सूरज की अधखुली आँख में अभी आक्रोश नहीं था। वो सीधे उसी की तरफ़ देख रहे थे। यहाँ से जो भी पूरब की तरफ़ देखता, उसे सिर्फ़ सूरज ही दिखाई देता। दूर तक कोई टीला था और न ही कोई दरख़्त जो उनकी निगाहों के बीच में आता। सूरज के एक दम बीच से निकलने वाला वो धब्बा पल-पल रूप बदल रहा था। वो कोई विशाल केकड़ा, भैंसा, गेंडा या उससे मिलता-जुलता कोई चार पाँव वाला जानवर लग रहा था। कभी लगता वो उधर ही दाएँ बाएँ हो रहा है तो कभी यूँ महसूस होता जैसे सूरज से लम्हा लम्हा दूर हो रहा है और उन्हीं की तरफ़ बढ़ रहा है। धुँधले रूप-रंग धीरे-धीरे साफ़ होना शुरू हो गए। वो जंगली जानवर समझ कर जिसका सामना करने के लिए दिल ही दिल में कोई योजना बना रहे थे, दरअस्ल वो चार लोग थे जो चारपाई उठाए, लड़खड़ाते हुए उनके क़रीब आते जा रहे थे।
उन्होंने चारपाई यूँ एहतियात से रख दी जैसे डर रहे हों कि कहीं चारपाई पर सोए हुए शख़्स की आँख न खुल जाए। उनके लिबासों पर ख़ून के धब्बे और छींटे बहुत नुमायाँ थे। जूते गाढ़े ख़ून में लतपथ थे और टख़नों के गिर्द भी ख़ून जमा हुआ था। पहली नज़र में यही मालूम होता था कि वो किसी ख़ून की नदी से गुज़र कर आए थे, क्योंकि टख़नों से ऊपर ख़ून के इक्का-दुक्का छींटे तो ज़रूर मौजूद थे लेकिन ज़ख़्म का कोई निशान नहीं था। इसका मतलब यही था कि ज़ख़्मी होने के बावजूद ख़ून उनके जिस्मों से रिसता हुआ उनके पाँव तक नहीं आया था।
उनकी कोई हाथ भर लंबी दाढ़ियाँ थीं जो यक़ीनन उन्होंने अपनी मर्ज़ी से नहीं रखीं, बल्कि अर्से से उन्हें बनाने का मौक़ा ही नहीं मिला। धूल और ख़ून से अटे हुए चेहरों को देखकर रंगत का ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं हो रहा था। हैरत और ख़ौफ़ से फैली आँखें इस बात की चुग़ली खा रही थीं कि लंबे और कठिन सफ़र की वजह से वो अपने हवास में नहीं रहे थे। वो चारपाई ज़मीन पर रखते ही ढेर हो गए। पूछने पर बताया गया कि इसकी आख़िरी रस्में पूरी करने के लिए वो घरों से निकले हुए हैं। मरने वाले की उम्र अठारह से बीस के बीच रही होगी। भूरे हल्के बालों से भरे चेहरे पर इक्का-दुक्का काले बाल भी थे। सफ़ेद रंगत वाला ये ख़ूबसूरत जवान यूँ लग रहा था, जैसे अभी-अभी सोया हो। हैरान-कुन तौर पर इस नौजवान के जिस्म पर ख़ून का एक छींटा तक नहीं था, बल्कि चारपाई के चारों पायों के पर भी ख़ून जमा हुआ था। उन्होंने उन चारों को पानी पिलाया और बचा हुआ खाना भी उन्हें दे दिया।
