख़तरा खड़ा कर देतीं। वो इस दम-ब-दम भड़कने वाली आग से अपनी रूह के लिबास को बचाने की बार-बार कोशिश करता मगर लगातार होने वाले धमाके उसे परेशान कर देते। एक चिंगारी ऐसी लगती कि लिबास जल कर राख हो जाता।
“तुम्हारा शमशाद की बीवी से तअल्लुक़ है, मैंने उसकी शोहरत भी सुन ली, आँखों से भी देख लिया। अफ़ज़ाल की बीवी तुम्हारे साथ इतनी बे-तकल्लुफ़ क्यों है? तुम किसी को तो छोड़ दो। डायन भी चार घर छोड़ देती है।” उस्मान की रूह के पुर्ज़े उड़ते, घर को आग दिखा दी जाती। एहसासात उलझने लगते। मजबूर और दीवानी परछाइयाँ रूह के चारो ओर नाचने लगतीं। वो अपने मर्दाना वक़ार पर इन हमलों की ताब नहीं ला पाता। उसकी सोच जवाब दे जाती। उसका ज़हन रुक जाता। वो निढाल और बेबस होकर कुर्सी पर गिर पड़ता। उसकी झोली में मुरझाए हुए फूलों के सिवा कुछ नहीं होता। वो बेबसी से सितारों को देखता, रात के सन्नाटे को सुनता। उसके अंदर ज़ख़्म खाए हुए सांप की तरह इंतिक़ाम का जज़्बा जागता, फिर उसकी उलझन और बेचैनी देखने को सितारों भरे आसमान की पुर-सुकून झिलमिलाहट जैसे उस पर झुक जाती।
सफ़ाई की गवाहियाँ, सबूत और बयानात थकन से चूर-चूर होकर गिर पड़ते।
“तुम्हें मुझसे प्यार नहीं रहा।”
“कौन कहता है?” उस्मान हुवैदा पर झुक जाता। झिलमिलाहट खिसक कर दूर वहीं अपनी जगह जाकर मुस्कुराने लगती।
रात का अंधेरा गहरा होते-होते बहुत गहरा हो जाता। फिर सुबह का सितारा नुमूदार होता तो फूल और काँटा एक जान हो गए होते।
हुवैदा उस्मान के बाज़ुओं में बड़े सुकून से सोई पड़ी होती।
जब से उस्मान की झोली में शमशाद और अफ़ज़ाल की बीवियों को डाल दिया गया था, उन औरतों से उस्मान के लिए निगाह मिलाना मुश्किल हो गया था। कहीं देख लेता तो निगाहें दूसरी तरफ़ फेर लेता। उसने हुवैदा की ख़ुशी के लिए शमशाद और अफ़ज़ाल से मिलना छोड़ दिया था, मगर हुवैदा अब भी मुतमइन नहीं थी। हर औरत उसकी बैरन थी। दोनों जिस जगह जाते वो उस्मान पर निगाह रखती कि वो किसी औरत से दो बातों से तीसरी बात न करने पाए। और अगर किसी से ज़रा लंबी बात हो जाती तो उस्मान की शामत आ जाती। ‘क्या कहती थी? तुमने क्या कहा? तुम्हें क्या ज़रूरत थी उससे बात करने की?’
मिसेज़ मिर्ज़ा हुवैदा की नई दोस्त बनी थी। एक पार्टी में उस्मान ने उससे इतना पूछ लिया, “मिर्ज़ा कहाँ हैं?”
“कराची।”
“कब आएँगे कराची से?”
उस दिन तारों भरे आसमान के नीचे दोनों अपनी-अपनी आराम-कुर्सियों पर इस तरह मोर्चे संभाल कर बैठ गए जैसे कोई भयानक जंग होने वाली हो।
हुवैदा ने हमला किया, “तुम्हें क्या ज़रूरत थी दख़्ल देने की। मिर्ज़ा कहाँ हैं और कराची से कब आएँगे। क्या तुम मिर्ज़ा की ग़ैर-मौजूदगी में मिसेज़ मिर्ज़ा के ख़ाविंद बनना चाहते हो?”
