किताबें पहले से बहुत अधिक हैं और उनकी सूचियाँ उससे भी कहीं ज़्यादा। नुक्कड़ों पर लगी दुकानों में मंटो की चुनिंदा कहानियों के ऊपर ख़लील जिब्रान की जिल्दें रखी हैं और एन फ्रैंक की डायरी पर हिटलर की आत्मकथा। हर थाली में चबाया हुआ खाना है।
फिर वे किताबें हैं जो “अनपुटडाउनेबल” कही जाती हैं–जिनकी “लाखों प्रतियाँ” बिक चुकी हैं और जिन्हें न पढ़ना आप “अफोर्ड” नहीं कर सकते। कुछ किताबें वायरल होती हैं, रुझानों से जन्म लेती हैं–जो कल तक छुपी हुई थीं और आज अचानक इंफ्लुएंसर्स की बाढ़ आ जाती है यह कहते हुए कि मरने से पहले दोस्तॉयव्स्की की “व्हाइट नाइट्स” ज़रूर पढ़ें। दिन हो या रात, पूरा शहर भागते-बैठते व्हाइट नाइट्स पढ़ रहा होता है। संपादकों और अनुवादकों की आँखों में भी चमक आ जाती है। महीने भर में व्हाइट नाइट्स पर समीक्षाएँ और नए अनुवाद आ जाते हैं।
ख़ैर! यह भी एक सूची है — सात उपन्यास, तीन कथेतर पुस्तकें और एक कहानी की ।
ये सभी वे किताबें हैं जो चर्चाओं और स्पॉटलाइट से दूर जा चुकी हैं, और शायद अभी इन्हें पढ़ने का सबसे उपयुक्त समय है। ये न तो बेस्टसेलर हैं, न फेवरेट, न ही शोर-शराबे से पैदा हुई हैं और ना ही पूरी तरह क्लासिक्स ।
प्रस्तुत हैं —
उपन्यास
शीर्षक का अर्थ है असमाप्त मृत्यु या शाश्वत मृत्यु, और संभव है कि यह इक़बाल की एक नज़्म (आलम-ए-बरज़ख़) से लिया गया हो। मर्ग-ए-दवाम की कथा घटनाओं की आपाधापी से दूर है तथा गति उसी लिहाज से धीमी है। अस्मिता और भागीदारी से परे आदमी के नित अप्रासंगिक होते चले जाने की कथा है. ऐसे उपन्यासों में और विषयों में दार्शनिक हिदायतों का बहुत अवसर होता है जिसे सिद्दीक़ आलम ने कुशल कथाकार होने के नाते, जाने दिया है ।
यह उपन्यास खंडित नायकवाद और आदर्श के पतन से पैदा हुई क्रूरता और निष्ठुरता पर है .कथा युद्धोत्तर जापान में समाज और किशोरों के बीच व्याप्त मूल्य-संकट पर केंद्रित है। मिशिमा का जीवन और आदर्श विवादस्पद रहे और उनकी मृत्यु उससे अधिक विवादास्पद रही. उपन्यास का अनुवाद अच्छा है और मिशिमा की भाषा बहुत चमकदार है. वह गद्य को घातक हदों तक ले जाते हैं लेकिन इकॉनमी ऑफ़ वर्ड्स खंडित नहीं होने देते ।
तानपीनार, उपन्यासकार, इस्तांबुल की पृष्ठभूमि में समय, संगीत, स्मृति और परंपरा पर चिंतन करते हैं। उनके उपन्यासों के पात्र सभ्यताओं और आदर्शों के बीच फंसे हुए हैं। उनमें पीछे छूट जाने का दुःख और खीझ है, लेकिन लौटने की सांस्कृतिक हूक है।
यह उपन्यास, जिसका तुर्की शीर्षक ‘हुज़ूर’ है और अर्थ है शांति, इसी द्वैध और अंतर्विरोधों के संसार में शांति ढूंढते किरदारों की कथा प्रस्तुत करता है ।
मॉम ने शीर्षक कठोपनिषद के एक सूक्त के अंग्रेजी अनुवाद से लिया था, और उपन्यास भी इसी संकरे रास्ते पर चलता है। यह उपन्यास भारत को देखने की एक वह यूरोपीय आँख है जो अघा चुकी है, ऊब चुकी है तथा अब पूरब की तरफ़ मुड़ रही है, इसमें पश्चिम और पूर्व के जीवन मूल्यों का सरल विभाजन प्रस्तुत किया गया है। इसके बावजूद, यह एक बहुत सुलझे ढंग से बुना हुआ बड़े कथाकार का उपन्यास है।
‘क़ाहिरा-त्रयी’ अब्द अल-जवद परिवार के जीवन के माध्यम से 20वीं सदी की शुरुआत में मिस्र के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों की कथा है। महफ़ूज़ ने पारिवारिक जीवन, धर्म और आधुनिकता के टकराव को सूक्ष्म यथार्थवाद के साथ लिखा है। वह काहिरा को कथानगर में बदल देते हैं, इसीलिए उनके यहाँ गली-मोहल्ले और मकान उनके किरदारों से बड़े किरदार हैं।

सलमान रुश्दी इस बीच अलग-अलग कारणों से चर्चा में रहे ख़ासकर उन पर हमले और नज़दीक ही भारत में सैटैनिक वर्सेस पर लगे प्रतिबंधों के हटने की वजह से। इनसे अलग, Haroun and the Sea of Stories उनकी कम जानी-पहचानी पुस्तक है इसलिए मैंने महफ़ूज़ की Arabian Nights and Days के बजाय इसे चुना। रुश्दी के अनगिनत प्रतीकों और उद्धरणों से बुनी यह कथा इस उपमहाद्वीप के सामाजिक और सांस्कृतिक ढाँचे पर उनकी गहरी समझदारी की बानगी है ख़ासकर इस उपन्यास के किरदारों के नाम और उनकी भौगोलिकताएँ नए ढंग की फ्रेम स्टोरी का शिल्प अख़्तियार कर लेती हैं .