सुस्ता लेने के बाद एक बार फिर उन्होंने इस नीयत से लड़खड़ा कर उठने की कोशिश की कि मय्यत को उठा सकें। उन्होंने सोचा कि क्यों न इनकी मदद की जाए और पूछें कि ये लाश किसकी है और उन्हें कहाँ जाना है? राह भटके हुओं के लिए इससे अच्छा काम कोई नहीं था। उन पर तरस खाकर उन्होंने मय्यत उठा ली। अब वो चारों साथ-साथ चल रहे थे। उनकी कोशिश यही थी कि ज़ख़्मियों को मय्यत न उठाने दी जाए। शाम होने से पहले ज़ख़्मियों की तबियत भी सँभलने लगी थी। वो कई बार सुस्ताने को रुके लेकिन फिर भी मद्धम चाल चलते रहे। उन्हें जानने की बहुत उत्सुकता थी कि वो कहाँ से आए हैं और मय्यत कहाँ लेकर जानी है? लेकिन फिर इस ख़याल से कि ये साथ ही तो हैं ख़ुद ही बता देंगे। वो ख़ामोशी से चलते रहे। दिन ढले उन्होंने अगले ठिकाने पर पड़ाव किया।
सोने से पहले उन्होंने उन चारों से उस मय्यत के बारे में पूछताछ की। “हम साथ ही हैं। सुबह होते ही सारी कहानी, शुरू से आख़िर तक आप को सुना देंगे।” दिन चढ़े जब आँख खुली तो उनकी हैरत की कोई सीमा न रही। वो रात सोए तो बीस थे मगर जब वो उठे तो दोगुने हो चुके थे। पहले चारों का कहीं निशान तक न था। वो सब चारपाई के आस-पास हैरान से खड़े थे। इस बात पर तू-तकार हो रही थी कि हम पहले से यहाँ थे। कुछ कह रहे थे कि नहीं तुम लोग बाद में आए हो। काफ़ी देर वो बहस करते रहे। दोनों ओर से कोई ये मानने को तैयार नहीं था कि वो बाद में आया है। “ये जनाज़ा भी तुम ही लोगों का है और कज बहसियत से तुम इससे पीछा छुड़ाना चाहते हो।” आख़िरकार वो लोग जो जनाज़े के साथ आए थे, दूसरों को इस बात पर क़ायल करने में कामयाब हो गए कि मरे हुए शख़्स से उनका कोई संबंध नहीं है और वो तो सिर्फ़ उन चार लाचार ज़ख़्मियों की मदद करने के लिए यहाँ तक आ गए थे जो सुबह मय्यत उठाए उन तक पहुँचे थे। अभी हमने उनसे पूछना था कि मय्यत को कहाँ पहुँचाना है, वो हमें सोता छोड़ कर ग़ायब हो गए।
वो पहले आने के संबंध में तो एक-दूसरे को संतुष्ट न कर सके हाँ जो मुसीबत उनके गले पड़ गई थी, उसके बारे में कोई फ़ैसला करना ज़रूरी था। फ़ैसला यही हुआ कि आख़िरी रस्मों का कोई इंतिज़ाम किया जाए। दूर तक कोई आबादी भी नहीं थी। आख़िर वो इसे कहाँ ले के जाएँ। जनाज़ा उठाने वाले और साथ चलने वाले यही सोचते जा रहे थे। क़दमों के लिहाज़ से वो जनाज़े को काँधा देते। यूँ वो तमाम क़दम गिन-गिन कर रख रहे थे। पहले चार की बारी ख़त्म होती तो अगले चार उठा लेते। “धूप आज कुछ ज़ियादा तेज़ नहीं है, कल तो बहुत बारिश हुई थी।” “कहाँ हुई थी बारिश, मैं पहले रोज़ से तुम्हारे साथ हूँ, मुझे नहीं पता?” “ये उस वक़्त से ऊट-पटाँग बातें करता चला आ रहा है जब से हमारे साथ निकला है। मैंने पहले दिन ही कहा था कि इस मनहूस को साथ मत लो। जब से ये हम में शामिल हुआ है हमारा सामना लगातार नाकामियों से हो रहा है। रही सही कसर इस चारपाई वाले ने निकाल दी है। ख़ुद तो देखो कितने मज़े से पड़ा है और हम हैं कि जहन्नुम में चल रहे हैं।”
