वो दिन रात बूढ़े के साथ रहता। बूढ़े का सारा कर्ब उसे भी सहना पड़ता। जब बूढ़ा कराहता तो लड़का एक बे-नाम कैफ़ियत से दो-चार हो जाता। उसे दुख नहीं कह सकते। वो तो कुछ ऐसा आलम होता जैसे लड़के की ठोड़ी से नीचे कोई रग अचानक फड़कने लगे, रुक जाए और फिर फड़क उठे। उसका हलक़ बार-बार सूख जाता और वो दिन रात चुपचाप बूढ़े को देखता रहता।
बूढ़ा पंचानवे या छियानवे साल का हो चुका था। उसके एहसासात धीरे-धीरे मुर्दा हो चुके थे। अब वो जिस जागती हुई दुनिया में रहता था वहाँ न कोई रंग था न ख़ुशबू। अब न कोई दिन था न रात थी। वक़्त रहट की आवाज़ की तरह लगातार चल रहा था, जैसे कोई नींद या ख़्वाब का आलम हो।
बूढ़ा किसी से कुछ नहीं कहता था। खाने के वक़्त लड़का उसे खाना खिला देता। कोई हाथ पकड़ कर उसके लरज़ते हुए ढाँचे को इधर से उधर ले जाता। उसके ठंडे और सूखी हड्डियों जैसे हाथ ज़ोर-ज़ोर से हिलते रहते। उसके बेटे हाथ थाम कर उसे धूप में बेंत की कुर्सी पर कुशन लगा कर बिठा देते। नर्म गुनगुनी धूप उसकी खाल को हौले-हौले सहलाती। बूढ़े का गंजा सर झुकते-झुकते सीने पर जा टिकता। सुथरे मोमी पैरों पर ख़ुशगवार गर्मी रेंगने लगती। फिर वो चौंक पड़ता और उसके हाथ काँपने लगते।
वो सरगोशी में लड़के को आवाज़ देता, “लड़के! मुझे अन्दर ले चलो।”
लड़का उसका नीले रगों वाला साफ़ हाथ पकड़ कर बिस्तर की तरफ़ ले जाता। ख़बरों के वक़्त लड़का रेडियो लगा देता और काँपता हुआ सफ़ेद बूढ़ा, बिस्तर में लेटे हुए, पहले उर्दू और फिर अंग्रेज़ी में ख़बरें सुनता। वो पाबंदी से सुबह, दोपहर और शाम की ख़बरें सुनता और हर दफ़ा रेडियो के बताए हुए वक़्त को अपनी घड़ी में देखता कि वो ठीक चल रही है या नहीं।
एक मीठी मदहोशी उस पर तारी हो जाती थी। धीरे-धीरे, आहिस्ता- आहिस्ता, नींद उसे हिलोरे देती। लेकिन अब वो उम्र के उस मक़ाम पर आ गया था जहाँ उसके बे-पलकों वाले पोए गहरी नींद में बंद नहीं हो सकते थे। उसकी साँसों से लोग समझते थे कि वो सो गया है, लेकिन दरअस्ल वो सारा वक़्त जागता रहता था, बल्कि आँखें बंद कर के उसे बेहतर नज़र आता था। लड़के का बिस्तर उसके पास बिछा था, लेकिन आँखें मूँद लो तो वहाँ न वो कमरा होता था न लड़के का बिस्तर, न दवा की शीशियों से सजी हुई छोटी सी तिपाई। कभी हर तरफ़ हल्की धूप फैल जाती, कभी अँधेरा सा छाने लगता। फिर धूप धीरे-धीरे रंग बदलती, गुलाबी, कासनी, धानी रौशनियाँ दूर तक फैल जातीं। रंगों की झिलमिल में ज़मीन झूलती हुई महसूस होती।
लड़का बुत बना बिस्तर पर बैठा रहता। वो साँस रोक कर ख़रख़र की आवाज़ें सुनता और झुक कर देखता। दिन भर ख़ामोश रहने वाला बूढ़ा नींद में हँसता, भिनभीनाई हुई आवाज़ में वो बच्चों की तरह किलकारी मार कर हँस पड़ता। उसका पोपला मुँह खुलता तो निचला बारीक होंठ मुँह के अंदर चला जाता।
बूढ़े के सामने फैली हुई रौशनियाँ और सहलाती हुई गुदगुदाती हुई रंगीन धूप फीकी पड़ने लगती। दिन निकल आता। शायद दफ़्तर से बाद का वक़्त होता। बूढ़े को कोई ज़रूरी काम याद आ जाता और वो उठ कर जूते पहनता और चल देता। एक दफ़ा लड़का जवानी की गहरी गाढ़ी नींद सोता रह गया था तो बूढ़ा दरवाज़े की चौखट से टकरा गया था और यूँ त्यौरा कर गिरा था कि सारा घर धमाके से जाग उठा था।
लेकिन अब लड़के ने हल्की नींद की आदत डाल ली थी और कमरे में ज़रा सी आहट पर भी वो जाग जाता और बूढ़े के कंधे पकड़ कर धीरे से पलंग पर लिटा देता।
या कभी बूढ़ा अपने वतन अलीगढ़ के स्टेशन पर होता कि उसका पैर फिसल जाता और धड़धड़ाती हुई रेलगाड़ी उसके ऊपर से गुज़रने लगती और वो ज़ोर से चीख़ता, “बाबा!… बाबा!”