उस्मान की अना की गर्दन टूटते-टूटते बची। हमला-आवर ख़ुद कुर्सी पर न बैठे होते तो कुर्सियाँ चल जातीं।
“देख हुवैदा, ज़बान क़ाबू में रख।”
“तुम दोनों भाई हरामज़ादे हो।”
उस्मान तड़प उठा। उसका हाथ तमाचे के लिए हवा में लहरा कर रुक गया, मगर उस्मान का गिरेबान हुवैदा के हाथ में आकर चिरी-बत्ती हो गया।
वो उस्मान के कितने क़रीब होकर कितनी दूर हो गई थी। उस्मान ने अपने नंगे सीने के साथ उसे चिमटा लिया। ग़ुस्से और ज़हर की चिंगारी पर बर्फ़ पड़ गई। वो सिसकियाँ भर-भर कर रोने लगी। एकाएक चाँद पर बदली की झालर लटक गई। ज़नानियत के रेशमी हुस्न के बंद खुल गए। फिर उस्मान की ज़ख़्मी और लंगड़ी रूह उसे रेंगने, पेलने में लग गई।
वो अपनी चारपाई पर लेट कर जज़्बात के उन उलझते-सुलझते उतार-चढ़ावों को समझने की कोशिश करने लगा जो उसकी सोच के दायरे से परे थे। इस ऊपर से ठूँसे जाने वाले मैकेनिकी अंदाज़-ए-मुहब्बत से उसकी रूह का सारा लुत्फ़ और रस का सारा मज़ा रुख़सत हो चुका था। ज़ख़्मी जज़्बात के होते हुए मुहब्बत उमड़ कर कैसे आए? ये कड़ी आज़माइश उसके लिए रूह की तकलीफ़ बन गई थी, जैसे थके-हारे हिरन से कोई लंबी-लंबी कुलाँचे भरने को कहे और हिरन की आँखों में बेबसी और मजबूरी दिखाई देने लगे।
वो सोचने लगा, कितने ख़ुश-नसीब होंगे वो शौहर जिनकी बीवियाँ दूसरों से लड़ती-झगड़ती होंगी मगर अपने ख़ाविंदों से सुलह रखती होंगी।
“मैं कहता हूँ ये साहब का हौसला है। अपनी जोरू ऐसी हो तो गर्दन काट के रख दूँ, सात सलाम हों ऐसी नौकरी को।” ड्राइवर ने रोज़ की तनातनी देखी तो नौकरी छोड़ कर चल दिया।
एक रोज़ उस्मान बाग़ीचे में बैठा अख़बार देख रहा था। हुवैदा पास आकर बैठ गई। एक लम्हे के लिए उस्मान ख़ुश हुआ कि ज़िंदगी कितनी अच्छी है। हुवैदा ने नज़र घुमा कर इधर-उधर देखा और बोली:
“अच्छा, मालिन को देख रहे हो!”
“क्या?” उस्मान भौचक्का रह गया।
“वो सामने बैठी बच्चे को छातियों से दूध पिला रही है, हरामज़ादी के लिए जैसे यही जगह रह गई थी!”
उस्मान ने हड़बड़ा कर देखा। दूर पौधों के पीछे मालिन गोद में बच्चे को लिए बैठी थी। मगर उसे ये अब मालूम हुआ था।
हुवैदा उठकर नौकरों के क्वार्टरों की तरफ़ चल दी। उस्मान ने दिल में कहा, हुवैदा की चाल कितनी अच्छी है। फिर क़दमों की चाप सुनकर उसने अख़बार चेहरे के सामने से हटाया तो हुवैदा और मालिन उसकी तरफ़ चली आ रही थीं। मालिन की क़मीज़ पर जहाँ उसकी दूध से उबलती छातियों की अकड़ाहट थी, गीले दूध के धब्बे थे जैसे वो बच्चे के मुँह से दूध खींच कर चली आई हो।
“मेरे मियाँ तेरे साथ कोई बात करना चाहते हैं। यहाँ, उनके पास बैठ जा, कुर्सी पर बैठ।”