“वो देखो दूर मकान नज़र आ रहे हैं। वहाँ मुर्दों को ठिकाने लगाने का सामान ज़रूर होगा।” आबादी देखकर उनके क़दम तेज़ी से उठने लगे। अब चार ताज़ा दम नौजवानों ने मय्यत को उठा लिया। “हम अंदाज़ा लगाने में ग़लती कर रहे हैं। आबादी इतनी नज़दीक भी नहीं है।” ये सुनते ही उनकी एड़ियाँ ज़मीन पर टिकने लगीं। अब वो मद्धम चाल चलते हुए मकानों के क़रीब जा रहे थे। “कहीं कोई रो रहा है।” “एक नहीं कई आवाज़ें हैं।” “ये तो उन्हीं मकानों से आ रही हैं।”
रोने की आवाज़ें क़रीब हो रही थीं। यूँ लग रहा था जैसे बहुत से लोग रो रहे हों। जूँही वो आबादी की हद में दाख़िल हुए लोग धहाड़ें मारते हुए उनकी तरफ़ भागने लगे। उनके पाँव मिट्टी ने पकड़ लिए। चारपाई नीचे रखते ही लोग उनके क़रीब आ पहुँचे। ग़म से निढाल लोगों ने उन सब को परे धकेला और मय्यत के पास रोना शुरू कर दिया। “मेरा ख़याल है ये इन्हीं का कोई रिश्तेदार था।” “हाँ चलो हमारी जान छूटी।” वो पीछे खड़े होकर तमाशा देखने लगे। “मरने वाला इनमें से किसका रिश्तेदार है? हर कोई दूसरे से बढ़ कर रोने की कोशिश कर रहा है।” थोड़ी देर बाद सब चुप हो गए। उनकी औरतें रोती हुई वापस चली गईं।
काफ़ी देर वो चुपचाप मय्यत के पास बैठे रहे, जैसे फ़ैसला न कर पा रहे हों कि करना क्या है। जिन लोगों ने चारपाई वहाँ तक पहुँचाई थी, उनकी हैसियत दोयम दर्जे की हो गई थी। वो आबादी वालों को उत्सुकता से देख रहे थे। “पता नहीं अब इनका क्या इरादा है? ” “बस देखते जाओ।” “शाम फिर ढलती जा रही है और हमने पिछले दिन से कुछ नहीं खाया।” “इन्हीं से बात कर के देखते हैं।” उन्होंने गाँव वालों को अपनी मुश्किल से आगाह किया। एक आदमी उठा और आबादी में गुम हो गया। हालाँकि सूरज डूब चुका था लेकिन आँखों पर ज़ोर देकर थोड़ी दूर तक देखा जा सकता था। आबादी की तरफ़ से पहले आवाज़ें और फिर साए इंसानों में बदलते हुए उनके क़रीब आ पहुँचे। उनमें से एक तो वही था जो उनके पास से उठकर गया था। बाक़ी दस से बारह साल की उम्र के चार बच्चे थे जिन्होंने खाने-पीने का सामान उठाया हुआ था। खाना सिर्फ़ उन्हीं के लिए था जो मय्यत को वहाँ तक लाए थे। आबादी वाले उनके खाना ख़त्म करने का इंतिज़ार करते रहे। जूँही उन्होंने खाना ख़त्म किया सब उठ खड़े हुए। चार लोगों ने मय्यत उठा ली और चल पड़े। बाक़ी दाएँ, बाएँ और पीछे चल रहे थे। उस रात जनाज़ा आबादी वालों ने उठाया। “आप हमारे मेहमान हैं, आप बस हमारे साथ चलते रहिए। आप पहले ही बहुत तकलीफ़ उठा चुके।” आबादी के किसी शख़्स की आवाज़ मय्यत उठते वक़्त ही उन्होंने सुनी थी। रात का पिछला पहर हो चला था। खाना खाने वाले ऊँघ रहे थे। “ये हमें कहाँ लिए जा रहे हैं?” “मैं भी यही समझा था कि कहीं क़रीब ही मुर्दे को ठिकाने लगाने का इंतिज़ाम करने जा रहे हैं।” “सारा दिन हम बग़ैर रुके चलते रहे हैं, अब हमारे लिए चलना दूभर हो रहा है। अगर आप मय्यत रखें तो हम थोड़ा सुस्ता लें।”
