कनीज़

सिविल लाइंस की सबसे कुशादा और सबसे ख़ूबसूरत सड़क पर मील डेढ़ मील की मुसाफ़त से थकी हुई कनीज़ और उनकी दादी सटर-पटर जूतियाँ घिसटती चली आ रही थीं। दादी की चादर लू में फड़फड़ा रही थी। कनीज़ का पुराना काला बुर्क़ा तो हवा के ज़ोर से कई बार सर से उतर-उतर गया। उस पर से निम्मी और चिम्मी! निम्मी तो ख़ैर माँ की उँगली पकड़े चली आ रही थी, मगर चिम्मी में इतनी जान कहाँ। दादी का सूखा जिस्म, झुकी कमर, उस पर से कूल्हे पर चिम्मी… लू में सुर्ख़ ताँबा हो रही थी।

“अल्लाह तेरा शुक्र है। हमने सब्र किया तू सब्र न कीजियो।”

दादी रह-रह कर कराह उठतीं। लेकिन कनीज़ बार-बार सोचती, “अम्माँ बेगम ताँगे के लिये रुपया दे रही थीं, ले लिया होता तो काहे को यूँ लू में भुनते। क़र्ज़ में भला क्या बे-इज़्ज़ती? दादी फिर तो अपनी नाक रखने को अदा ही करतीं, वैसे लाख ख़िस्सत करें।”

मगर इस सोच-बिचार के बा-वुजूद सड़क लंबी ही होती जा रही थी। जो कोठी आती बस, जी चाहता काश यही कोठी अपनी होती, जल्दी से इस तपती सड़क से बच कर अंदर घुस कर बैठ रहते। मगर जब लू-धूप में आँखें मिचमिचा कर देखा जाता तो अभी मंज़िल दूर ही नज़र आती… नहर के पुल के उधर ही तो अपनी नन्ही सी कोठी थी। लंबे-लंबे शीशम, यूकेलिप्टस, आम, जामुन और गूलर के दरख़्तों के घने-घने सायों में दुबकी हुई कोठी। यहाँ सूरज भी मार खा कर आता, लू भी ग़ुर्राती आने के बजाए सिसकी ले कर आती।

ब-हर-हाल हरकत में बरकत है। उनकी कोठी आ ही गई। लपक कर अपने गोशा-ए-आफ़ियत में सब ने पनाह ली। अभी दरवाज़ा भी बंद न हुआ था, चादर-बुर्क़ा तक न उतरा था कि कनीज़ पर उस की बिप्ता ने झपट कर हमला कर दिया।

“अरे तो क़िस्सा ख़त्म।”

हसरत-नाक तअज्जुब की लहर में उसने अचानक अपने ज़ानुओं पर हाथ मार कर रोना शुरू कर दिया।

“अरे इशरत मियाँ, मेरे साथ तुमने धोका किया, अरे पूछूँ नाव किस ने डुबोई, कहा ख़्वाजा ख़िज़्र ने।” कनीज़ ने लहक कर बैन किया और माथा कूट लिया।

दादी ने कपकपाते हाथों से चादर उतारी, पान से लाल होंठों के गोशे लरज़े, ठोड़ी फड़की, चेहरे की एक-एक झुर्री काँप गई और मैली-मैली आँखों से आँसू टपक कर झुर्रियों की राह सारे चेहरे पर बहने लगे, उन्होंने चिम्मी को ज़मीन पर उतारा तो उसने तेज़ आवाज़ में रोना शुरू कर दिया, “दादी, दादी।” वो एक ही सुर में रो-रो कर उन्हें अपनी तरफ़ मुतवज्जेह करने की कोशिश करने लगी, लेकिन कनीज़ को बे-हाल देख कर दादी को इतना होश कहाँ रहता।

निम्मी को प्यास लग रही थी, उसने भी मौक़ा ग़नीमत देख कर पानी-पानी पुकार कर रोना शुरू कर दिया।

“अरे मेरा बच्चा मुझसे छुड़ाया, इशरत, तू अपनी मैया से छुट जाए, तो मर जाए इशरत।” कनीज़ ने कचहरी में मुम्ताज़ को इशरत के हवाले किये जाने का मंज़र याद कर के सीना पीट लिया और बे-होश हो कर खड़े क़द से ज़मीन पर आ रही।

अब तो निम्मी चिम्मी और दादी ने मिल कर वो हाय-वैला की कि अपनी कोठी वाले भी जाग उठे। बड़ी बेगम हौल कर पलंग से उठीं तो चाबियों का गुच्छा टख़नों पर हथौड़े की तरह लग कर बजा। एक लम्हे को पाँव पकड़ कर रह गईं… लेकिन फिर फ़ौरन ही कमरे से निकल कर बरामदे में आ गईं, सलमा-बी ने निहायत सुस्ती से एक जमाही ले कर अपने आप से कहा,

“फ़ैसला हो गया शायद।” और फिर करवट बदल ली।

“कनीज़, ऐ कनीज़ इधर तो आओ, क्या हुआ?”

“हाय कनीज़ कहाँ, कनीज़ तो चल दीं।”, दादी की फटी हुई आवाज़ गूँजी और बड़ी बेगम नंगे-पाँव ही उधर भागीं। पीछे से सलमा-बी भी अपना साटन का पेटीकोट सँभालती निकलीं।

“चल दी? लो भई ग़ज़ब हो गया। अब क्या करें?” कलेजे में पंखे से लग गए।

मगर कनीज़ तो वहाँ मौजूद थी, मरी भी नहीं थी, कैसी साफ़ साँस चल रही थी। “ऐ असग़री बेगम! तुम ने तो दहला दिया, क्या हुआ?”, बड़ी बेगम के नंगे तलवे जैसे अभी तक भूभल पर थे।

“हुआ क्या बेटी, नसीब के लिखे पूरे हो गए, कभी हमारे घरों में काहे को ऐसा हुआ था। इस पाकिस्तान ने मिट्टी ख़राब कर दी।”

“रहने दो बुआ, रोने-धोने को, अच्छा हुआ कमबख़्त से लौंडिया का पिंड छुट गया। मेहर का क्या फ़ैसला हुआ। लड़का तो उसी को मिल गया होगा। लड़कियाँ भी उसके मुँह पर फेंक दी होतीं। गंदी बोटी का गंदा शोरबा।”

“अरे बेटी कोई औलाद कैसे छोड़ देवे, अरे मैं तो पाले-पोसे की मुहब्बत में घर से बे-घर हो गई, ये तो उसके अपने जने हैं। लड़के के ग़म में बे-होश पड़ी है।” दादी ने रो-रो कर कहा। बड़ी बेगम ने कनीज़ के मुँह पर पानी के छींटे दिये। कनीज़ ने जल्दी से आँखें खोल दीं। कटोरा भर पानी पिया और सर पकड़ कर लंबी-लंबी साँसें लेने लगी।

बड़ी बेगम ने कनीज़ को अपने कंधे से लगा लिया और आँखों में आँसू भर कर बोलीं, “कनीज़ तू तो मेरी बच्ची है, तू किस बात का फ़िक्र करती है, शुक्र कर तेरा उस कम-बख़्त से छुटकारा हो गया। अभी तेरी उम्र ही क्या है? देख लेना ऐसी जगह ब्याहूँगी कि तू अपनी ख़ुशियों में मुझे भी भूल जाएगी। परसों ही तेरी बात आई थी। लड़का पान सौ का नौकर है। मैंने कह दिया, भई अभी लड़की का फ़ैसला नहीं हुआ है। फिर मुझे लड़के की शक्ल भी पसंद न थी, ऐ  असग़री बुआ जैसी अपनी कनीज़ की शक्ल-सूरत है वैसा ही जोड़ का लड़का हो।”

इसी दौरान में सलमा-बी जा चुकी थीं। ये सारे काम उन्होंने अपनी अम्माँ पर छोड़ रखे थे। उन्हें तो बस अपने काम से काम था… दादी ने घूर कर सलमा-बी को कोठी की तरफ़ जाते देखा, उन्हें ये लौंडिया फूटी आँख न भाती, कनीज़ से तो काफ़ी हँस बोल लेती, मगर दादी को दो उँगली उठा सलाम भी न करती, जैसे वो उनकी नौकर हों। वाह ग़रीबी में कहीं कोई शराफ़त मर जाती है, दादी को क्या पड़ी थी जो किसी की ख़ुशामद करतीं। उनके अपने “बड़े मियाँ” का मुरादाबाद में अच्छा भला पक्का मकान था। वो तो आए दिन ख़त लिखते रहते कि आ जाओ, तुमने अपने भांजे की औलाद के लिये मेरा साथ छोड़ दिया, मगर वो बे-चारी ला-वलद थीं। अपने मरहूम भांजे की ज़रा सी बच्ची को औलाद की तरह पाला, शादी ब्याह किया, अब ये क़िस्मत कि उसका मियाँ पाकिस्तान आया और वो भी दीवानी बनी उसके पीछे चली आईं, पाले पोसे की आग तो पेट में रखने की आग से कहीं बढ़ कर होती है। मगर ये बातें आज-कल की लड़कियाँ ख़ाक समझें? वो तो बड़ी बेगम की मुरव्वत थी जो दादी सलमा-बी के तेवरों पर कुछ नहीं कहती और फिर उस वक़्त तो जहाँ सलमा-बी पीठ फेर कर मटकती चली गईं, वहाँ बड़ी बेगम ने सब को अपनों की तरह समेटा और अपने कमरे में ले गईं।

उनके कमरे में पलंग दो ही थे, एक पर सलमा-बी पहले से मसट मारे पड़ी थीं, अब बड़ी बेगम की मसहरी पर इतने लोग कैसे बैठते, सो फ़र्श पर ही पानदान खुला। दुख-सुख की यादें हुईं और ख़ूब हुईं। दादी रोईं, कनीज़ आँचल मुँह पर डाल कर सिसकी तो बड़ी बेगम की आवाज़ भी भर्रा गई, सलमा-बी ने बड़ी बेगम के इतने ख़ुलूस पर सोते में कई बार हूँ-हूँ भी की। आख़िर बैठे-बैठे बड़ी बेगम की कमर में दर्द होने लगा। और वो दादी के इसरार से अपने पलंग पर लेट गईं, मगर उस वक़्त बग़ैर कनीज़ के चैन कहाँ… बोलीं, “कनीज़ बेटी मेरे पास आ जा। अरी मैं कहती हूँ मुँह से कहे का भी कैसा प्यार होता है, तुझे ब्याहूँगी तो कैसे क़रार आएगा?”