हुवैदा की ज़बान में सख़्त ज़हर भरा हुआ था।
मालिन परेशान होकर कभी उस्मान और कभी हुवैदा की तरफ़ देख रही थी। उस्मान के जज़्बात एक दम भड़क उठे। उसका जी चाहा कि उठकर मालिन के सामने हुवैदा के मुँह पर दो-तीन जड़ दे कि लो ये होता है नतीजा मर्द की अना को बार-बार तपती सीख़ों से दाग़ने का। मगर उसका मिज़ाज रूह की धज्जियाँ जोड़ने और ग़ुस्सा पी जाने का कारनामा सर-अंजाम दे गया।
अगले रोज़ सुबह माली और उसकी बीवी ने क्वार्टर ख़ाली कर दिया। माली के चले जाने से हुवैदा को कोई तकलीफ़ न हुई मगर ड्राइवर के चले जाने से बड़ी दुश्वारी हो रही थी। पड़ोस की कोठी का ड्राइवर एक जान-पहचान वाले को ले आया और बोला, “बेगम साहिबा, दिलावर ख़ान एक इंग्लिश कंपनी में मुलाज़िम था। बड़ी अच्छी गाड़ी चलाता है मगर अब बुरे दिन आ पड़े हैं। आप जो तनख़्वाह देंगी उसे मंज़ूर होगी।”
हुवैदा ने पहले गाड़ी चलवा कर देखी, फिर सौ रुपये तनख़्वाह मुक़र्रर हो गई। लाने वाले ने कहा, “इसकी बीवी-बच्चे किसी पराए घर में पड़े हुए हैं। अगर इसे मुलाज़िमों के क्वार्टरों में जगह मिल जाए तो बेफ़िक्री हो जाएगी।”
“हाँ, क्यों नहीं।”
दिलावर ख़ान बीवी और चार बच्चों के साथ क्वार्टर में रहने लगा। कपड़े बच्चों के तन पर कहाँ थे। दोनों बड़े बच्चे, गंदे से चीथड़े पहने फिरते और छोटे दोनों नंग-धड़ंग फिरा करते। बीवी बुर्क़ा पहनती और सख़्त पर्दा करती। उस्मान दौरे से आया तो उसने कोठी के अहाते से गुज़रने वाले उन गोरे-गोरे मगर मैल से अटे बच्चों को देख कर पूछा, “ये कौन हैं?”
“ड्राइवर के बच्चे हैं। आपके पीछे मैंने ड्राइवर रख लिया है।”
“गाड़ी ठीक चलाता है?”
“जी हाँ।”
ड्राइवर ने आकर सलाम किया। उस्मान ने उसकी पहली नौकरियों का आगा-पीछा पूछा, फिर लाइसेंस देख कर बोला:
“तुम्हारे बच्चे बहुत हैं, इन्हें साफ़ रखा करो। क्या तुम्हारा कोई बच्चा मुँह नहीं धोता, बड़े गंदे रहते हैं?”
“नहीं साहब, अब साफ़ रहेंगे। अस्ल में ग़ुर्बत बड़ी रही है सरकार! बड़ा लड़का ग्यारह-बारह बरस का है, अगर इसे कहीं नौकरी दिला दें तो दुआएँ दूँगा।”
“करा देंगे। जाओ गाड़ी साफ़ करो।”
दिलावर ख़ान के क्वार्टर की खिड़की हुवैदा के सोने के कमरे के रुख़ पर थी। जब उस्मान के दफ़्तर चले जाने के बाद खिड़की खुलती तो सामने गोरी-चिट्टी औरत नज़र आती, जिसका लिबास अक्सर सुर्ख़ होता, जिसमें वो सोने की तरह दमकती रहती।
एक दिन कार में हुवैदा ने दिलावर ख़ान से कहा, “ड्राइवर, तुम्हारी बीवी बड़ी ख़ूबसूरत है।”
“जी हाँ, बेगम साहिबा, पाँच बच्चे पैदा करने पर भी उसकी काठी बड़ी मज़बूत रही है।”
“तुम्हारे चार बच्चे हैं या पाँच?”