पिछले रोज़ की तरह उनके जागने से पहले, आज भी काफ़ी लोग वहाँ बैठे हुए थे। ये वो लोग थे जो आबादी से शामिल नहीं हुए थे। कहीं ऐसा न हो कि पहली रात वाला हंगामा खड़ा हो जाए। ये डर दिमाग़ों में जन्म लेने से पहले ही हवा हो गए। “हम इस जनाज़े में शामिल होने के लिए निकले हुए हैं। हमने इलाक़े का कोना-कोना छान मारा था। वो तो भला हो उन चार आधे पागलों का जो हमें पिछले रोज़ मिले। वो ज़ख़्मों से निढाल गिरते-पड़ते जा रहे थे जैसे उन्हें किसी ने जानवरों की तरह पीटा हो। हमने उनकी हालत देखकर उन्हें ज़ियादा देर नहीं रोका।”
“चंद लोग एक मय्यत लेकर इस सम्त को गए हैं। वो शायद बहुत जल्दी में थे। हमने उन्हें रोक कर ये पूछने की कोशिश भी की कि मय्यत किसकी है लेकिन उन्होंने हमारी बात का जवाब देना पसंद नहीं किया। सो हमें ये पता नहीं है कि इसे कहाँ लेकर जा रहे हैं। अगर आप ज़रा जल्दी चलेंगे तो अगले दिन उन्हें पकड़ लेंगे। हम चारों अर्सा हुआ अपने घरों से निकले हुए हैं। हमें जल्दी अपने ठिकानों तक पहुँचना है वरना हम भी इन मय्यत वालों को ढूँढने आपके साथ चलते। हमारी हालत आपके सामने है, क्या ख़बर हम अपने घरों को ज़िंदा सलामत पहुँच भी पाते हैं या नहीं। अगर हमें जल्दी न होती तो हम आपको बताते कि हमारी ये हालत कैसे हुई।”
“वो चारों हमें ये रास्ता बता कर चल दिए। उनकी बताई हुई सम्त में चलते हुए हम यहाँ आ पहुँचे हैं। हमें ख़ुशी है कि उनके बताने के बाद हमें आपको ज़ियादा तलाश नहीं करना पड़ा। अगर आप लोग सो न जाते तो यक़ीनन बहुत आगे निकल जाते। अभी थोड़ी ही देर पहले हम यहाँ पहुँचे हैं।”
“उनके चेहरों पर दाढ़ियाँ थीं और पैरों पर ख़ून भी जमा हुआ था?” “ये चारों फिर वही हैं जो पिछली रात हमें मय्यत के पास छोड़ कर भाग गए।” “लो आ गया अब हमारी बात का यक़ीन?” “लेकिन सवाल ये है कि उन्होंने उनसे झूठ क्यों बोला?” “वजह सीधी है कि अगर वो सच बोलते कि वो मय्यत हम ही वहाँ छोड़ कर आए हैं तो ये लोग उन्हें वापस साथ लाने की कोशिश करते।” “जो भी है वो मुसीबत हमारे गले में डाल कर रफ़ू-चक्कर हो गए।” “अब इस सवाल का जवाब हमें कभी नहीं मिलेगा कि मय्यत कहाँ से आई?” “ये जो अभी ढूँढते हुए यहाँ तक आए हैं। ये कौन हैं?” “फ़िलहाल चुप रहो, बस तमाशा देखो।”
आने वालों के शामिल होने से तादाद फिर से दोगुनी हो चली थी। थोड़ी देर वहाँ रुकने के बाद नए आने वालों ने चारपाई उठाई। एक बार फिर वो तेज़ी से चल पड़े। जिसका जब जी चाहता वो मय्यत को काँधा दे देता। धीरे-धीरे वो एक दूसरे से परिचित हो रहे थे। बातें करते आगे बढ़ रहे थे। “मैंने सुना है बादशाह का बड़ा बेटा बादशाह को क़त्ल करके ख़ुद तख़्त पर बैठ गया है।” “नहीं नहीं, वो क़त्ल नहीं हुआ उसे क़ैद कर लिया गया है।” “सलाम है तुम दोनों की अक़्ल पर, उसने बुढ़ापे की वजह से ख़ुद तख़्त छोड़ दिया है।” “मेरे भाई वज़ीर-ए-आज़म ने बादशाह के बेटे से गठजोड़ कर लिया है। वज़ीर की बेटी जो शहज़ादे की पसंदीदा है।”