लड़का उसका हाथ थाम लेता। पहियों का घुमाव कम होते-होते रुक जाता। उसका बदन लरज़ने लगता और वो फँसी हुई आवाज़ में कहता, “क्या है?”
दिन में उसके बेटे, बेटियाँ और बहुएँ, दामाद अक्सर उसको देखने आते और घंटे दो घंटे बैठ कर चले जाते। ज़ियादातर वक़्त लड़का ही उसके पास रहता जिसे इतवार को भी छुट्टी न मिलती। सत्रह-अठारह साल का खिलंदड़ा जवान कभी तो उकता भी जाता। उसकी वाहिद तफ़रीह ये रह गई थी कि रेडियो पर धीमी आवाज़ से फ़िल्मी गाने लगा देता और हर स्टेशन पर गानों के प्रोग्राम सुनता। वैसे उसे इस नौकरी में बहुत आराम था। काम भी ज़ियादा न था। बूढ़ा कोई ख़ास परेशान भी न करता था और न ही बार-बार की फ़रमाइश से उसे तंग करता था। अब तो इतने दिनों के साथ की वजह से लड़के को भी उससे कुछ लगाव सा हो गया था।
फिर जब बूढ़े की नाक का ऑपरेशन हुआ तो उसे अस्पताल में दाख़िल कर दिया गया। लड़का भी उसके साथ स्पेशल वार्ड में रहा। इससे पहले भी बूढ़ा कई बार अस्पताल में रह चुका था। उसके बेटे और बेटियाँ दिन में कई बार उसको देखने को आते। वो फँसी-फँसी आवाज़ में सब को बताता, “मेरी नाक में बहुत तकलीफ़ है।”
वो सब उसे तसल्लियाँ देते। “फ़िक्र मत कीजिए बाबा जान! आप इंशा-अल्लाह अच्छे हो जाएँगे!”
लेकिन दरअस्ल सबके दिल को धड़का लगा था।
अस्पताल में बूढ़ा बेचैन रहा। वो बार-बार लड़के से पूछता, “मेरी ऐनक कहाँ है?”
लड़के ने कई बार ऐनक का केस उसके हाथ में दिया। वो टटोल कर वापस रख देता।
फिर एक दिन बूढ़े ने कहा, “सुनो! रेडियो के पास जो मेरा पलंग बिछा है उस पर से मेरा बिस्तर उठा लाओ।”
लड़का कान लगा कर उसकी धीमी आवाज़ सुनता रहा और फिर खिलखिला कर हँस पड़ा। “कहाँ बाबा जान? यहाँ आपका पलंग कहाँ है?”
बूढ़ा हैरत से उसे देखता रहा। परेशान सा होकर चुप हो गया। लड़का भी इधर-उधर फिरने लगा। ज़रा देर बाद लड़के ने देखा कि बूढ़े का लंबा हड्डियों जैसा हाथ एहतियात से हवा में कुछ ढूँढ रहा था।
“क्या चाहिए बाबा?” लड़के ने पास आकर पूछा।
“मेरी ऐनक दे दो।”
“ये रही आपकी ऐनक।” उसने ऐनक फिर बूढ़े के हाथ में थमा दी। उसकी काँपती हुई उँगलियों ने ऐनक छुई और सिरहाने रख दी।
“आप को लगा दूँ ऐनक?” लड़के ने बूढ़े को तसल्ली देने के लिए पूछा।
“नहीं नहीं!” उसने हाथ हिला कर मना किया, फिर कुछ सोच कर बोला, “सुनो लड़के! दरवाज़े के बाहर एक आदमी बैठा है। उसे अंदर न आने देना। पता नहीं कौन है।”
लड़का मुस्कुराया और उसने बूढ़े का ठंडा हाथ थाम कर कहा, “अच्छा बाबा जान! नहीं आने दूँगा।”
“हाँ।” बूढ़े के चेहरे पर इत्मिनान छा गया। “इस तरह घर में किसी को नहीं घुसने देते।”
लड़के ने ग़ौर से सरगोशी को समझा और चुपके से हँसते हुए उसने तकिए ऊँचे करके बूढ़े को कंबल ओढ़ा दिया।
लड़के के मज़बूत हाथ की हरारत बूढ़े के रोम-रोम में दाख़िल होने लगी और वो धीरे-धीरे बेहोशी के नीले समुंदर में डूबने लगा।