ये सुन कर दादी के हाथ क़िबले की तरफ़ उठ गए, “अल्लाह बे-कसों के लिये तू ही दुनिया में फ़रिश्ते भेज देवे है।” दादी की आँखें एक बार फिर पुर-आब हो गईं और कनीज़ के ज़ख़्मों की जलन कुछ कम हो गई।

वो शरमाती, पाएँती बैठ गई, बेगम से उसकी अक़ीदत पीरों और वलियों से बढ़ कर हो गई। बेगम ने उठ कर उसके सर पर हाथ फेरा मगर फिर फ़ौरन ही गठिये के दर्द से मजबूर हो कर अपने हाथों अपनी पिंडलियाँ मसकने लगीं।

“अम्माँ बेगम सो रहिये।” कनीज़ ने उन्हें ज़बरदस्ती लिटा दिया और उनकी पिंडलियाँ मसकने लगी। बड़ी बेगम ने बहुत नहीं-नहीं की, दादी को भी कनीज़ की इतनी अक़ीदत आँखों ही आँखों में खल गई, मगर वो एक न मानी। उसने सोचा क्या हुआ, कोई अपनी माँ के पाँव दबाने में बे-इज़्ज़ती होवे है… अरे ये माँ नहीं तो और क्या हैं, इन्हें हम से क्या मीठा लालच, इस देस में कौन किसी को पूछे है। एक ये बेचारी अपनी तरफ़ की मिल गईं जो इन्होंने अपना बना कर घर में जगह दे दी, वर्ना अम्माँ बेगम कोई ग़लत तो नहीं कहती होंगी कि सारे पंजाबी-पंजाबी भरे पड़े हैं इस देस में। ‘आप जनाब’ तक का मज़ाक़ उड़ावे हैं… मगर इशरत को ये सब सोचने की क्या ज़रूरत थी। तलाक़ के दो बोल लिख कर दे दिये और अपनी कोठरी से ये कह कर निकाल दिया कि अब तुम्हारा मुझ से पर्दा वाजिब है। ये न सोचा कि अपने मुरादाबाद में इस तरह करते तो ऐसा कुछ बुरा न था। वहाँ मय्या नसीबों-जली का घर तो था। अपनी सगी पोतियों से ज़ियादा समझ कर पाला। दादा इस बुढ़ापे में भी हर तरह मदद को तैयार होते… पर इस पाकिस्तान में तो दादी ग़रीब का साथ भी इस हालत में न होने के बराबर… दादा का पैसा-कौड़ी भी आने का कोई रास्ता नहीं… न यहाँ रहने का कोई वसीला न जाने की आस। अपने ग़ैर हो गए। अरे ये जनम का साथी, उसने तो ऐसी आँखें फेरीं कि तोता भी क्या फेरेगा। ये न सोचा कि इस बड़े शह्र में कहाँ जावें? न इद्दत गुज़ारने की जगह, न मेहर, न बच्चों का गुज़ारा, फिर दावा किया तो लो वो भी बुराई। कहता है वैसे तो गुज़ारा देता पर अब ज़िदिया गया हूँ। अरे ऐसी ही जी में ठानी थी तो फिर पाकिस्तान क्यों बुलवाया, इतने दिन से जुदाई थी, समझ लेते मर कर छुट गई… फिर यहाँ बुला कर मंजधार में छोड़ देने का क्या तुक। वकील तो कहता था अब मुरादाबाद में जा बसना भी मुश्किल है, परमिट महीने दो महीने का बनेगा… दादी को तो शायद दादा की वजह से रहने की इजाज़त भी मिल जावे पर मेरा मुश्किल है। हाय कैसा बे-घर बे-दर किया। अरे इशरत तेरे प्यारे तुझे रोएँ…”

और कनीज़ फूट-फूट कर रोने लगी… बेगम सो चुकी थीं। दादी भी थकी-हारी ऊँघ गई थीं, सब सब्र कर बैठे थे, मगर कनीज़ को सब्र कैसे आ जाता। सात साल का पाला पोसा लड़का छिन गया। अब पता नहीं निम्मी-चिम्मी का क्या बनता है। दादी क़ब्र में पाँव लटकाए बैठी हैं। ख़ुद उसकी ऐसी उम्र नहीं कि अकेली कहीं मेहनत मज़दूरी कर के पेट भर ले। ब-क़ौल बड़ी बेगम चौबीस-पच्चीस का सिन, सूरत-शक्ल की कहो तो बस फ़ोटो सा खिंचा हुआ। इस पर भी इशरत बद-नसीब का दिल दूसरी जगह अटका। मुरादाबाद से नोटों की पेटी बाँध बीवी बच्चों को छोड़ कर पाकिस्तान चले कि बस जैसे ही वहाँ बर्तनों का कारख़ाना चला सब को बुला लूँगा। दादी तो इशरत के लच्छन से ख़ूब वाक़िफ़ थीं, उस पर से कनीज़ की तबीअत की तेज़ी भी उन से कुछ छिपी न थी…

जब इशरत ने कनीज़ को झूटों बुलाया तो उन्होंने फ़ौरन ही आने की तैयारी शुरू कर दी। कनीज़ को अकेले कैसे भेजतीं। दुनिया न कहती कि लौंडिया को अकेले परदेस जान-बूझ कर भेज दिया और ख़ुद बुड्ढे ख़सम के कूल्हे से लगी बैठी रहीं। सोचा लड़की ज़रा रस-बस ले तो फिर चली जाऊँगी मगर यहाँ आ कर जो देखा तो कारख़ाना वग़ैरह सब चौपट और इशरत मियाँ साठ-सत्तर के किसी दुकान पर मुलाज़िम और एक बंगले के सरवेंट क्वार्टर की एक कोठरी के पाँच रुपया महीना के किरायेदार। दादी कलेजा मसोस कर रह गईं। इन्हीं हालों होते जब भी गुज़र हो जाती, मगर इन साठ-सत्तर में इशरत की दिल-लगी भी तो चलती और कनीज़ की ज़बान चलती… दादी लाख कनीज़ को लगाम देतीं, मगर वो तो आपे में न थी… और एक दिन इशरत ने बद-ज़बानी और फुज़ूल-ख़र्ची के इल्ज़ाम में तलाक़ लिख दी… लड़के का हाथ पकड़ा और कनीज़ को हाँक कर कोठरी में ताला डाल दिया… न कोई दाद न फ़रियाद… और जब कनीज़ और दादी-रोती पीटती किसी कोठी के सरवेंट क्वार्टर की तलाश में निकलीं तो बड़ी बेगम तक पहुँच हो गई। पहले तो बहुत बे-रुख़ी से पेश आईं मगर जब दुखियारियों को बे-आसरा देखा तो पिघल गईं, न सिर्फ़ क्वार्टर मुफ़्त रहने को दिया बल्कि कनीज़ को बेटी तक कह दिया… माँगने वाले की क़िस्मत है, आग माँगे और पयम्बरी तक मिल जाए।

और बड़ी बेगम जो अब कनीज़ की अम्माँ बेगम बन चुकी थीं, इस वक़्त गठिया के दर्द से निजात पा कर गहरी नींद में मुँह खोले सो रही थीं और कनीज़ उनकी पाएँती बैठी, अब चुपके-चुपके आँसू बहा कर थक चुकी थी। अपना कोई प्यारा मर जाए जब भी रो-धो कर सब्र तो करना ही पड़ता है… रफ़्ता-रफ़्ता तबीअत हल्की हो ही जाती है।

कनीज़ की तबीअत थोड़े ही दिनों में हल्की क्या बस फूल सी हो गई। अब इशरत की हैसियत कनीज़ के लिये वैसी ही थी जैसी बचपन में दादी के मुँह से सुनी हुई कोई अधूरी कहानी, जिसे सुनाते-सुनाते दादी की आँख लग गई हो और कनीज़ दादी के ख़र्राटे सुन कर दो-चार मिनट बाद “हूँ-हूँ” करती ख़ुद भी सो गई हो… और जब सुब्ह आँख खुले तो कटोरा भर दूध, बासी रोटी और कपड़े की गुड़ियों की बड़ी-बड़ी नमकपारों जैसी आँखों के सामने कहानी याद करने की किसे फ़ुर्सत? किसी की याद आने के लिये भी तो फ़ुर्सत चाहिये और कनीज़ को अब अम्माँ बेगम की कोठी में इतनी फ़ुर्सत कहाँ थी… दादी इशरत को कोसतीं तो कनीज़ मुँह बना कर कहती, “ए दादी तुम्हें कोई काम नहीं क्या। जो बैठी उसके नाम की माला जप रही हो। मुझे तो उसके नाम से अपना बच्चा याद आवे है, अल्लाह उसे कभी तो इतनी समझ देवेगा कि अपनी मय्या से आ मिलेगा। बावा हरामज़ादे के मुँह पर थूक आवेगा।”

और इतना कह कर कनीज़ आँखों में आए हुए आँसू पलकों में पिरोए लपक कर किसी काम में जुट जाती, बिजली की तरह सारी कोठी में कौंदती फिरती और दादी पर एक नया ग़म शाम के अँधेरों की तरह उतरने और छाने लगता। दादी उसके यूँ झलक दिखा कर ग़ायब होने की नई अदा से हौल जातीं, वो कनीज़ के सामने बैठ कर उसकी बद-नसीबी पर रोना चाहती थीं, ताकि कनीज़ ये न भूले कि दादी उसकी कितनी मामता रखती हैं। मगर वो तो अब कनीज़ की सूरत को तरस जातीं, वो उसके पीछे लपकतीं, मगर उनकी टाँगों में वो फुर्ती कहाँ। वो कनीज़ के तआक़ुब में कोठी के बावर्ची-ख़ाने में पहुँचतीं। इतने में कनीज़ सलमा-बी के कमरे में बोलती सुनी जा सकती थी। काँखती कराहती दादी बरामदे तय कर के वहाँ पहुँचतीं तो कनीज़ लॉन में खड़ी कुर्सियाँ तरतीब से रखती दिखाई दे रही है, इन हालों पर दादी अपनी फटी हुई आवाज़ में चिल्लाने लगतीं।

“अरी कनीज़ तू बे-हया छलावा हो गई। कमबख़्त इद्दत में तो शरीफ़-ज़ादियाँ अपनी कोठरी से बाहर भी क़दम नहीं रखें हैं… अरी ऐसा सुघड़ापा अपने घर में दिखाया होता तो काहे को इशरत थूक कर छोड़ देता जो दर-दर मारे फिरते?”