“जी, एक मर गया था।”
धूप का रंग अब पीला हो गया था और उसमें तेज़ी भी कम होने लगी थी। रात को ठंड हो जाती। कौवे दरख़्तों और मुंडेरों पर काँव-काँव करते फिरते। एक दिन उस्मान और हुवैदा बरामदे में बैठे थे। हुवैदा ट्रंकों में से गर्म कपड़े निकाल-निकाल कर दीवान पर रख रही थी, जिनमें से इक्का-दुक्का फिनाइल की गोलियाँ नीचे गिर रही थीं और बच्चे साल भर आँखों से ओझल रहने वाले कपड़ों को देख-देख कर, उठा-उठा कर ख़ुश हो रहे थे।
कुछ फुटकल माल हुवैदा ने एक तरफ़ ढेर कर दिया। उस्मान का एक पुराना कोट जिसे पहनना वो छोड़ चुका था, उसने उठा कर पूछा, “ये तो आप नहीं पहनते, ड्राइवर को दे दें।”
“दे दो।”
उसने ड्राइवर को बुलवा कर कहा, “ड्राइवर, ये हमारे बच्चों के कपड़े हैं, तुम्हारे बच्चों को आ जाएँगे। ये कोट तुम्हारे लिए है।”
ड्राइवर गठड़ा उठा कर दुआएँ देता चला गया। क्वार्टर की तरफ़ से बच्चों का शोर सुनाई दिया जो ख़ुशी से बे-लगाम थे। फिर ड्राइवर की आवाज़ सुनाई दी: “ओ कमीनों, अभी रहने दो, जब सर्दी शुरू होगी तब पहनना।”
घुटनों चलता गोद का बच्चा पौधों की ओट से बाहर निकल आता और उसे उठाने को जब वो लपकती तो ड्राइवर की बीवी की झलक दिखाई देती। एक रोज़ हुवैदा ने देखा, कार में बैठते वक़्त उस्मान की निगाहें क्वार्टर की तरफ़ उठी थीं। फिर ये वाक़िआ हुआ कि उस्मान दफ़्तर जाने के लिए कपड़े बदल रहा था कि इधर खिड़की का पर्दा उठा हुआ था, उधर दिलावर ख़ान के क्वार्टर की खिड़की के पट खुले थे।
“मैं इस हरामज़ादी को तो आज ही निकाल बाहर करती हूँ!”
“किसको?” उस्मान ने शीशे में नेक टाई बाँधते हुए पूछा।
“जिसको आप देख रहे हैं, जिसने खिड़की खोल रखी है।”
हुवैदा एक दम से बाहर चली गई और उसने चिल्ला कर आवाज़ दी, “ड्राइवर, इधर आओ!”
दिलावर ख़ान जो गाड़ी साफ़ कर रहा था “जी” कहकर लपका। हुवैदा ने उससे कहा, “मैंने पहले रोज़ कह दिया था कि ये खिड़की साहब के दफ़्तर जाने के बाद खुलेगी, कहा था ना। अभी साहब दफ़्तर नहीं गए। तुम्हारी बीवी ने ये खिड़की क्यों खोली है?”
उसने जाकर कुछ कहा। खिड़की खट से बंद हो गई।
उस्मान को जब गाड़ी छोड़ आई तो हुवैदा बाज़ार चली गई। जब आई तो स्कूल का वक़्त हो गया था। उसने ड्राइवर को बच्चों को लेने स्कूल भेज दिया। नौकर को दिलावर ख़ान की बीवी को बुलाने भेजा और ख़ुद बरामदे में बैठ गई। नौकर ने आकर कहा, “वो कहती है मुझे घर से बाहर क़दम रखने की इजाज़त नहीं।”
“अच्छा, ये बात है!” हुवैदा ग़ुस्से में उठी और दो क़दमों में मुलाज़िमों के क्वार्टरों तक जा धमकी। दिलावर ख़ान की बीवी बर्तन धो रही थी। “मैंने तुम्हें बुलवाया था। तुमने कहा मुझे घर से बाहर क़दम रखने की इजाज़त नहीं। इतनी नवाबज़ादी हो तुम, मुझे पता नहीं था, मगर इतना पता है कि तुम वक़्त-बे-वक़्त खिड़की खोल कर अपना जोबन मेरे मियाँ को दिखाती रहती हो। मैंने सोचा था साहब से आज तुम्हारी मुलाक़ात करा दूँ, दोनों की बेचैनी दूर हो जाए।”
दिलावर ख़ान की बीवी का रंग लम्हा भर के लिए पीला पड़ गया। वो हाथ धोकर उठ बैठी और बोली, “मेरे ख़ाविंद को तो तू जोबन दिखाती फिरती है, तेरी बेचैनी दूर हो जाती है। जब कंधे से कंधा मिला कर मेरे ख़ाविंद के साथ चढ़ बैठती है गाड़ी में और घूमती फिरती है अकेली!”
हुवैदा को महसूस हुआ जैसे उसने ग़लत औरत पर हाथ डाल दिया। “ज़ियादा बात की तो ज़बान खिंचवा दूँगी!”
“चच-चच! मुँह धो के आ।” दिलावर की बीवी ने हवा में हाथ नचाए।
“बड़ी एहसान-फ़रामोश हो, कमीनी! मैंने रहम खाकर तेरे बच्चों को कपड़े दिए।” हुवैदा ज़रा नर्म होकर पैंतरा बदलने लगी।
“मेरे बच्चों को! अपने यार को कोट देने की ख़ातिर दिए होंगे। पर तुम्हें बता दूँ, तेरे ऊपर थूकेगा भी नहीं मेरा ख़ाविंद। अपना सीना देख ढला हुआ लौगड़ माल और ये देख रूई का गाला।”
उसने सीना छलकाया। फिर अपना गिरेबान फाड़ डाला। हुवैदा की हालत क़ाबिल-ए-रहम हो गई। बड़ी जुरअत करके कह सकी, “बे-हया!”
