जब फ़ख़रू सिरसी से संभल आया तो उसने धोती की जगह तहबंद बाँधा, कमरी उतार के कुर्ता पहना, संभल से मुरादाबाद पहुंचा तो तहबंद की जगह पाजामे ने और कुर्ते की जगह क़मीज़ ने ले ली। सिरसी में वह अलिफ़ के नाम लठ्ठा नहीं जानता था, संभल में हमारे मामूं ने उसको उर्दू लिखना पढ़ना और ए, बी, सी, डी सिखाई और मुरादाबाद पहुँच कर तो वह इतना तेज़ हो गया कि हमारे बैरिस्टर मामूं जो अंग्रेज़ी की किताब कहते वह अलमारी से निकाल लाता। क़ानून की एक एक किताब पहचानने लगा। सब क़िस्से, दास्तानें, रिसाले, नॉविल उसे मालूम हो गए।
लेकिन इस तमाम तरक़्क़ी के बावजूद एक कमी उसकी शख़्सियत में रह गई कि वह बूट जूता नहीं ख़रीद सका, बूट उस वक़्त भी काफ़ी महंगे थे और पांच रुपिया महीने में से तीन रुपिया घर भेजने और एक रुपिया फ़ाख़री दादी के पास जमा कराने के बाद बचता ही क्या था जो फ़ख़रू बूट जूता भी ख़रीद लेता। दो आना महीना मस्जिद की चराग़ी, दो आना यतीमख़ाने का चंदा, फिर महीने में दो बार हजामत, बीड़ी, माचिस, सर का तेल, कपड़े धोने का साबुन….ये सब कोई मुफ़्त तो आता नहीं था। इसी लिए उसकी शख़्सियत में ये कमी रह गई। और दूसरी कमी उसकी ज़हनियत में रह गई कि वह नमाज़ पढ़ने से बराबर इंकार करता चला गया। तरक़्क़ी के किसी भी स्टेज पर उसने नमाज़ नहीं पढ़ी, इस मामले में हमारे बैरिस्टर मामूं को उसका ये सिरसी के अड़ियल बैलों वाला रवैया सख़्त ना-पसंद था।
बैरिस्टर मामूं कई साल विलायत रहे थे, सूट पहनते थे, अंग्रेज़ी फ़र्राटे से बोलते थे मगर नमाज़ पाँचों वक़्त की पढ़ते थे। जब वह नमाज़ के लिए बुलंद आवाज़ से अज़ान देते तो बाक़ी घर वालों की सिट्टी गुम हो जाती थी और हर शख़्स उनकी गरजदार आवाज़ के रौब में आकर फ़ौरन नमाज़ पर खड़ा हो जाता था। हमारे नाना जब तक जिए इस बात पर फ़ख़्र करते रहे कि उनके कई दोस्तों के बेटे तो विलायत जा कर अपना दीन ईमान भूल गए। मगर उनका बेटा इतने दिन इंग्लिस्तान रहने के बावुजूद भी पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ता और तीसों रोज़े रखता था, अजी उसकी नमाज़ की तो रंडियाँ भी क़ायल थीं। ऐसी जने कित्ती ही औरतों को नमाज़ सिखा के उन गुमराहों की आक़बत उसने संवार दी थी। इसी लिए तो मामूं कहते थे कि फ़ख़रू के हाथ का तो पानी भी न पीना चाहिए, ये कभी एक टक्कर नहीं मारता। इसके दिल पर तो अल्लाह ने मुहर लगा दी, ख़ैर वह बेचारे क्या करते, अब अगर कोई ख़ुद ही जहन्नम का कुंदा बनना चाहे तो कोई कर भी क्या सकता है।
फ़ख़रू रोज़े तीसों रखता था, रमज़ान भर जो कुछ हो सकता ख़ैरात करता, मस्जिद में आने वालों के लिए बाहर की लालटेन में दो पैसे रोज़ का तेल अपने पास से डलवाता ताकि रास्ते पर रौशनी रहे और लोगों को आने जाने में आसानी हो। पर ख़ुद मस्जिद के अंदर नमाज़ पढ़ने कभी न जाता। और कामों से पचास फेरे मस्जिद के करता।
मामूं रमज़ान के दौरान कई बार उससे कहते, ”अबे फ़ख़रू, तेरे रोज़ों से फ़ायदा ही क्या है, तू बेकार फ़ाक़े करे है, बग़ैर नमाज़ के कहीं रोज़े होए हैं?”