इस ऐलान से सारी कोठी गूँज जाती और बड़ी बेगम पर सदमे का दौरा पड़ जाता। सलमा-बी का मुहासों भरा चेहरा त्योरियों पर बल पड़ने से और भी ज़ह्र हो जाता। बड़ी बेगम कहीं से बरामद होतीं, चेहरे पर रंज-ओ-मलाल का गहरा असर लिये, कुंजियों के बोझ से लटका हुआ कमर-बंद नेफ़े में उड़स कर और कनीज़ को गले लगा कर ग़म में डूबी हुई आवाज़ में कहतीं, “जाओ बेटी अपनी दादी के पास। हम तुम्हारे साथ कुछ करें, कहलाएँगे ग़ैर। एक ज़रा तुम अपनी ख़ुशी से हाथ हिला दो तो तुम्हारी दादी-जान को खल जाता है। ऐ हमीद-ओ-कहाँ मर गया? आ कर बिस्तर बिछा दो!”

और कनीज़ का ख़ून जैसे निचुड़ जाता। ये दादी तो पीर-ए-तस्मा-पा हो गई थीं उस के लिये।

“इनका दिल ज़रा बड़ा नहीं। अम्माँ बेगम कैसी तो मुहब्बत करें हैं और दादी का ये हाल कि बस चाहूँ, मैं उनका ज़रा सा काम भी न करूँ। अरे अब अपने पास उजड़ कर किसी का एहसान उतारने को रह क्या गया है।”

कनीज़ दादी को समझा-समझा कर थक गई। मगर दादी की समझ में ख़ाक न आता, हज़ार उल्टी बातें है, रात-दिन कूल्हे पर चिम्मी रहवै है। “ले उतर हरामज़ादी नहीं तो उठा कर पटख़ दूँगी। हाय मेरी कमर टूट गई अल्लाह।” दादी भाँ-भाँ कर के ऐसी चिल्लातीं कि सारी कोठी दहल उठती। सलमा-बी को तो अपनी अम्माँ का ज़रा ज़ोर से बोलना तक बुरा लगता, आख़िर कोठी में रहने के भी कुछ तो आदाब होते हैं। मगर कनीज़ की सूरत देख कर सब्र कर जातीं।

कनीज़ सलमा-बी का कामदानी वाला धानी दुपट्टा ओढ़े दादी के पास खिसियानी हुई आती।

“ऐ दादी कुछ तो होश की दवा करो, लोग समझेंगे शरीफ़ों वाली आदतें ही नहीं…” ये कह कर वो दुपट्टा लहरा कर सर पर डालती। “लाओ मेरी लौंडिया को, तुम्हें तो मेरी औलाद खले है, एक तो छिन गया।” और वो जमी को खसोट कर कूल्हे पर रख लेती, फिर बड़बड़ाती, “कैसी मैली है। सारा नया दुपट्टा ग़ारत कर देवेगी।”

“नया दुपट्टा, लो तुम्हारी आँखें भी फूट गईं, ये दो बड़े-बड़े भभाक़े तो हैं दुपट्टे में, मुआ सड़ा हुआ दुपट्टा ओढ़ कर इतरावे है।”, दादी ग़ुर्रा कर कहतीं।

“वाह, अभी कल तो सलमा ओढ़ कर कॉलेज गई थीं, साईकल में आ गया होगा। ऐ दादी बहुत कमीनी तबीअत है तुम्हारी।” कनीज़ और भी खिसिया कर कहती और दादी आपे से बाहर हो जातीं, “अरे जिस के कारन सर मुंडाया वही कहे मुंडी आई। अब तो मुझ में सारे ऐब नज़र आवें हैं तुझे। तेरे पीछे बे-वतन हुई, सब बेच-बेच तुझे और तेरी लड़कियों को खिलाऊँ मैं और अम्माँ बने वो…”

कनीज़ घबरा कर दादी के मुँह पर हाथ रख देती, और फिर ख़ूब ही तो रोती, दादी को इस बात का ताना देती कि वो खिला कर गिनाती हैं, उसकी क़िस्मत फूट गई इसलिये दादी की आँखें भी बदल गई हैं।

लेकिन जब कनीज़ की आँखें रोते-रोते सूज जातीं तो दादी उसकी ख़ुशामद करतीं और दोनों में मेल-मिलाप हो जाता। चिम्मी फिर दादी की गोद में चढ़ जाती और दादी निम्मी की उँगली पकड़ कर रात की हंडिया रोटी के बंद-ओ-बस्त के लिये बाज़ार को रवाना हो जातीं और कनीज़ एक-बार फिर छलावा बन जाती। कभी बावर्ची-ख़ाने में कभी गोल कमरे में, कभी सलमा-बी के कमरे में।

कनीज़ सलमा-बी के कमरे में एक-आध बार मचल जाती, “ऐ सलमा-बी ये क़मीस तो हम लेंगे।”

“वाह वाह, अभी तो बनाई है हमने, नहीं देते।”, सलमा-बी टका सा जवाब देतीं।

“मेरी बच्ची ने कैसा मुँह फोड़ कर माँगा। एक तो वो ख़ुद ही इतनी ग़ैरत-दार है कि कभी किसी चीज़ की तरफ़ आँख उठा कर नहीं देखती, दे-दे।” बड़ी बेगम कनीज़ की कुमक को फ़ौरन पहुँचतीं।

“ऊँ फिर हमको और क़मीस बना कर दो, इतनी सी क़मीसें तो हैं मेरे पास”, सलमा-बी नख़रा दिखातीं।

“लो अब मैं कहाँ से लाऊँ, तुम्हारे बावा कौन सी रोकड़ छोड़ चले थे मेरे पास… जाने कैसे अल्ताफ़ मियाँ की पढ़ाई और तुम्हारा नख़रा पूरा हो रहा है। बैंक में अब धरा ही क्या है… अब क्या कहूँ कैसे गुज़र हो रही है। तुम्हारी आँखों पर तो पट्टी बँधी है।” बड़ी बेगम एक ठंडी साँस भरतीं।

गुज़र करने ही की तो बात होती है। जब गुज़र न हो तो फिर आदमी क्या करे? कनीज़ का बुर्क़ा-पर्दा ज़ियादा देर क्या चलता, अब सलमा-बी के साथ बाहर उठना-बैठना, कनीज़ को फ़ुर्सत मिले और सलमा की साईकल में पंक्चर भी हो तो कभी-कभी लंबी चौड़ी सड़क पर चहल-क़दमी भी हो जाती, कनीज़ ने ज़रा बाहर का क़स्द किया और दादी मुर्दा चूहे की खाल जैसा बदरंग बुर्क़ा लिये कनीज़ के सर पर मौजूद।

एक दिन तो हद ही कर दी। बड़ी बेगम के सामने बोलीं, “ना बीवी बग़ैर बुर्ख़ा औरत देख मेरा तो जी जल जावे है।”

बड़ी बेगम बेचारी हमेशा दादी का लिहाज़ करतीं। असग़री बुआ कहते मुँह ख़ुश्क होता मगर इस बात से उनके तन-बदन में मिर्चें लग गईं।

“ऐ बुआ, रहने दो शेख़ी बघारने को, हमारे घराने में जैसा पर्दा होता था भला क्या मुक़ाबला करोगी, मेरी लड़की की मजाल नहीं थी। वहाँ खिड़की से झाँक ले पर अब देस छुटा, वहाँ की बातें छुटीं। अब कनीज़ में कौन सा सुर्ख़ाब का पर लगा है। अब तो ऐसे ही घर ब्याही जाएगी जहाँ मियाँ के साथ सैर को जाएगी… वैसे भी मेरा कोई हक़ नहीं? हम तो तुम पर जान दें और तुम…”

दादी चुप हो गईं लेकिन कनीज़ ने उस दिन अपना पुराना बुर्क़ा धो-धा निम्मी-चिम्मी की फ़्राकें मशीन पर बैठ कर सी डालीं। सच है बे-चारियाँ कब से फटेहालों फिर रही थीं… चलो महीना दो महीने इस तरह गुज़र हो ही जाएगी। इस के बाद… इस के बाद… अरे क्या सौतेले बापों के दिल में अल्लाह रहम नहीं डालता…? कनीज़ ने सोचा और उसके कलेजे में ठंड सी पड़ गई। लेकिन गुज़र होती कैसे, तन ढकने को ढक गए। आहिस्ता-आहिस्ता पेट ख़ाली रहने लगे। दादी कनीज़ की सूरत देखते ही दुखड़ा ले बैठतीं, “अब कहाँ से लाऊँ, क़सम ले लो जो अब कुछ हो मेरे पास?”

