अनजान जज़ीरों पर क़याम के दौरान
एक असातीरी नज़्म की मलगजी रौशनी में ढलते ही
अपनी एड़ियों पर घूम कर
एक दूसरे की जादुई उँगलियों से
हमने अपने गिर्द दायरे खींचे
खुद को बाज़याफ़्त
और
एक नया सय्यारा दरयाफ़्त करने के लिए
वो सय्यारा
जहाँ
देस… बस्ती और घर बसाए बिना
उम्र भर क़याम किया जा सकता हो
***
सोने और जागने की हालत में
ऐ मेरी नींद
तू वक़्त की तस्लीस से आज़ाद
एक बे-कराँ दायरे में खड़ी है
ऐसा जादुई दायरा
जहाँ प्यास बुझाने की चाह
आब-ए-हयात है
जहाँ
बीता हुआ कल
आने वाले कल से ज़ियादा तेज़ रफ़्तार
ज़ियादा
चाबुक-ओ-चुस्त है
ब-शर्ते कि तू ग़फ़लत से काम न ले
क्योंकि
सुस्त रफ़्तार जिस्म
और बर्क़ रफ़्तार उम्र
दोनों से बहुत आगे
बहुत… दूर है तेरे ख़्वाब की मंज़िल
***
उक़ूबत-ख़ाने में पहुँचने वाले मुहब्बत-नामे
जब हथेलियों में मेख़ें गाड़ कर
उन्होंने मेरे सारे नाख़ुन उखाड़ डाले
तब ज़ख़्म-ख़ुर्दा समाअत पर मंतर फूँकने के लिए
बिजली के झटके देने वाली कुर्सी पर बैठी मौत
उक़ूबत-ख़ाने पहुँचने वाले सरकश मुहब्बत-नामे
बा-आवाज़-ए-बुलंद पढ़ रही थी
ऐ मेरे ख़ुश-रू नामा-निगार!
मौत हमेशा से ज़िंदगी की मोनिस-ओ-ग़म-ख़्वार है
हमेशा से हम-जलीस-ओ-हम-मशरब
हमेशा से मोहसिन-ए-आज़म
इसके अलावा कौन है जो उखड़ती हुई साँसों की मुश्किल आसान करने
और ख़ून रोती हुई आँखों में नींद घोलने के लिए
चाहने वालों के मुहब्बत-नामे उक़ूबत-ख़ानों तक पहुँचाए?
***
काफ़्का की याद में दो नज़्में
(1)
अगर
वाइलिन की ये मख़मूर
ख़ुश-कुन
सुरीली धुनें
तुम ग्रेगर साम्सा के कानों से सुन लो
तो
अपनी समाअत पर
बहरेपन को तरजीह दो
(2)
सुनो! लोग शायरों को पसंद नहीं करते
भीड़ में अगर उन्हें कोई शायर नज़र आ जाए
तो शोला-बार निगाहों से उसे दाग़ने की कोशिश करते हैं
उसकी बूद-ओ-बाश का तमसख़ुर उड़ाते हैं
और अगर उसका पता मालूम हो जाए
तो फ़िक़रों के छोटे-बड़े ढेले उसके दरवाज़े पर मारते रहते हैं
वो उसे ग़ैर-मुल्की जासूस
ग़द्दार
आदी मुजरिम
या किसी दूसरे सय्यारे की मख़लूक़ समझते हैं
इसलिए! यह मेरे मख़्तूतात
सिर्फ़ उन ख़ुफ़िया हाथों तक पहुँचाना
जो रौशनाई में डूबे हुए हों
ब-सूरत-ए-दीगर
काफ़्का की आख़िरी नसीहत याद रखना
***
इख़्तिलात
मैंने कहा
तुमसे मिलने के लिए
मैं अपनी उम्र के बाइसवें साल का इंतिख़ाब करूँगी
या फिर बासठवें….
उसने पूछा और मेरे लिए कौन सा सिन?
मैंने कहा चौबीस, इक्कावन
या शायद बहत्तर
बस कि
सदियों बाद
जब हम मिले
तो कोई कम-सिन था
और न कुहना-साल …..
क्योंकि उम्र की सारी गिनती पहले बोसे पर ख़त्म हो गई
और एक दूसरे में उतरने के लिए
माह-ओ-साल के नए-पुराने तमाम लिबास हमने एक-एक कर के उतार फेंके
***
पेशानी का बोसा
क्या मैं सोई हुई थी
कि
जब ख़्वाब में
तुमने धीरे से माथे का बोसा लिया
या कहीं अंदरूंँ
(जुज़ प-ए-दिलबरी)
आज रंग-ए-हक़ीक़त था बदला हुआ?
जब मेरी ताक़-ए-अबरू के मअबद तले
इक लरज़ता हुआ दीप रौशन हुआ
दीप की जोत क्या थी?
लबों पर लरज़ती हुई इक दुआ?
वो दुआ जिसका फैलाव है बे-कराँ
बे-कराँ था वो पल?
मेहरबाँ था वो पल?
सुबह-ए-काज़िब में जब
आज पेशानी का तुमने बोसा लिया
***
कौन होगा भला
(सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘पाथेर पांचाली‘ के किरदारों दुर्गा, अप्पू और इंद्र ठकुराइन से मुतास्सिर होकर लिखी गई नज़्म)
कौन होगा भला
जिसने खाया न हो
कोई चोरी का फल
जिसने जंगल, चमन, बाग़, आँगन कोई ताक रक्खा न हो
जिसके पाँव कहीं लड़खड़ाते न हों
कौन होगा भला
जिसकी आँखें किसी छल से ख़ाली न हों
जो सँभलते-सँभलते
गिरा ही न हो
जिसने अपना लहू चाट रक्खा न हो
जिसके दामन पे कोई भी छींटे न हों
झूमते हैं मगन चोट खाए हुए
आम और बेरियाँ
पेड़ अमरूद के
एक हरियल हूँ मैं
भूख के दाम में
सब्ज़ पेड़ों तले उड़ के आया हुआ
चोंच में जिसकी है एक पीपल का फल
एक भूखे शिकारी ने जिसकी तरफ़
तान रक्खी है गन..
कौन होगा भला भूख ने धूल जिसको चटाई न हो
ख़ून में जिसके वहशत समाई न हो…
***
नैना आदिल कराची की मशहूर शायरा और नाविल निगार हैं। उनकी शायरी में गहरी सोच, सादगी और खूबसूरत नग़्मगी मिलती है। उन्होंने शायरी के साथ उपन्यास, कहानियाँ और मज़ामीन भी लिखे हैं। उनके मशहूर मजमूओं में ‘शब्द‘ और ‘गुल-ए-रक़्साँ‘ शामिल हैं, जबकि वो ‘मुक़द्दस गुनाह‘ और ‘कोख‘ जैसे दो उपन्यास भी लिख चुकी हैं। नैना आदिल की इन नज़्मों का इंतिख़ाब ‘और हिंदी‘ के लिए उन्हीं की तरफ़ से किया गया है। इन नज़्मों से उनके लहजे की बेबाकी और रवानी को महसूस किया जा सकता है। नैना आदिल इंसानी ज़िन्दगी की पेचीदगियों, रूमान और लतीफ़ जज़्बात के साथ साथ ज़हनी बग़ावत जैसे मामलात पर कमाल लिखती हैं।