”अजी बालिस्टर साहब, आपने जो किताब पढ़ाई थी, अजी वही मौली फ़रमान अली साब की लिखी वी दीनियात की पहली किताब तो विस में तो नमाज़ अलग वरक़ पर लिखी है और रोज़ा अलग वरक़ पर लिखा है, और यूँ तो उसमें कईं न लिखा कि रोज़ा बग़ैर नमाज़ न हो सकता या नमाज़ बग़ैर रोज़ा न हो सकती।”
अब इस खुली हुई मन्तक़ का मामूं के पास क्या जवाब था। वह उसे धुत्कारते हुए कहते, ”चल कम्बख़्त दूर हो, लाख तोते को पढ़ाया पर वो हैवां ही रहा।”
दिलचस्प बात ये थी कि फ़ख़रू ने कभी बैरिस्टर मामूं से इंकार भी नहीं किया था कि वह नमाज़ नहीं पढ़ेगा पर कुछ ऐसा हो जाता था कि वह साफ़ बच निकलता और फिर भी मज़े में रहता।
जैसे मग़रिब की नमाज़ के लिए मामूं मस्जिद जाने लगते तो फ़ख़रू से भी कहते, ‘अबे चल मस्जिद” मग़रिब की और सुबह की नमाज़ वह मस्जिद में पढ़ते थे। पहले घर में अज़ान देते, फिर मस्जिद में जा के नमाज़ पढ़ते, फ़ख़रू घर के उस कमरे की तरफ़ इशारा करता जहाँ मुअक्कल (जिन्न) बैठा करते थे और बड़ी मासूम सूरत बना के सरगोशी करता, ” अजी बड़ा मोटा मुअक्कल बैठा हैगा बालिस्टर साब, जो मैं तुम्हारे साथ चला जाऊँगा तो वह मछली की तनों खिसल (की तरह फिसल) जावेगा, तुम पढ़ियाओ नमाज़, जित्ते मैं उसे ज़रा चटपटी बातों में उलझाऊँ हूँ, और तुम भी ज़रा जल्दी ही लौटियो।”
अब इसके आगे मामूं क्या कहते। जब वह नमाज़ से वापस होते तो फ़ख़रू को मुअक्कल के साथ गप-शप करते पाते। कभी कभी वह सुबह तड़के फ़ख़रू को पुकारते, ‘अबे आ चले है मस्जि, मैं जारिया हूँ।”
वह चाय की नन्ही सी पतीली मांझता हुआ सन्दले पर बैठा बैठा ही बड़े इत्मीनान से जवाब देता, ”अजी तुम चलो, वो फ़ाख़री दादी को रात लरज़ा चढ़ गया ना विन के लिए दो पत्ती चाय दम कर के मैं अभी आऊँ हूँ, फ़रवटम, तुम चलो मीर साब।”
फ़ाख़री दादी बड़ी जलाली सैदानी थीं, घर के हर एक की बड़ी और बुज़ुर्ग। नव्वे से ज़्यादा तो उनकी उम्र थी, इसलिए उनको सबके हालात भी मालूम थे। हर एक की माँ का महर (वह राशि जो मुसलमानों के यहाँ निकाह के वक़्त दुल्हनों को देने का वादा किया जाता है) और उस महर पर जो झगड़ा हुआ था, हर के बाप चचा की डाली हुई धोबन या तेलन, सबकी हड्डी की मज़बूती या कमज़ोरी। उनको ग़ुस्सा चढ़ता था तो वह सात पुश्त के राज़ खोल के रख देती थीं। ज़ाहिर है उनकी चाय में कौन अड़चन लगा के अपनी सात पुश्तों की क़लई खुलवाता। मामूं बड़बड़ाते पैर पटख़ते बाहर चले जाते।
जाड़ों में अक्सर सब बैरिस्टर मामूं के कमरे में जमा होते। क्योंकि उसी एक कमरे में आतिशदान था। फ़ख़रू भी थोड़ी थोड़ी देर बाद आतिशदान की आग ठीक करने वहाँ आ मौजूद होता। कभी कभी बैरिस्टर मामूं उससे बहसते, ”अबे मैं तुझसे कहूँ हूँ कि तू अल्लाह के घर जाने से क्यों कन्नी काटे है?”