रोज़-रोज़ की चिल्ली-पुकार मचने लगी… निम्मी-चिम्मी दादी को छोड़ रात-दिन कनीज़ के पीछे लगी फिरतीं, “अम्माँ रोटी, अम्माँ सालन।”

बड़ी बेगम ऐसी दिल वाली कि फ़ौरन अपने सामने की चीज़ उठा कर दे देतीं और कनीज़ शर्मा कर बच्चियों को अपने चिथड़ों-गुदड़ों की तरह समेटने लगती… जी चाहता मारे ग़ैरत के मर जाए।

“ऐ बेटी मुझ से क्या ग़ैरत मेरे तो हल्क़ से निवाला नहीं उतरेगा इन्हें भूका देख कर, तुम्हें इनकी मामता है तो मुझे भी है मगर मैं कहती हूँ बच्ची तुम्हें मेरे ही घर तो नहीं बैठा रहना है। अल्लाह वो दिन लाएगा अपने घर-बार की होगी, मर्द ज़ात सौतेले बच्चों से गुज़र नहीं करते, मैं तो कहती हूँ बच्ची कलेजे पर पत्थर रख कर इन दोनों को इशरत निगोड़े को दे-दे, कमबख़्त को ज़रा पता तो चले कि तलाक़ देना बच्चों का खेल नहीं।” बड़ी बेगम कनीज़ की पीठ पर हाथ रख कर समझातीं।

कनीज़ के दिमाग़ में तो बात बैठ गई लेकिन दादी किसी तरह न मानतीं। कनीज़ रो-रो कर दादी से कहती, “अरे दादी मुझ बद-नसीब के साथ क्यों लड़कियों की मिट्टी पलीद करोगी तुम। अब कहाँ से खिलाओगी?”

मगर दादी तो कानों पर हाथ रखतीं।

मगर जब एक दिन दादी बा-वुजूद दिली-ख़्वाहिश के अपना संदूक़ न खोल सकीं और दिन-भर चूल्हा न जला तो कनीज़ ज़ब्त न कर सकी, “ऐ दादी अब निकालो न रोकड़, क्यों लड़कियों को अज़ाब दे कर मार रही हो।”, कनीज़ चिल्लाई और फूट-फूट कर रोने लगी।

“मेरी बोटियाँ नोच लो, अब क्या धरा है मेरे पास, अब अपनी कोठी वाली मय्या से कहो ना…”, दादी ने तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया।

“रहने दो, अम्माँ बेगम का नाम क्यों बीच में घसीटती हो, वो कहाँ से लावें? उनके पास हो तो मेरे बच्चों से गुरेज़ करने वाली नहीं वो। क्या-क्या करें वो, वाह ये तो वही साँप के बिल में साही के छुपने वाली बात करती हो।”, कनीज़ की आँखें लाल अंगारा हो गईं।

“अच्छा तो फिर चल अपने मुरादाबाद, महीने दो महीने का परमिट तो बन ही जावेगा।” दादी ने आख़िरी हर्बा इस्तिमाल किया और कनीज़ का दम निकल गया।

“अच्छा किराया निकालो, परमिट बनवा लो।” कनीज़ इतना कह कर खाट पर मुँह ढक कर पड़ रही। दादी का सारा जोश ख़त्म हो गया। कहीं से चार जनों का किराया और भी हवाई जहाज़ का, चलो हो गया, मान लिया परमिट भी बन गया। फिर वकील जो कहता था परमिट ख़त्म होने पर वापसी होगी… फिर क्या होगा?

रात को कनीज़ ने निम्मी-चिम्मी को रो-रो कर दादी के साथ रुख़्सत कर दिया। दादी रोती-कपकपाती चिम्मी को गोद में उठाए निम्मी की उँगली पकड़े इशरत की कोठरी तक पहुँचीं। इशरत ने निम्मी को तो चूम-चाट कर गोद में बिठा लिया और चिम्मी की तरफ़ आँख भी न उठाई। बोला, “मैं इतनी सी छिछड़ी को कहाँ उठाए फिरूँ। अब एक ही रखो। मामता ख़त्म हो गई तुम्हारी?”

दादी के पतंगे से लग गए। चिम्मी को ज़बरदस्ती उतारना चाहा तो चिम्मी की चीख़ों से कलेजा हिल गया… दादी बग़ैर कुछ जवाब दिये चिम्मी को लिये वापिस आ गईं… और कनीज़ जो चिम्मी को देख कर गोद फैलाए रोती दौड़ी तो बस बेगम का कलेजा हिल गया। दादी ने अपने कपकपाते सर को और हिला कर कहा, “सच है मामता भी कहीं मरे है।”

लेकिन दो-चार दिन बाद ही सूखी, कमज़ोर और आए दिन की मरीज़ चिम्मी ने मम्मी की याद में हुड़क कर दादी की कमर पर रात-दिन चढ़ाई जो शुरू की तो “मामता” की तरफ़ से उनके ख़यालात में बड़ी इन्क़िलाबी तब्दीलियाँ बरपा हो गईं।

“अल्लाह तेरा पर्दा ढक ले बच्ची, अरी बद-नसीब का कोई नहीं होवे है, न माँ न बाप…”

दादी की ज़बरदस्त आहें कोठी के कोने-कोने में गूँज उठतीं और ये रात-दिन के नौहे, ये आहें सुन-सुन कर बड़ी बेगम का दिल दहल जाता। घर में जवान पछत्ती बेटी, विलायत में पाँच साल की पढ़ाई के लिये गया हुआ जवान शेर सा बेटा और घर के एक कोने में अफ़ीम खा कर ऊँघते हुए बूढ़े फूँस ससुर, इस कोठी के वाहिद मर्द, इस पर ग़रीब-उल-वतनी मुस्तज़ाद… इन हालों में कोठी के अंदर दादी के वक़्त-बे-वक़्त के नौहे न ये देखें कि दोनों वक़्त मिल रहे हैं, न ये कि अज़ान की आवाज़ आ रही है… बस हमा-वक़्त दुनिया की बे-सबाती के नक़्शे खिंच रहे हैं, कोई सुने न सुने, दुखड़े बयान हो रहे हैं… बेगम नहूसत कम करने और अपना ध्यान बटाने को इस समय ज़ोर-ज़ोर से सलमा और अल्ताफ़ की शादी ब्याह की मंज़र-कशी करतीं… कनीज़ के जहेज़ की तफ़्सीलात के बारे में सलमा से मश्वरा तलब करतीं।

“ऐ भई अब तो कनीज़-बी का भी अपने ही ऊपर फ़र्ज़ है, अभी से तैयारी करेंगे तब जा कर दो-चार साल में ऐसा जहेज़ बनेगा कि हज़ार पान सौ वाला भी देख कर ख़ुश हो जाए। सलमा कनीज़ के लिये वो नगों वाला सूट कैसा रहेगा। उस पर खिलेगा भी ख़ूब… बिल्कुल सिनेमा की शहज़ादी दिखेगी। मैं तो कहती हूँ कि मुँह से ये कनीज़ निगोड़ी ऐसी कच्ची-कच्ची लगती है कि अगर किसी को बच्चे न दिखाए जाएँ तो कुँवारी ही समझे…”

चिम्मी को बड़ी बेगम के दिये हुए क़लमी आम खा कर दस्त लगे हुए थे। कनीज़ को अपने कामों से इतनी फ़ुर्सत कहाँ कि उसे पता भी चलता, ज़रा फ़ुर्सत मिली तो सलमा-बी की ड्रेसिंग टेबल के लंबे आईने के सामने खड़ी कामदानी वाला धानी दुपट्टा सीने से ढलकाए देर से कंघी किए जा रही थी। ख़ुदा जाने कब तक आईने-कंघे से जूझी रहती, अगर दादी की फटी हुई आवाज़ कमरे में न घुसती, “अरी कनीज़ देख तो सही ना-मुराद… लौंडिया आँखें फेरे लेवे है।” और कनीज़ ग़रारे में उलझती बगटुट भागी। चिम्मी सच-मुच गर्दन डाले दे रही थी।

“हाय दादी मेरी बच्ची को क्या ज़हर खिला दिया, हाय सब तो छुट गए थे। ये एक भी तुम्हें खल रही थी, ये मर गई तो मुझे भी न पाओगी दादी।”

उसी रात हस्पताल में चिम्मी चुप-चाप मर गई। कनीज़ ने मरने की बहुत कोशिश की। सर फोड़ डाला। धानी कामदानी का दुपट्टा दाँतों से नोच कर चिंधी-चिंधी कर दिया। मगर दादी उस से लिपटी साथ-साथ लुढ़कती फिरीं, उसे मरने का मौक़ा ही न दिया… दादी को तो अपने पाले-पोसे की इतनी आग थी, फिर जिस ने नौ महीने पेट में रखा हो उसके दिल का हाल कौन नहीं जानता।

कनीज़ ने कई वक़्त खाने की तरफ़ निगाह न उठाई। रो-रो कर आँखें सूज गईं कि वो पलक उठाने से भी माज़ूर हो गई। उसकी ये हालत देख-देख बड़ी बेगम के दुपट्टे का पल्लू भी आँखों से न हटता… सलमा-बी भी कई बार कनीज़ के गले लग कर घिघिया गईं और फिर आँखों पर हाथ रखे अपने कमरे में भाग गईं।

मगर कोई कहाँ तक रोए, दरियाओं तक को निकास की राह मिल जाए तो उतर जाते हैं। फिर बड़ी बेगम की ग़म-ख़्वारियाँ, वो रात-दिन इसी फ़िक्र में घुटतीं कि कनीज़ बच्चों का ग़म भूल जाए, एक मिनट के लिये भी उसे अपने पास से जुदा न करतीं, चुपका भी न बैठने देतीं, सलमा-बी को भी अब उ का इंतिहाई ख़याल रहता।

“आओ कनीज़ दुपट्टे में सितारे टाँकें।” वो अपना दुपट्टा ले बैठतीं और कनीज़ ग़म की मारी कठ-पुतली की तरह उधर ही लग जाती, एक-एक सितारा यूँ एहतियात से टाँकती जैसे अपने कलेजे के नासूर नुमाइश के लिये रख रही हो।

“आओ बेटी कनीज़, सलमा के दादा मियाँ के पाजामे सी डालें।”