“बे-हया तुम! अपनी खिंची हुई कमानियाँ देख।”
हुवैदा ने ग़ुस्से से नज़र फेर कर देखा। भंगी, बावर्ची और मशालची सब बाहर आन खड़े हुए थे। हुवैदा ने मशालची से कहा, “जाओ, पुलिस को बुला लाओ, इस कमीनी का दिमाग़ ठीक करा दूँ।”
“बुलाओ जल्दी बुलाओ, मैं कहूँगी मेरे ख़ाविंद से तअल्लुक़ है तुम्हारा और तुम्हारा कपड़ों का एहसान, चच-चच!”
उसने कपड़ों को ढेर किया, मिट्टी का तेल छिड़का और आग लगा दी। ख़ुद ग़ुस्से में आग-बगूला बनी पास यूँ खड़ी हो गई जैसे बे-नियाम तलवार। “ख़ुदा करे मेरे बच्चे नंगे फिरें पर तुम जैसी का दिया न पहनें!” कपड़े भड़-भड़ जलने लगे और वो कूक भरे खिलौने की तरह बोलती रही।
दिलावर जब स्कूल से बच्चों को लेकर आया तो ताँगे में कबाड़-ख़ाना लदा हुआ था। वो अपनी बीवी के गुस्ताख़ाना सुलूक का सुनकर बड़े ग़ुस्से में अपने क्वार्टर की तरफ़ बढ़ा, जैसे बीवी को आज पीट डालेगा। मगर ठंडे क़दम वापस आकर बोला, “आपने मेरी बीवी की इज़्ज़त पर इल्ज़ाम लगाया है बेगम साहिबा, हम यहाँ नहीं रहेंगे।”
ताँगा हुवैदा के सीने पर मूँग दलता, कोठी की बजरी को चरचराता हुआ निकल गया। बच्चे हुवैदा का मुँह तकने लगे। यूँ महसूस हो रहा था जैसे इस तांगे में उसकी इज़्ज़त का दिवाला पिट कर निकल गया।
उस्मान आया तो हुवैदा चुपचाप बैठी थी। उस्मान ने हुवैदा के उतरे हुए चेहरे को देख कर पूछा, “तुम इस तरह चुपचाप क्यों बैठी हो?”
हुवैदा की आँखों में आँसू आ गए। उसने सारा वाक़िआ सुना डाला।
“और ये नौकर खड़े उस औरत का मुँह देखते रहे। इन्होंने कुछ नहीं कहा!”
हुवैदा रूहाँसी होकर बोली, “कुछ नहीं।”
उसने हुवैदा को सीने से लगा लिया और उसकी निगाह उस राख पर जा पड़ी जहाँ से चीथड़े के सुलगने से काले धुएँ में बल खाती हुई लकीर ऊपर को उठ रही थी, जिसे देख कर उस्मान के पेट की गठरी में से ख़ुशी का एक मीठा-मीठा सा बुलबुला फूटा। वो थोड़ा सा मुस्कुराया। फिर उसने हुवैदा का सर चूम लिया और बोला, “दफ़ा करो तुम, समझो कोई बात नहीं हुई।”
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आग़ा बाबर उर्दू के मशहूर अफ़साना-निगार और ड्रामा-निगार थे। उनका असली नाम सज्जाद हुसैन था और वे 31 मार्च 1919 को बटाला, ज़िला गुरदासपुर में पैदा हुए। उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर और पंजाब यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल की। तक़सीम के बाद पाकिस्तान चले गए और सरकारी इदारों से जुड़े रहे। उनके मशहूर कहानी संग्रहों में ‘चाक गिरेबाँ’, ‘लब-ए-गोया’ और ‘कहानी बोलती है’ शामिल हैं। 25 सितंबर 1998 को न्यूयॉर्क में उनका इंतक़ाल हुआ। ये कहानी इंसानी फ़ितरत में रश्क, हसद, जलन और शक के साथ साथ, ख़ुद पर भरोसे की कमी से पैदा होने वाले हालात को दिलचस्प अंदाज़ में बयान करती है।