फ़ख़रू बड़े भोलेपन से हैरान होक जवाब देता, ”अजी लो, अल्लाह के घर जाने से कौन बंदा कन्नी काट सके है भला? अभी मैं विसी दिन न गया था रोज़दारों की इफ़्तार लेकर? घुंघनी का जे बड़ा देगचा जल्लो आपा ने हवाले कर दिया कि ले जा मस्जिद। वैसे विनूं ने किया था ए कि फुगना को लेले पकड़ाने कू पर मैं अकेले ही सर पर उठा के मिनटों में पोंचाई आया कि इफ़्तार है, सवाब होवेगा, भला दस सेर से क्या कम रइ होंगी घुंघनी? क्यों जल्लो आपा?”
”ऐ ना, ले, डंडी की तली पन्द्रे सेर थी”, जल्लो आपा गवाही देतीं।
”अबे वो सब तो ठीक है पर तू नमाज़ पढ़ने क्यों न आवे? तू दुआ मांगने से घबरावे है?” बैरिस्टर साहब ने साफ़ साफ़ सवाल किया।
फ़ख़रू बोला, ”अजी वाह मीर साब, अजी इत्ते बड़े भारी बालिस्टर होके तुम जे ही इंसाफ़ करो हो? अजी दुआ न मांगूँ हूँ तो क्या अल्लाह मियाँ ने यूँही सिरसी से मुरादाबाद पोंचाई दिया? इत्ती इत्ती तो दुआ मांगी जब अल्लाह मियाँ ने जे चार हरफ़ पेट में डाले कि अब दास्तान अमीर हम्ज़ा की पढ़ सकूँ हूँ, मौला के सदक़े से नौहे भी पढ़ लूँ हूँ मातम के साथ में….”
बैरिस्टर मामूँ ज़िच हो जाते मगर बहस किये जाते, आख़िर वह विलायत पास बैरिस्टर थे, ये सिरसी का लंगोटी बंद क्या उनको जिरह में हरा सकता था?
कहते, ” अबे तू कोठरी में बैठ के दुआएँ मांगे है तो फिर क्या, जमात में नमाज़ का हुक्म है ना?”
फ़ख़रू ज़रा सा झेंप कर जवाब देता। ”अजी बात जे है कि सबके सामने किसी से कुछ मांगते शरम आवे है…और दुआ तो अल्लाह मियाँ हर कहीं की सुन लेवें हैं, क्या कोठरी की ना सुनते? मौली साब विसदिन न कै रिये थे कि हज़रत यूसुफ़ ने कुँवें के अंदर दुआ मांगी थी और हज़रत यूनुस ने तो मछली के पेट में और हाजिरा बीबी ने….”
मामूं खिसिया के बोले, ” और और के बच्चे, क्या बकता चला जावे है, अस्तग़फ़िरुल्लाह तेरी और नबियों की बराबरी हो गई?”