बेगम लट्ठे का थान उसके सामने फैला देतीं और कनीज़ वहाँ भी जुट जाती। ग़रज़ बड़ी बेगम और सलमा-बी ने कनीज़ का ग़म भुलाने के लिये कोई हद न उठा रखी, कई बार बड़ी बेगम कनीज़ की ख़ातिर सिनेमा तक चली गईं… सलमा-बी ने अपने कपड़ों की अलमारी खोल दी कि जो चाहे ले लो… बड़ी बेगम ने अपनी छंगुलिया का सोने का छल्ला तक उतार कर उसे पहना दिया… और चुपके से उस पर झुक कर बोलीं, “हमारी कनीज़ का दूल्हा इसी तरह अँगूठी पहनाएगा।”

और कनीज़ उस दिन चिम्मी की मौत के बाद पहली मर्तबा शरमा कर कमरे में भाग गई और आहिस्ता-आहिस्ता वो फिर यूकलिप्टस, शीशम और गूलर के दरख़्तों में दुबकी हुई पुर-असरार नन्ही सी कोठी में छलावा बन गई। अभी सलमा-बी के कमरे में है तो अभी बावर्ची-ख़ाने में बैठी सेवय्यों का ज़रदा पका रही है। ऐ लो नज़र चूकी कि वो बड़ी बेगम के ग़ुस्ल-ख़ाने में ग़ायब, ज़रा वक़्त नहीं लगा कि बड़ी बेगम का चूड़ीदार पाजामा और सलमा-बी का दुपट्टा ओढ़े बरामदे की चिकनी सतह पर गीला कपड़ा लुटा-लुटा कर फ़र्श चमका रही है, अब ये भी कोई तुक है, नहा धो कर ऐसा गंदा काम? बड़ी बेगम लाख-लाख कह रही हैं कि अरी कनीज़ तुझ से कौन कहता है ऐसे कामों को, भंगन किन कामों के लिये है, मगर कनीज़ भी किसी की सुनती भला। बड़ी बेगम ने ज़ियादा बड़बड़ की तो दौड़ कर नलके से हाथ धोए और तेल की शीशी लिये बड़ी बेगम के सर पर मौजूद कि हम तो तेल दबाएँगे। बड़ी बेगम की आँखों से मुहब्बत नूर की शआएँ बन कर फूटने लगतीं और वो ठंडी साँस भर कर ये कहे बिना न रह सकतीं कि कनीज़ जिस घर जाओगी, उजाला कर दोगी। इशरत मुआ गँवार का लठ तेरी क़द्र क्या करता?

“ऐ तो फिर अब कनीज़ के लाइक़ बर ढूँढो ना, मेरे मियाँ के ख़त आवें हैं कि मरते वख़त तो साथ दो। मैं यहाँ कब तक जवान लौंडिया को लिये बैठी रहूँ। नहीं तो मैं सोचूँ लौंडिया को साथ ले जाऊँ रिश्ते बिरादरी में बहुत लड़के पड़े हैं।” दादी आए दिन तक़ाज़ा करतीं।

“ऐ असग़री बुआ, नाम न लो अपने रिश्ते-बिरादरी का। तुमने पहले ही बच्ची की क़िस्मत फोड़ने में कोई कसर रखी थी? मेरी ज़बान न खुलवाओ। अभी इसकी उम्र ही क्या है। अपनी सलमा से दो तीन साल बड़ी होगी और बुआ जो तुम कहो जल्दी की, तो मैं जैसे सलमा के लिये देख-भाल करूँगी वैसे ही कनीज़ के लिये। अब कोठी से रुख़्सत होगी तो हमारे टक्कर वाले के साथ होगी… कनीज़ के पयामों की न कहो, कई मश्शाताओं से कह रखा है, हर चौथे उठो अरे कोई न कोई सवाल करता है अब मैं तुम्हें कहाँ तक दिखाऊँ…?” बड़ी बेगम घंटों बड़बड़ाती रहतीं।

दूसरे चौथे ही मोटर साईकल पर एक शख़्स आया। बड़ी बेगम बहाने से उठीं और दादी को बुला कर झँकवा दिया।

“अच्छा तो है कर दो…” दादी ने ख़ुश हो कर कहा।

“लो बीवी, कह दिया कर दो… मैंने पूछ-गिछ की, पता चला शराब पीता है। मैं तो न करूँ चाहे रोज़ आ कर नाक रगड़े।”, बड़ी बेगम ने टका सा जवाब दिया।

“कर दो, कनीज़ की क़िस्मत से सुधर जाएगा” दादी पर तो जल्दी सवार थी। उन्हें तो अच्छा-भला भोला सा लग रहा था लड़का। फिर उन्होंने काहे को कभी ऐसा “साहब” दरवाज़े आया देखा था। वो तो कहतीं बद-नसीब तलाक़न को कोई मर्द की शक्ल जुड़ जाए यही बहुत है।

“फिर तुम ही लड़के से बात कर लो, मैं तो बीच में न पड़ूँगी। तुम्हारी ज़िम्मेदारी, फिर शिकायत न करना।” बड़ी बेगम दरवाज़े से एक तरफ़ हो गईं। दादी कलेजा मसोस कर रह गईं। उन्हें यक़ीन ही न आता था कि उनकी बद-नसीब कनीज़ के ऐसे सुर्ख़ाब के पर लग गए हैं।

आए दिन बेगम राह चलते लोगों की तरफ़ इशारा कर के बतातीं, “अरे देखो असग़री बुआ, उस लड़के की अम्माँ ने मुझ से कहा था, चाहे कनीज़ दे-दो चाहे सलमा। न बीवी इस से तो मैं कभी न करूँ। काला कलूटा।”

हर शख़्स में कोई न कोई ऐब। दादी उकता कर रह गईं, जहेज़ के कपड़ों पर कपड़े बनने लगे, बर्तन ख़रीदे जाने लगे और दादी को ज़रा ढारस होने लगी कि दुनिया में मुँह बोले की भी कुछ वुक़अत है। उन्होंने अपने मियाँ को लिखवाया, “अरे मियाँ ज़रा सब्र करो लौंडिया का ठौर-ठिकाना कर के बस चुटकी बजाते में पहुँचूँगी… फिर चाहे हम दोनों पाकिस्तान आ कर पड़ रहेंगे। लौंडिया के घर अपने लिये एक कोठरी तो कहीं नहीं गई।”

मगर एक दिन उनकी सारी स्कीम मालिया-मेट हो गई। दादी उस दिन कनीज़ की बे-तवज्जोही पर बहुत बिफरी हुई थीं। चिम्मी के मरने के बाद बड़ी बेगम ने इसरार कर के दादी को अलग खाने-पकाने से मना कर दिया था। सो अब वो शर्मा हुज़ूरी कोठी के बावर्ची-ख़ाने से खाती थीं। हमीद भाग गया था और बेगम कहती थीं कि मेरे सोने के बुंदे ले कर भागा है। पुलिस थाना कौन करता मगर उन्होंने आइंदा के लिये तौबा कर ली थी कि मर्द नौकर को हरगिज़ कोठी में न रखेंगे। क़रीब का सौदा तो दादी मर-जी कर ले ही आतीं, मगर दूर बाज़ार जाना हो तो उस के लिये वो मजबूर थीं। कनीज़ ने सलमा-बी की साईकल चलाना तो सीख ही ली थी। एक दिन बोली, “लाओ दादी सौदा में ले आऊँ। साईकल पर दो मिनट लगेंगे।”

दादी के घराने में भला काहे को जवान-जहान औरतों की ये जुरअतें! आपे से बाहर हो गईं।

“ऐ लड़की होश की दवा करो, क्यों मय्या-बावा की इज़्ज़त के दरपै होवे है, खोद कर गाड़ दूँगी और आह न करूँगी।”

ये तो गोया खुल्लम-खुल्ला बड़ी बेगम की तरबियत और सलमा-बी के चाल-चलन के ख़िलाफ़-ए-ऐलान जंग था। हद होती है सब्र की। बड़ी बेगम को कोई और इस तरह कहता तो जूती से मुँह मसल देतीं उसका। जूती तो न उठाई, मगर सुनाईं बे भाव की, “शर्म नहीं आती, इतनी बूढ़ी हो गईं। कोठियों में रहोगी तो कंजड़ों-क़साइयों की तरह रात-दिन की भाँ-भाँ न चलेगी। वाह ले के सारों में हमें बदनाम कर दिया। सुनने वाले हमें भी तुम्हारे जैसा समझेंगे।”

“ऐ दादी तो मुझ बद-नसीब को दम न लेने देवेंगी। ये तो मुझे मार कर मरेंगी। अल्लाह तू मेरा पीछा कटवा इनसे।” कनीज़ भी ज़ब्त न कर सकी। आख़िर वो इतने दिन से कोठी वालों के ख़िलाफ़ दादी का मुआनिदाना और जारिहाना अंदाज़ अपनी आँखों से देख रही थी। अल्लाह ये दुनिया फ़रिश्तों पर भी ऐब लगाने से नहीं चूकती। दादी कनीज़ की ये चोट बर्दाश्त न कर सकीं, ख़ूब लड़ीं, अपने सारे एहसान गिनाए और उसी वक़्त हिन्दोस्तान के लिये परमिट की दरख़्वास्त देने निकल खड़ी हुईं।

“ऐ बूढ्ढा मरने को डरावे जवान भागने को, पर दादी ऐसी कि भागने को डराएँ। जानें मेरा कौन साथ देने वाला है।”

कनीज़ के इन तानों के बा-वजूद दादी ने अपना परमिट बनवा लिया। दबे-दबाए ज़ेवर काम आ ही गए। अगर वो भी खिला दिए गए होते तो आज मांगे भीक न मिलती। चंद महीने से कनीज़ को न खिलाया तो आज कनीज़ की आँखें बदल गईं, जूते मारने की कसर रह गई। दादी सोचतीं, कहते हैं जिसके पास दाम हों उसका मुर्दा भी रोने वाले बहुत, परमिट के दफ़्तर के एक क्लर्क ने जल्द ही हवाई जहाज़ को एक सीट भी रिज़र्व करा दी, और दादी अपनी बुक़ची उठा चलने को खड़ी हो गईं, हर तरफ़ से दिल-शिकस्ता। अपने मियाँ के साथ मरने-जीने को।