“यार क्या बताऊँ तुम्हें, वो मेरी बात मानती ही नहीं। उसे कई बार मैंने समझाया कि अच्छा वक़्त आ जाएगा, हालात बदल जाएँगे लेकिन वो ये कहकर काटने को दौड़ती है कि तुम कई सालों से मुझे झूठी तसल्लियाँ दे रहे हो। अरे! उसे मैंने सब बताया था कि मेरे साथ रहकर तुम्हारा गुज़ारा नहीं होगा। लेकिन तब उस पर इश्क़ का भूत सवार था। अब मैंने फ़ैसला किया है कि कभी घर वापस नहीं जाऊँगा।”
“वही न, चार गलियाँ छोड़ कर जो कोने पे है। हाँ-हाँ, वही दरवाज़े पर नीम का दरख़्त है।” “ज़िंदगी में पहली बार घर से निकला हूँ, मज़ा आ रहा है।” “धीरे बोलो अगर मय्यत के परिवार में से किसी ने सुन लिया तो हंगामा हो जाएगा।” “वैसे आपने बताया नहीं कि मरने वाले के परिवार वाले कौन हैं”। “क्या बेवक़ूफ़ों की तरह बातें कर रहे हो चुपचाप चलते रहो। इतने अर्से से हम जनाज़े के साथ हैं। अब अगर मैं पूछूँ कि भाई मरने वाला किस का कुछ लगता है तो सब किए कराए पर पानी फिर जाएगा।” “लगता तो ऐसे ही है जैसे कोई झुंड है।” “और दरख़्तों के ऊपर से पहाड़ भी दिखाई दे रहे हैं।” “हाँ यार मुझसे तो दो क़दम नहीं चला जा रहा।” सूरज उनके सरों के एक दम ऊपर था। धूप की तपिश से सिर्फ़ वही महफ़ूज़ रहते जिनके सरों पर मय्यत का साया होता। अपने साए अपने क़दमों तले मसलते वो वहाँ आ पहुँचे।
घने और फलों से लदे दरख़्तों की छाँव में लेटे हुए उन्हें काफ़ी वक़्त हो गया था। उनमें से कोई उठने का नाम नहीं ले रहा था। वो जगह एक बहती हुई नदी के किनारे थी जिसका स्रोत यक़ीनन वो पहाड़ थे जो उन्हें थोड़ी देर पहले दरख़्तों के ऊपर से दिखाई दे रहे थे। लेटने से पहले वो देर तक नहाते रहे थे। सारी थकान नदी में बहा कर ही वो बाहर निकले थे। घंटियों की आवाज़, घोड़ों की हिनहिनाहट, हवा में तैरते हुए क़हक़हों और बे-हँगाम शोर-शराबे ने उनके आराम में ख़लल डाल दिया। आवाज़ नदी के पार से नहीं बल्कि झुंड के पीछे से आ रही थी, जहाँ से वो गुज़र आए थे। उनमें से कुछ तो उठ कर बैठ गए, बाक़ी अभी लेटे हुए थे कि नदी की तरफ़ पानी भरने की ग़रज़ से आने वाले उनके सिरहाने आन खड़े हुए। कुछ बच्चे और औरतें हैरानी से मय्यत को तो कभी उसके गिर्द बिखरे हुए लोगों को घूर रही थीं। उनके आत्मविश्वास को देख कर लगता था कि ये इलाक़ा उनका देखा भाला है और कहीं आते-जाते वो यहाँ पड़ाव ज़रूर करते हैं। थोड़ी देर वो नागवारी से उन्हें देखते रहे और फिर नदी से पानी भर कर लौट गए। उनके जाते ही वो सब उठ गए। इतने में बंजारे भी शोक जताने के लिए आने वालों की तरह चुपचाप वहीं आ बैठे।
“तुम सब उस वक़्त तक यहीं रुकोगे जब तक हम मुर्दे को ठिकाने न लगा आएँ। अगर हम इसकी आख़िरी रस्मों में शामिल न हुए तो ये रूह हमारे पुर्खों की रूहों से हमारी शिकायत करेगी कि हमने इसके ज़रिए उन तक अपना कोई पैग़ाम नहीं पहुँचाया।”