फ़ख़रू ने कान को हाथ लगाया, ”अजी तौबा है, मैं जे थोड़ा ही कै रिया हूँ, मैं तो जे कै रिया हूँ कि निय्यत साबुत होगी जभी तो जे अल्लाह के प्यारे बंदे जो सब कुछ जानें हैं वह सिफ़ारिश करेंगे, सल-लल्लाह सल-लल्लाह।”
उसने बार बार अपनी उंगलियाँ चूम चूम कर आँखों से लगाईं, अक़ीदत के मारे उसके आँसू छलक आए थे।
बैरिस्टर मामूं ने आजिज़ होकर हुक़्क़ा तलब किया और गुड़गुड़ाने लगे।
यक़ीनन फ़ख़रू के दिल पर ख़ुदा ने गहरी, काफ़ी गहरी मुहर लगा दी थी।
फिर एक दिन घर में काफ़ी हंगामा हुआ। बात ये हुई कि फ़ख़रू के पास एक जोड़ा जूता कहीं से आ गया, जूता नहीं बूट, एक दम उम्दा वाला, चमाचम करता, चाहो तो उसमें मुंह देख लो। फिर अकेला जूता ही नहीं था। साथ में डिबिया पॉलिश और ब्रश भी। सब बच्चे बेहद जोश में आ गए थे, कोई डिबिया को गोल गोल नचाता, कोई ब्रश के बालों पर हाथ फेरता, कोई फ़ीता खींचता। नूरी आपा ने तो यहाँ तक कहा कि इस जूते का कोई नाम रख दिया जाए, बैरिस्टर मामूं भी उस वक़्त बड़े उम्दा मूड में थे। बोले, ”हाँ हाँ, ज़रूर रखो! ख़ुदा बख़्श रखो इस जूते का नाम।”
सब तो हंसने लगे मगर फ़ख़रू बेहद संजीदगी से बोला, ”अजी जे तो ठीक कै हो मीर साब, जे बख़्शा तो है ख़ुदा ही ने। मैंने इत्ती दुआएँ मांगी थीं कि अल्लाह मियाँ तुमने सब कुछ दिया बस अब एक बूट जूता और दिलवा दो कईं से। सो मीर साब वो मुअक्कल आया था न, अजी वही जिन ने उझारी वाली तमीज़न की लौंडिया भगाई थी और तुमने विसे साफ़ छुड़वा लिया था तो विन ने मुझसे किया कि भाई जब मैं आऊँ था तो तू मेरी बहुत ख़ातरी करे था। अब मैं बा-इज़्ज़त बरी हो के घर जा रिया हूँ तो बता क्या लेवेगा? सो, चुटकी बजाते में छेड़ छाड़ के अल्लाह मियाँ ने दिलवा दिया जे बूट। अच्छा है ना मीर साब।” उसने बड़े प्यार से जूते को देखा।
”अबे हाँ, बहुत अच्छा है।” बैरिस्टर मामूं बोले, ”अब आज तो मस्जिद चल, नमाज़-ए-शुक्राना तो अदा कर।”
फ़ख़रू चुप हो गया, झुक के उसने जूते उठाए, बड़ी एहतियात से डब्बे में रखे, ब्रश जूतों की आड़ में फ़िट किया, फिर डिबिया एक कोने में बिठाई, ढकना ढक कर उसे सुतली से बाँधा, डब्बा बग़ल में दबाया और खिसक लिया।
शाम को मग़रिब के वक़्त बैरिस्टर मामूं मस्जिद में दाख़िल हो ही रहे थे कि उन्हें फ़ख़रू का साया गली में नुक्कड़ पर दिखाई दिया। नए जूते पहने, नई क़मीज़ का दामन उड़ाता, नए पाजामे के पाएंचे फिटकारता, एक दोस्त के हाथ में हाथ दिए वह गली में मुड़ने ही वाला था कि बैरिस्टर मामूं ने ललकारा, ”फ़ख़रू! अबे ओ फ़ख़रू! यहाँ आ…अबे आ यहाँ!”
फ़ख़रू फंस चुका था, उसका दोस्त और वह दोनों आए।
”चल वुज़ू कर।” मामूं ने हुक्म दिया।
फ़ख़रू कसमसा कर बोला, अजी पान खा रिया हूँ बालिस्टर साब, और फिर जे भी तो बात है कि…”
”कि पान जे इसको ससुराल वालों ने खिलाया है, थूक न सके है बेचारा” उसके दोस्त ने टुकड़ा जोड़ा।
मामूं हंसने लगे। ”ससुराल? अबे चुपके ही चुपके ये ससुराल कैसी?”