ताँगे में सवार होने से पहले दादी का दिल भर आया, “कनीज़ मेरी, क़द्र होवेगी… अभी कुछ नहीं गया… अपने झुमके बेच कर मुरादाबाद आ जाइयो, महीना दो महीना में वहाँ तेरा फ़ैसला…”

“जाने दो दादी… मेरी चिम्मी को मार डाला, मेरी निम्मी को छुटा दिया कि खिलाने को नहीं… अब कहाँ से तुम्हारे किराए के निकल आए, हाय मय्या मुझ बद-नसीब को क्यों जना था…?” कनीज़ ने मुँह फेर लिया और दादी का मुँह कड़वा हो गया।

ताँगा चलने पर कनीज़ बावर्ची-ख़ाने की जाली से लग कर यूँ रोई कि सारे ज़ख़्मों की खुरंड उतर गई। टप-टप ख़ून की बूँदें गिरने लगीं। इशरत, मुम्ताज़, निम्मी, चिम्मी और दादी, सब धम-धम करते ज़ख़्मी कलेजे पर से उछलते-कूदते ग़ायब हो गए।

बेगम ने सीने से लगाया। सलमा-बी ने तसल्ली के लिये उसका मुँह तक चूम लिया। हद तो ये है कि सलमा-बी के दादा तक ने उस दिन उसके सर पर हाथ फेरा और कनीज़ के आँसू पलकों पर ही जल गए। लेकिन वो कई दिन तक जैसे खोई सी रही। वो कोठी के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते-जाते रुक जाती। सड़क पर नज़र डालते-डालते आँख नीची कर लेती… कुछ इस तरह जैसे पिंजरे की तीलियाँ टूट गई हों और वो एक दम खुली फ़िज़ा में फेंक दी गई हो और अब ये फ़िज़ा उसे डरा रही थी… वो एक टूटी तीली उठाती, चूमती, सीने से लगाती और फिर रख देती… सारे रिश्तों से आज़ाद हो कर वो ख़ुद को किस क़दर अजनबी महसूस कर रही थी।

 

जाड़े की तेज़-तेज़ हवाएँ चलतीं। पैरों तले आम, गूलर, पीपल के ज़र्द पत्ते चुर-मुर दब कर टूटते। हर तरफ़ एक अजीब सा सन्नाटा, एक सोचती सी वीरानी। बड़ी बेगम लॉन में पलंग बिछाए, ज़ियादा वक़्त पिंडलियों और कमर पर तेल की मालिश करवाती रहतीं, सूरज सर पर चमकता, फिर भी उनके जोड़ों में सर्दी घुसी दर्द पैदा करती रहती… उन्हीं दिनों एक डाक्टर उन्हें देखने आया करता। बड़ी बेगम ने एक दिन थकी माँदी सी कनीज़ से पूछा, “डाक्टर साहिब तुझको कैसे लगते हैं?

और कनीज़ एक अर्से बाद फिर चौंकी। दादी के जाने के बाद पहली मर्तबा वो कुँवारियों की तरह मुस्कुरा कर सुर्ख़ हो गई और फ़ौरन वहाँ से उठ गई। बहुत दिनों बाद जैसे फिर उसके छोटे-छोटे हाथों में बिजली की फुर्ती भर गई… उसने जी लगा कर बावर्ची-ख़ाने की सफ़ाई की, बर्तन सूखी राख से इस तरह रगड़ कर माँझे कि चाँदी के नए ज़ेवरों की तरह चमक गए… इसके बाद झाड़ू उठाए घर की रोज़ाना सफ़ाई इस मेहनत से की कि कहीं मकड़ी के जाले का एक तार न रह सका, एक तिनका न रहा।

“ऐ सलमा ऐ सलमा अपनी बहन का हाथ बटा… बैठी क्या देख रही है, देखूँगी तू कौन से घर जाएगी जहाँ उठ कर तुझे तिनका न तोड़ना पड़ेगा।”

बेगम पुकार-पुकार कर कहती रहीं और सलमा-बी बैठी अपने नाख़ुनों पर प्याज़ी रंग की पालिश करती रहीं।

कनीज़ ने अपने जी में सोचा, “सलमा-बी जैसी काहिल लोथ तो माँ बाप की नज़र में भी गिर जावें हैं, इंसान का काम प्यारा होवे है चाम नहीं।”

कामों में जहेज़ के कपड़ों की तैयारी भी तो शामिल थी, कनीज़ रातों को भी मशीन खटकटाती रहती। लचके, गोटे, सितारे और आईने टंकते रहते। बेगम सुस्ती से टाँगें फैला कर जमाही लेतीं और कह उठतीं, “देखें मेरी दोनों बच्चियों में से पहले किस का नसीबा खुलता है?” और नसीबा खोलने के लिये कनीज़ के हिसाबों दौड़ शुरू हो चुकी थी। डाक्टर साहिब आला हाथ में लिये, बैग झुलाते आते, बेगम की मिज़ाज-पुर्सी के बाद गोल कमरे में तशरीफ़ रखते। सलमा-बी अपना लिपा-पुता चेहरा एक ख़ास ज़ाविये से ऊँचा किये पुराने सोफ़े पर बैठतीं और उनके पस-ए-मंज़र में कनीज़ नुमूदार होती। झुकी-झुकी आँखें, चूड़ीदार पाजामा और पतली कमर में फँसी हुई सलमा-बी की फ़्राक… हाथों पर चाय की ट्रे… उस समय सलमा-बी ख़ुद को किसी महल की रानी से क्या कम समझतीं। पुराने सोफ़े से ले कर कनीज़ तक हर चीज़ उनके हुस्न और शान में इज़ाफ़ा ही करती और कनीज़ शरमाती लजाती, पर्दों के पीछे ग़ायब होते हुए सोचती, “ऐ सलमा-बी की भी कोई शक्ल है, टेढ़ा-टेढ़ा नक़्शा, उस पर से मुहासों के टीले, अपने आप को परी समझें हैं कोह-ए-क़ाफ़ की।”

महीना नहीं गुज़रा सलमा बी-बी की बात भी पक्की हो गई, और कड़कड़ाती सर्दी की एक रात को सलमा-बी दुल्हन बन कर रुख़्सत भी हो गईं। ब-क़ौल बड़ी बेगम नसीबे की बात है। पहले सलमा-बी का नसीबा ही खुल गया, उसके साथ ही बड़े संदूक़ और मतरूका जाएदाद की अलमारियों के बड़े-बड़े पट भी खुल गए, पुरानी ड्रेसिंग टेबल नई पालिश से चमक कर चल दी। पुराने सोफ़ों पर नया कपड़ा क्या मंढा गया, वो भी गोल कमरा सूना कर गए… कोठी की तरह सूने, वीरान, संदूक़ और अलमारियाँ पड़ी भाँय-भाँय करतीं और कनीज़ के दिल की हालत तो उन संदूक़ों और अलमारियों से भी बद-तर थी। शादी की रात से क़हर सा पड़ रहा था। हर तरफ़ ठंड, हर चीज़ गीली, दूसरे दिन जब कनीज़ ने रात-भर की जगाई के बाद, बड़ी बेगम के गठिया के दर्द की शिकायत सुन कर चाय बनाने के लिये बावर्ची-ख़ाने में क़दम रखा तो उसकी जलती हुई आँखें कोहरे से धुँदलाए हुए दरख़्तों की अफ़्सुर्दगी और वीरानी पर…

बेगम, कनीज़ को थके हालों देख कर तड़प-तड़प जातीं। बेटी ब्याह कर वो ख़ुद वीरान हो गई थीं। अब तो कोई आ कर कोठी में झाँकता भी न था। फिर कनीज़ के पयाम कौन लाता… वो बैठे-बैठे थक जातीं तो लेट जातीं, लेटे-लेटे कमर लग जाती तो बैठ जातीं। कनीज़ जो अलग-अलग फिरती होती, तो उसे पास बुलातीं, गले लगातीं, “कनीज़ तू भी मेरे कूल्हे से लगी कब तक बैठी रहेगी, एक दिन सलमा-बी की तरह घर लौट कर चली जाएगी, फिर मैं नसीबों-जली अकेली की अकेली, हाय जल्दी से वक़्त गुज़र जाता और अल्ताफ़ विलाएत से आ जाता। उसके सहरे के फूल खिलते देख लेती…”

ये कह कर बड़ी बेगम की आँखें पुर-आब हो जातीं और ये सब सुन कर कनीज़ की थकी हुई रगों में तनाव सा आता जो फ़ौरन ही टूट जाता… बस उसका जी चाहता कि वो कुछ न करे, हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे, यूँ ही अम्माँ बेगम की तरह पड़ी रहे या फिर उन्ही की तरह बात-बात पर रोया करे।

घर में धूल जमती गई, कमरों के कोनों में मकड़ियों ने जाले तान लिये और मज़े से अफ़्ज़ाइश-ए-नस्ल करने लगीं। बावर्ची-ख़ाने में देगचियाँ काली हो गईं। बेगम के ससुर दिन भर बग़ैर हुक़्क़े के पड़े ऊँघा करते। वो अब इतनी ज़ियादा अफ़ीम खाने लगे थे कि उनको खाँसने तक का होश न रहता। हर चीज़ पर एक जुमूद, जैसे वक़्त कुछ थम कर सोचने लगा हो।