ग्रीक लेसन्स एक अनूठा लघु-उपन्यास है। लेखिका के नोबेल पुरस्कार के कोलाहल से बहुत अलग, यह उपन्यास स्वीकार्य और दुःख के लिए चुप्पी तथा एक मृत भाषा के बीच परस्पर बनते हुए संसार को रचता है।
यह उपन्यास अत्यंत यत्नजन्य और श्रमसाध्य अनुवाद से साकार हुआ है, क्योंकि इसकी संरचना खंडित-रूप है – जहाँ कथा एक साथ आत्मपरक गद्य, आत्मसंवेदी कथन और अंतरंग कथ्य का रूप लेती है, और कभी डायरी, नोट्स तथा कथा जैसी शक्ल में प्रकट होती है।
कथेतर
पंकज मिश्रा के पास इतिहास की गति और विकास को देखने की ऐसी एक ‘साहित्यिक’ दृष्टि है . इसी लिए वह ही “इतिहास का वेटिंग-रूम” जैसी उपमाएँ रचते हैं और इसी वजह से वे टॉलस्टॉय से तानपीनार, मिशिमा से टैगोर तक के बदलावों को अत्यंत लालित्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत कर पाते हैं। यह एक संजीदा पाठक और साहित्यकार द्वारा लिखी गई इतिहास पुस्तक है जो एशिया में आधुनिकता के आगमन और पश्चिमी उपनिवेशवाद के प्रभावों का विश्लेषण करती है।
साथ ही, यह मुस्लिम और पूर्वी एशियाई बुद्धिजीवियों के संघर्ष और उनके विचारों की जटिलताओं को प्रस्तुत करती है, जो पश्चिम की शक्ति और तकनीक के सामने अपने समाज को समझने और बदलने की कोशिश कर रहे थे।
ख़ुशी को पूंजीवादी उत्पाद और होड़ के सिवा और कैसे देखा जा सकता है? डे बॉटन स्तेंधाल का हवाला देते हैं कि “सौंदर्य ख़ुशी का सच्चा वादा है।” आधुनिकता में सौंदर्य या तो उपेक्षित या गौण मूल्य बन चुका है, या फिर उसकी सत्ता पूरी तरह त्वरित, सनसनीख़ेज़ और उपभोगी किस्म की उपयोगिता में बदल गई है।
यह किताब किसी स्थापत्य या वास्तुकला पर अकादमिक दस्तावेज़ नहीं है; बल्कि इस दृष्टि से इसमें एक ठहराव है और यह पूरी तरह लेखक के सौंदर्य के प्रति गहन लगाव से उपजी है। इसके बावजूद, यह अच्छा गद्य है क्योंकि डे बॉटन के गद्य में एक प्रूस्तीय हूक है, जिसका इस्तेमाल वह यहाँ सौंदर्य और स्थापत्य पर बात करने के लिए करते हैं।
भारत में पूँजीवाद के उदय या ख़ासकर अफ़ीम के संदर्भ में सबसे प्रामाणिक और विराट साहित्यिक पुस्तक अमिताव घोष की त्रयी है। इसके बरक्स, अमर फ़ारूकी की यह किताब मुंबई की बनावट और उसकी उत्तरोत्तर बढ़ती महत्ता को अफ़ीम या कॉलोनियल ज़रूरतों की पूर्ति के संदर्भ में देखने और समझने की एक दहलीज़ तैयार करती है। इसमें कुछ गल्प नहीं हैं, फिर भी भारतीय शहरों के वैविध्य के लिहाज से मुंबई को देखती यह किताब कलकत्ता और चेन्नई को भी नई आँखों से देखने के लिए उत्साहित करती है।
बमुश्किल सौ पन्नों की यह नपी-कसी भाषा में इतिहासकार की लिखी हुई पुस्तक है, और अपने रिसर्च पेपर जैसी संरचना के बावजूद इसे महानगरीय कथेतर गद्य में शामिल कर पढ़ा जाना चाहिए।
कहानी
इस बीच सैंकड़ों शानदार कथाओं में यह सबसे अप्रत्याशित और चमकदार कहानी है। मुरुगन के गाँव के कुएँ, पेड़, आग और रास्ते कहानी के किसी भी मोड़ पर किरदार में बदल सकते हैं।
यह कहानी गाँव से शहर में विवाह करके आई स्त्री की है, जिसका रोज़मर्रा का जीवन बार-बार एक गहन अलगाव को मुखर करता है। यह अलगाव जीवनशैली का है, स्त्री-पुरुष संबंधों के फ़ासलों का है।
मुरुगन ने इन फ़ासलों और उनकी निष्ठुरता को ग़ुस्लखाने के दैत्य में रूपांतरित कर दिया है। यह कहानी इतने बड़े शिल्पगत जोखिम के बावजूद पटरी से नहीं छिटकती और एक शानदार कथा में सफलतापूर्वक बदल जाती है।