फ़ख़रू तो चुप रहा पर उसका दोस्त बोला, ”अजी कोई ऐसी वैसी बात ना है, अशराफ़ हैंगे वो लोग भी, अपनी बिरादरी है बालिस्टर साब, लड़की भी क़बूल सूरत हैगी, नमाज़ पढ़े है, कलाम पाक ख़तम कर चुकी है, हम लोगों ने सोचा कि बीवी के मरने से इस दुखिया का घर भी उजड़ गया है सो बस जावेगा।”
”अच्छा अच्छा! वो देखा जावेगा, पहले तुम दोनों आदमी चलो, वुज़ू करो…चलो…” मामूं ने असल बात पर फिर ज़ोर दिया।
फ़ख़रू ने बेबसी से दोस्त को देखा, दोस्त ने उसे। दोनों ने बारी बारी से मिट्टी का बिधना उठाया, वुज़ू किया। मग़रिब की नमाज़ के बाद मौली साब रोज़ वाज़ कहते थे, आज भी कहा। फ़ख़रू और उसके दोस्त ने कई बार पहलू बदला पर बैरिस्टर मामूं ने उनको ऐसा घूरा कि वह फिर दुबक कर बैठ गए।
आख़िरकार वाज़ ख़त्म हुआ और फिर फ़ख़रू को एक ही पल बाद मालूम हो गया कि उसका नया बूट जूता ग़ायब है! सब लोगों में हिरासानी फैल गई। बैरिस्टर मामूं भौंचक्का रह गए, उन पर एक मिनट तो बिलकुल सन्नाटा तारी रहा फिर फ़ख़रू को समझाते हुए बोले। ”चल जाने दे…होगा, मैं अभी तुझे दूसरा ले दूंगा, विस से भी अच्छा। समझ ले जिस अल्लाह ने दिया था, विसी ने ले लिया।”
फ़ख़रू पर अब तक तो सकता तारी था मगर ये बात सुन कर वह बिफर गया। भिन्ना के बोला, ”अजी जे तो मैं कभी न मानने का हूँ कि अल्लाह ने मेरा बूट जूता लिया, उनने तो मुझे इत्ती दुआएँ मांगने पर दिया था, फिर वो ले क्यों लेवेगा, ख़्वामख़्वई को अल्लाह को बीच में घसीटो हो बालिस्टर साब। लिया तो है किसी नमाज़ी ने।”
अब बैरिस्टर मामूं क्या कहते, वह तो साफ़ ज़ाहिर ही था कि किसी नमाज़ी ने लिया है।
खिसिया कर बोले, ”न जाने कौन था शैतान की औलाद। लो जी मस्जिद में नमाज़ के बहाने आवे हैं भले आदमियों के जूते चुराने, अभी पुलिस में रिपोर्ट बंधवाऊँ हूँ।”
पुलिस में रिपोर्ट हुई। बैरिस्टर मामूं ने ईनाम का ऐलान किया, दूसरे दिन वाज़ में बड़े मौली साब ने भी ख़ूब लानत मलामत की, मोहल्ले में एक एक से कहा सुना गया, पर बूट को न मिलना था न मिला।
चौथे या पाँचवें दिन एक और वाक़िया हुआ, मग़रिब की नमाज़ के वक़्त फ़ख़रू मस्जिद में पहुँचा और जैसे ही मौली साब वाज़ कहने बढ़े, वह बड़े अदब से बोला, ”अजी मौली साब, ऐ कि मैं कुछ कहना चाहूँ हूँ।”
मौली साहब को उससे बेहद हमदर्दी थी, फ़ौरन एक तरफ़ को होते हुए बोले, ”हाँ भाई हाँ, कहो कहो।”
फ़ख़रू लोगों को मुख़ातिब कर के बोला, ”भले आदमियो! नरसों यहाँ से मेरा नया बूट चोरी हो गया, नमाज़ियों के सिवा तो कोई यहाँ आता ना है सो किसी नमाज़ी ने ही लिया होवेगा। ख़ैर पर मैंने सोचा कि जिस मस्जिद में जूता गया, सो हुईं जे पोलिश की डिबिया और ब्रश भी चला जावे, सो मैं लेता आया हूँ और आप नमाज़ियों को बख़्शे दूँ हूँ, अल्लाह से दुआ मांगूँगा कि एक बार दिया था सो दूसरी बार भी देवे और विस की करीमी से कुछ दूर न है, देवेगा और फिर देवेगा, ज़रूर देवेगा।”