सलमा-बी के मियाँ का कहीं तबादला हो गया था। काफ़ी अर्से बाद दो दिन के लिये सलमा-बी अपने मियाँ के साथ आईं। घर की हालत देख कर बौला गईं कि क्या बुरा असर पड़ा होगा उन के मियाँ पर। वो बड़ी बेगम से बात किये बग़ैर न रह सकीं, लेकिन बड़ी बेगम रूठ गईं। अब कहाँ तक वो अकेली ज़िंदगी की गाड़ी धकेलतीं। साहिब-ज़ादी ने तो आ कर एतिराज़ कर दिये। बचा ही क्या है जिस के बिरते पर वो दो-चार नौकर लगा कर साहिब-ज़ादी की मर्ज़ी का मेयार बनाएँ। सलमा-बी खिसिया कर रह गईं। तीसरे दिन सलमा-बी अपने मियाँ के साथ गर्मियाँ गुज़ारने मरी चली गईं, जाने से पहले अपने पुराने कमरे में वो कनीज़ से गले मिलीं और कहा कि, “मैंने तुम्हारी शादी में देने के लिये ऐसा अच्छा सूट का कपड़ा अभी से ख़रीदा है कि देखोगी तो आँखें खुल जाएँगी।” लेकिन कनीज़ उनके जाने के बाद भी उस सूट के बारे में कोई वाज़ेह तसव्वुर क़ायम न कर सकी। उसका दिल पलट गया था। वो इशरत को याद करने की कोशिश करती और जब उसका ख़याल भी न जमता तो बस उसका जी चाहता आँखें बंद किये पड़ी रहा करे। मौसम भी तो बड़ा सख़्त गर्म था।

“अम्माँ किस का ख़त है?” कनीज़ ने बहरी डाक से आए हुए बड़े से लिफ़ाफ़े को देख कर बे-दिली से पूछा। उसे जाने क्यों इन दिनों दादी के ख़त का इंतिज़ार रहता। बेगम ने लिफ़ाफ़ा खोल कर एक बड़ी सी तस्वीर निकाली। अच्छे भले शक्ल-ओ-सूरत के मर्द की तस्वीर थी। बड़ी बेगम ने लपक कर तस्वीर को चूम लिया।

“ये कौन हैं अम्माँ बेगम।” कनीज़ ने जाते-जाते पूछ लिया।

“ऐ लो तुम्हें ख़बर ही नहीं, मेरा अल्ताफ़ है, मैंने नई तस्वीर मँगाई थी। ऐ देखो सुअर ने मूँछें बिल्कुल साफ़ कर दीं, क्या बुरा मुँह लगता है मर्द का मूँछ बग़ैर।” बड़ी बेगम की आँखों में मारे मुहब्बत के आँसू आ गए। उसी वक़्त तस्वीर बग़ैर फ़्रेम के सोफ़ों वाले गोल कमरे में सजा दी गई, सलमा-बी के छोड़े हुए एल्बम में अल्ताफ़ की ज़रा सी तस्वीर थी, जिस में शक्ल का पता न चलता, पर अब तो एक-एक चीज़ साफ़ थी। जब तक सलमा-बी घर में थीं तो विलायत बिराजे हुए अल्ताफ़ के इतने तज़किरे न होते, लेकिन अब तन्हाई में बेगम को उसके सिवा कुछ सूझता ही न था। बेटियाँ तो माँ-बाप के घर चिड़िया की तरह बसेरा लेती हैं और फिर अपने ठिकानों को उड़ जाती हैं। बेटा, बेटा है। देस में हो या परदेस में। रहेगा माँ-बाप के घर का और फिर अब तीन साल ही तो बाक़ी थे पढ़ाई के। बेगम एक-एक दिन गिना करतीं…

“ऐ बेटा। ऐ बच्ची कनीज़ कहाँ हो, इधर तो आओ।”, बड़ी बेगम कनीज़ को पुकारतीं। कनीज़ थके-थके क़दम उठाती दुपट्टे के पल्लू से हाथ पोंछती आती।

“क्यों बेटा, अल्ताफ़ के लिये कौन सा कमरा साफ़ कर लिया जाए, अभी से कर लें वर्ना उसके आने के बाद तो मारे ख़ुशी के मुझ से कुछ न होगा।” बेगम हौल कर पूछतीं, जैसे अल्ताफ़ बस रात की गाड़ी से वहाँ पहुँच रहे हों।

“वही सलमा-बी वाला अम्माँ बेगम।” कनीज़ बेगम के दिल की बात कहती।

“अच्छा तो फिर कल मिल कर कमरा ठीक कर लेंगे।” बेगम तय करतीं। लेकिन कनीज़ इस “कल” को उमूमन अपने रोज़ाना काम में भूल जाती, यही क्या, कनीज़ तो हफ़्तों कंघी करना भी भूल जाती, अर्से से वो बेगम की संदूकची में रखे हुए नन्हे से आईने में अपनी सूरत देखना तक भी भूल चुकी थी। उसे अब इशरत की याद भी न आती, न मुम्ताज़, न निम्मी और न दादी… और चिम्मी तो जैसे उस के हाँ पैदा ही नहीं हुई थी। बसा-औक़ात वो तो ये भी भूल जाती कि वो कहाँ बैठी है और बेगम जिन पर उसकी जान जाती थी, उसकी मुँह बोली अम्माँ हैं या महज़ एक सूखा हुआ पत्ता।

 

अल्ताफ़ का ख़त महीनों में आता और जब आता तो बेगम की ईद हो जाती, गठिया का दर्द भूल कर सारे घर में नाची-नाची फिरतीं।

तो उस दिन भी अल्ताफ़ का ख़त आया था…

बारिश का मौसम ख़त्म हो चुका था, इसके बा-वुजूद फ़िज़ा में ठंड के बजाए गर्मी की उमस थी। कम-अज़-कम कनीज़ को तो ऐसा ही महसूस होता। उसकी पतली सी सुतवाँ नाक और ऊपर के होंठ पर पसीना ही पसीना रहता। खाना तो खाया ही न जाता… उस वक़्त वो ब-मुश्किल आधी रोटी हल्क़ से उतार कर बैठी थी और उसे जाने क्यों दादी बड़ी शिद्दत से याद आ रही थीं।

“ऐ कनीज़, ऐ बच्ची, ले और सुन।” बड़ी बेगम पीछे से झूमती-झामती कुंजियों का गुच्छा बजाती आईं और कनीज़ इस तरह चौंकी जैसे वो ऐन चोरी करते पकड़ी गई हो। दिल धड़-धड़ करने लगा, उन दिनों ज़रा सी आवाज़ पर यही हाल हो जाता।

“अल्ताफ़ मियाँ ने लिखा है अम्माँ इजाज़त दो तो तुम्हारे लिये एक बहू ले आऊँ, ऐसी बहू कि अंग्रेज़ बिल्कुल नहीं लगती… लो बीवी मेरी तो कमबख़्ती है।” बेगम का गला रुँध गया, कनीज़ ऐसी बे-तअल्लुक़ सी बैठी रही जैसे बावर्ची-ख़ाने की खिड़की में से सड़क पर नज़र डाल रही हो।

“तौबा! इस घर में सुअर खाने वाली बहू आए। ऐ ऐसी बहू तो उठ कर काहे को किसी काम में हाथ लगाएगी, मियाँ की सारी कमाई बैरों-ख़ानसामों पर उड़ेगी। हम अपनी सारी जमा-जत्था बेटे-बेटी पर उठा कर वही मुँह देखते रह गए ना। न बीवी… काहे को इजाज़त दूँगी? लिखूँगी मरते वक़्त दूध न बख़्शूँगी, ज़हर खा लूँगी, फिर मेरे बाद जो जी चाहे करना… मैं इस औलाद के लिये मर गई, उम्मीद थी बहू आ कर कुछ सुख देगी।” और बेगम ज़ार-ओ-क़तार रोने लगीं।

“अम्माँ बेगम फिर उन की शादी कर के क्यों नहीं भेजा।”, कनीज़ ने जैसे एतिराज़ जड़ दिया।

“ऐ लाख सलीक़े वाली लड़की ढूंढी, फ़ैशन वालियाँ, पढ़ी-लिखी। अपनी सलमा-बी जैसी तो लाख मिल जाती हैं मगर फ़ैशन के साथ घरदारी करने वाली भी तो हो, शक्ल-ओ-सूरत भी हो ऐ बस समझो…” बेगम ख़ला में नज़रें गड़ो कर कुछ ढूँढने लगीं (और कनीज़ सोचने लगी पता नहीं मुरादाबाद का टिकट दादी ने कितने में ख़रीदा होगा) और फिर बेगम अचानक ख़्वाब-नाक आवाज़ में बोलीं, “ऐ बस समझो मैं तो तुम्हारी जैसी… हाँ।” बेगम हकला गईं।

और कनीज़ के जिस्म पर तड़तड़ा कर जैसे बिजली टूट पड़ी। वो कितनी देर तक सुन्न बैठी रही और फिर जब उठी तो मशीन की तरह घर के महीनों से पड़े हुए कामों में जुट गई। उस दिन अल्ताफ़ मियाँ का कमरा बिल्कुल तैयार था।

अल्ताफ़ का कमरा रोज़ाना सुब्ह-सवेरे चार बजे से साफ़ होता। इसके बाद कोई और काम होता। सारा घर ऐसा चमकता, जैसे अभी बन कर तैयार हुआ हो। बेगम का जिस्म इतना दबता कि गठिया का दर्द कहीं दुबक कर रह जाता। उनके सर में इतनी बोतलों का तेल ठिनक-ठिनक कर ख़ुश्क हो जाता कि अगर उनके बाल दुबारा काले हो जाते या वो एक दिन बैठे-बैठे बी.ए. पास कर लेतीं तो कुछ हैरत न होती। दुआएँ दे-दे कर बेगम का मुँह दुख जाता, लेकिन कनीज़ न थकती। वो घर का ख़र्च कम करने की ऐसी दरपै हुई कि बसा-औक़ात शदीद भूक के आलम में रूखी-सूखी खा कर उठ जाती, बेगम अरे-अरे कह कर उस का हाथ पकड़ लेतीं, लेकिन कनीज़ ने धोबी को भी जवाब दे दिया कि, “वो ज़रा-ज़रा से कपड़ों के दो-दो आने लगावे है। ऐ पैसा किसी को खले है।” बेगम ने बहुत नाँ-नाँ की लेकिन कनीज़ के आगे एक न चली, मगर जब दूसरे दिन उन्होंने कनीज़ के हाथ के धुले हुए कपड़े पहने तो “वाह” कहे बग़ैर न रह सकीं।