इस तक़रीर के बाद उसने अपने कुर्ते की एक जेब से पॉलिश की डिबिया और दूसरी जेब से ब्रश निकाला और मस्जिद के एक कोने में उछाल दिया। फिर अपनी पुरानी स्लीपरें पहनीं और रवाना होगया।
जब मैं छोटी सी थी तो फ़ख़रू काफ़ी बूढ़े हो चुके थे, ड्योढ़ी में पलंग पर बैठे खाँसा करते थे। मगर हर बार जब हम लोग ननिहाल जाते तो ये क़िस्सा ज़रूर सुनते। फ़ख़रू दादा से कभी पूछो तो नमाज़ के ज़िक्र पर तो वह चुप रहते पर अगर कोई कह देता कि जी अल्लाह का करना यूँही था, तब वह बहुत बिगड़ते, ”वाह जी, अच्छी कहो हो अल्लाह का करना था…अजी वो तो देवे है, विसे ले के क्या करना है, ले तो है इंसान, छीने तो है बंदा। और नमाज़ी बन्दे की जब निय्यत बदले है तो ऐसी बदले है कि जिसकी कुछ ठीक न है। समझे है ना कि नमाज़ पढ़ूँ हूँ तो सात ख़ून मुझको माफ़ हो जावेंगे, जाने है कि अल्लाह कुछ कहने को आने से रिया, वो गवाही देने से रिया, बस अपनी सारी की कराई, अगली पिछली, गोड़ी समेटी और अल्लाह के सर थोप दी। क्या इंसाफ़ है जी…वाह!”
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रज़िया सज्जाद ज़हीर (1918–1979) उर्दू की प्रसिद्ध प्रगतिवादी कहानीकार और अनुवादक थीं। उनका जन्म अजमेर में हुआ और निधन दिल्ली में हुआ। उनकी प्रमुख कृतियों में “सर-ए-शाम”, “काँटे”, “नेहरू का भतीजा” और “ज़र्द गुलाब” शामिल हैं। ये कहानी उनकी अफ़सानों और ख़ाकों की किताब ‘अल्लाह दे बंदा ले‘ से ली गई है, जो कि पहली बार 1984 में प्रकाशित हुई थी। रज़िया सज्जाद ज़हीर को ”नेहरू अवार्ड”, ”उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी अवार्ड” और ”अखिल भारतीय लेखिका संघ अवार्ड” से भी नवाज़ा गया था।
हज़रत-ए-इंसान को बड़ा सिर्फ़ उसका इल्म नहीं बनाता, उसकी समझ, तज‘रबा और बीनाई भी इसमें बहुत बड़ा किरदार अदा करते हैं। रज़िया सज्जाद ज़हीर का तराशा हुआ किरदार फ़ख़रू इस ज़ाविये से बेहद अहम हो जाता है कि वह इंसान की बुराइयों को अल्लाह की करनी बना कर न पेश करता है, न इंसानी हवस, लूट और लालच को ख़ुदा के मत्थे मढ़ता है। इस कहानी में फ़ख़रू और उसका जूता किसी ग़रीब के असासे या सरमाए के साथ साथ उसकी आज़ादी, इज़्ज़त-ए-नफ़्स और ख़ुद-मुख़्तारी की भी अलामत हो सकते हैं। इसी को आप आदमी से बदल कर रियासत कर दीजिये, मुल्क कर दीजिये तो तारीख़ से लेकर हाल तक की जंगों का राज़ चुटकी में खुल जाएगा। ये कहानी अपने दौर की एक बा-ख़बर औरत के क़लम से निकली है और इसने बड़ी आसानी से मज़हबी दिलासों की आड़ में ग़रीब और फ़ाक़ामस्ती की सियासत पर बात की है, जहाँ दूसरों का हक़ मारने वालों ने ज़बान को कमज़ोरों के शोषण के लिए बेहतरीन साधन के तौर पर इस्तेमाल किया है।