और इस सबके बा-वुजूद जब वो आम कामों से फ़ुर्सत पा कर लम्हा भर को आराम की ख़ातिर बैठती तो उसके रोएँ-रोएँ पर मुस्कुराहट की लहर खेलती हुई उठती और उसके दुबले-पतले ज़र्द चेहरे पर फुवार बन कर पड़ने लगती और जब वो इस तवज्जो से अपने ख़ून के सारे खौलाव के बिरते पर मुस्कुराती तो उसका सर चकरा जाता, माथे पर ठंडा पसीना आ जाता… और… एक दिन ऐसा आया कि वो इस कैफ़ियत का बोझ भी न सँभाल सकी और बावर्ची-ख़ाने में बे-होश हो कर धड़ाम से गिर पड़ी।

डाक्टर ने बताया कि इसका ख़ून ख़ुश्क हो रहा है।

 

कई बहारें आईं और गुज़र गईं। मौसमों की तब्दीलियाँ अपनी पूरी शिद्दत से ज़ाहिर होतीं और फिर मर जातीं, लेकिन कनीज़ एक मशीन की तरह अपने कामों से चिमटी रहती। बेगम कई बार उसे देख कर दहल जातीं,

“अरी बच्ची तुझे अपना कुछ होश नहीं, कभी मेरे पास बैठ कर मिनट भर कमर सीधी कर लिया कर। निगोड़ी कुछ खाए-पिएगी नहीं तो फिर रोज़-रोज़ बे-होशी के दौरे पड़ेंगे।”

बेगम हम-दर्दी से लबरेज़ आँखों से उसका तआक़ुब करतीं जो एक ज़िद्दी रूह की तरह यूकेलिप्टस, गूलर, शीशम और जामुन के दरख़्तों में दुबकी हुई नन्ही सी कोठी में बे-ताबी से घूमती फिरती।

बहुत सारे दिन और बहुत सारी रातें तेज़ी से गुज़रती चली गईं। जैसे वक़्त रेल पर बैठ कर चलने लगा हो।

सलमा-बी पिछले दिनों आई थीं तो वो दो बच्चों की माँ थीं और तीसरा पेट में था। साफ़-सुथरी लेकिन निस्बतन नई कोठी की मुंडेरों पर वक़्त के असरात काई की शक्ल में नुमायाँ होने लगे। चिम्मी की दबाई आम की गुठली से फूटा हुआ दरख़्त न होगा तो चिम्मी ही के क़द के बराबर होगा, लेकिन उसके छोटे-छोटे पाँव उस दरख़्त के पास से इतनी तेज़ी से गुज़र जाते कि हवा के एक मसनूई झोंके से वो काँप कर रह जाता, मगर ये तेज़ी, ये लपक-झपक तो कनीज़ की सरिश्त बन चुकी थी।

भरी गर्मियों की एक सुब्ह मियाँ अल्ताफ़ विलायत से वापिस आ गए, दुनिया का इतना बड़ा वाक़िआ, इतनी शदीद ख़ुशी, एक दिन ज़ुहूर-पज़ीर हो गई। मारे मसर्रत के बेगम के दो आँसू पलकों पर आ कर अटक गए। सलमा-बी मारे ख़ुशी के दादी से भी ज़ियादा ज़ोर-ज़ोर से बोल रही थीं और उनके बच्चे अम्माँ की बे-तवज्जोही पर चिम्मी से ज़ियादा गला फाड़-फाड़ कर रो रहे थे।

सलमा-बी के मियाँ अल्ताफ़ से विलायत की तारीफ़ें सुन-सुन कर थकते ही न थे और कनीज़ मिनट-मिनट पर हाथ धो कर बावर्ची-ख़ाने में आती और दरवाज़े में से झाँक कर सारी रौनक़ें देख जाती। अल्ताफ़ से एक-बार आँखें चार कर के वो चकरा कर गिरते-गिरते बची थी।

“हाय कैसे देखें हैं।” कनीज़ छुप कर सोचती और बावर्ची-ख़ाने में जा कर मुँह धोने लगती।

“माई, ज़रा पानी देना।” अल्ताफ़ मियाँ ने आवाज़ लगाई। उनका मुँह विलायत-ख़्वानी करते-करते ख़ुश्क हो चुका था।

“उई बच्चे इस तरह न कहो।” बड़ी बेगम रूठ गईं, “ऐ वो तो ऐसी सुघड़ है, दुखियारी, समझो उसकी वज्ह से महीने का सारा ख़र्च पचास से कम ही कम होता, न चोर न चकार… वैसे ही तुम्हें दो-दो चार-चार सौ नहीं पहुँचता रहा… ऐसी सलीक़े वाली है कि क्या कहूँ।” बस बेगम ने कनीज़ की तारीफ़ों के पुल बाँध दिये।

“ऐसी ही सलीक़ा-मंद है ख़ान बहादुर वसीम की लौंडिया, मैं तो…” और इस पुल पर से बहू का डोला भी गुज़र गया। पर पानी नहीं आया।

“अम्माँ पानी तो…” अल्ताफ़ मियाँ बड़बड़ाए।

“ऐ पानी नहीं आया… उई कनीज़ कानों में तेल डाल लिया बच्ची?” बेगम बड़बड़ाती उठीं।

पानी नहीं आया… कनीज़ अपना मुँह धोने में सारा पानी बहा चुकी थी। वो अपनी बे-सलीक़गी के बारे में ज़र्रा बराबर नहीं सोच रही थी… वो तो दरख़्तों के साए में ख़िज़ाँ-ज़दा ज़र्द पत्तों पर क़दम रखती सोचती जा रही थी… मुए दरख़्त भी बे-फ़ायदा होवें हैं। सुब्ह से कितनी बार पत्ते समेटे, फिर भी सारी कोठी में पत्ते ही पत्ते…

कोठी से निकल कर वो सिविल लाइन्स की सबसे खुली सड़क पर आ गई। बावर्ची-ख़ाने में कैसी ठंडक थी, उसे अपनी हड्डियों में गठिया का दर्द उठता महसूस हो रहा था।

उसका दुपट्टा ग़ुर्राती हुई लू में फड़फड़ा रहा था लेकिन वो चलती गई और आगे और आगे और फिर वो हार कर एक कोठी के फाटक से टिक कर बैठ गई। उसका हल्क़ प्यास से ख़ुश्क हो रहा था। लेकिन कोठी के दरवाज़े के क़रीब ही लगे हुए नल से पानी पीने का उसे ख़याल तक न आया। बस वो बैठी हुई लोहे के फाटक की सलाख़ों पर अपनी उँगलियाँ फेरती रही, उसके चारों तरफ़ लू के मारे ज़र्द पत्ते खड़खड़ाते रहे और लू ग़ुर्राती रही।

कोठी के फाटक से एक नई कार निकली और रुक गई। उस में से एक नई-नई महकती हुई बेगम निकलीं और कनीज़ के पास आ गईं।

“अरे तुम कनीज़ हो ना, सलमा-बी के हाँ काम करती थीं?” नौ उम्र बेगम ने ख़ुश हो कर पूछा, कनीज़ ने कोई जवाब न दिया।

“क्या निकाल दिया उन्होंने?”, बेगम ने आँखें नचाईं।

कनीज़ फिर भी चुप रही। बेगम कार की तरफ़ बढ़ीं। फिर कुछ सोच कर पलटीं। “मेरे हाँ रहो। खाना कपड़ा मेरे ज़िम्मे… माँ की तरह समझूँगी।” बेगम ने कहा और कनीज़ हैरान रह गई।

“माँ! इस जवान बेगम की माँ। ऐ क्या कहवें हैं लोग, एक दम सब के दीदे पट्टम हो गए क्या। अभी तो मेरी अस्ली उम्र तीन और तीस की होवेगी। उस ने एक ज़र्द पता उठा कर पूरी क़ुव्वत से मुट्ठी में चुर-मुर कर दिया। पाँच साल के अर्से में वो बूढ़ी हो चुकी है, इस बात का उसे यक़ीन ही नहीं आ रहा था… उसकी आँखों से चंद आँसू टपक कर चेहरे की महीन-महीन चुन्नटों में फैल गए और खिचड़ी बालों की एक लट माथे पर लोटती रही, मिनट भर में उसने सूखे पत्तों को मसल-मसल कर अपने सामने ढेर कर लिया।

*****

 

हाजिरा मसरूर (1930-2012) उर्दू की मशहूर लेखक थीं. उनकी कहानियाँ समाज में औरतों के साथ किये गए ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी को भरपूर अंदाज़ में दिखाने में कामयाब हैं. उन्होंने हाशिये पर धकेली गई, ग़रीब और दबे कुचले गए तबक़ों से तअल्लुक़ रखने वाले लोगों, ख़ास कर औरतों को अपनी कहानियों का विषय बनाया.

ये कहानी बहुत बेरेहमी से एक अकेली होती जा रही औरत की दास्ताँ बयान करती है.ये अकेला पन उस पर चारों तरफ़ से उतरा है और जो उसके अपने थे, जो उसे इस दलदल में धंसने से बचा सकते थे, उसकी रूह पर पड़ने वाले ज़ख़्मों को नज़रअंदाज़ करते रहे. औरत की ज़रूरतों और ख़्वाहिशों की अनदेखी करने वाले समाज को नंगा करती हुई ये कहानी हाजिरा मसरूर के ख़ास अंदाज़ में और भयानक, और दर्दनाक हो जाती है. वो लिखते वक़्त जितनी बेबाक और खरी नज़र आती हैं, वैसा अंदाज़ उनके अलावा उर्दू की दूसरी किसी महिला लेखक को शायद ही मिला हो. बनावट से दूर इस कहानी को एक सच्चे दुःख से बुना गया है और ये हमारी ख़ुदग़र्ज़ियों को भी आईना दिखाने में कामयाब है.

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