चार आदमी बढ़कर जब मय्यत उठाने लगे तो बंजारों ने उन्हें रोक दिया। “अब इसे हम उठाएँगे।” उन्होंने जनाज़ा उठाया और चल पड़े। “यक़ीनन उन्हें पता है कि मुर्दे की आख़िरी रस्में कहाँ अदा की जाती हैं।” “हाँ इसी लिए तो ये आगे आगे चल रहे हैं।” काफ़ी देर तक वो बहाव के विपरीत दिशा में चलते रहे। कोस भर चलने के बाद उन्होंने लकड़ी के पुल के ज़रिए नदी पार की। अब वो बहाव के साथ उसी तरफ़ चल रहे थे जिसकी विपरीत दिशा में थोड़ी देर पहले वो सुस्ता रहे थे। जब वो उस जगह के एक दम सामने पहुँचे, बंजारों के रिश्तेदारों ने उन्हें हाथ हिला-हिला कर बाक़ायदा विदा किया। “अब यहाँ पड़े-पड़े सड़ते रहो। हम तो कभी नहीं पलटेंगे।” “हाँ उस ज़िंदगी में कितनी एकरूपता थी। वो तो भला हो जनाज़े वालों का जिनके बहाने हमारी जान छूट गई।” “ठीक कहते हो, अब तक तो पुर्खों की रूहें भी गल सड़ गई होंगी। ये जिसे हम काँधों पे उठाए फिर रहे हैं इसकी रूह भी पता नहीं किस हाल में होगी।” उन्होंने पलट कर देखा। अब नदी और नदी किनारे के दरख़्तों के रास्ते में और बड़े-बड़े दरख़्त आ चुके थे। वो एक दूसरे से यूँ बातें करते चले जा रहे थे जैसे कब के बिछड़े हुए हों। “पिछले दिनों के मुक़ाबले में अब गर्मी कुछ कम हो गई है।” “इसकी वजह ये है कि अब हम मैदानी इलाक़े को पीछे छोड़ आए हैं।” “भला हो मरने वाले का, वरना हम ज़िंदगी में कभी इस तरफ़ न आते।” “कुछ साल पहले जब हमने यहाँ पड़ाव किया था, ज़मीन सूखी हुई थी। लगता है इस साल ख़ूब बारिशें हुई हैं।” “शाम होने को है, हम जंगल में दाख़िल होने से पहले इधर ही रुकेंगे क्योंकि जंगल घना और फ़ासला भी ज़ियादा है। रात में अगर हम चलते रहे तो खो जाएँगे। दरख़्त फलदार हैं हमें कोई दिक़्क़त भी नहीं होगी।” बंजारों में से किसी की आवाज़ गूँजी।
जिनकी आँख मुँह अँधेरे खुल गई थी, उन्हें बाक़ियों के जागने का काफ़ी देर इंतिज़ार करना पड़ा। “शुक्र है आज सोते में कोई हमारे साथ शामिल नहीं हुआ।” “रात बहुत अजीब बात हुई। मैं चारपाई के पास ही लेटा था कि अचानक मेरे चेहरे पर कोई चीज़ आ गिरी। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। हवा के किसी झोंके ने मुर्दे के चेहरे से कपड़ा नोच लिया था जो मेरे चेहरे पर आ गिरा था। मैंने जब कपड़े से दोबारा उसको ढाँपा तो मुझे यूँ लगा कि वो मरा हुआ नहीं बल्कि ज़िंदा है। मेरा ऊपर का साँस ऊपर और नीचे का नीचे ही रह गया।” “ये तुम्हारा वहम है।” “हाँ ये मेरा वहम ही है वरना कोई खाए पिए बग़ैर इतने दिन कैसे दम साधे लेट सकता है?” “मेरा ख़याल है हमें अगली रात इसी जंगल में हो जाएगी।” “मुझे तो यूँ लगता है जैसे रात हो चुकी है। सूरज उस वक़्त से दिखाई नहीं दिया जब से हम इस जंगल में दाख़िल हुए हैं।” “दिखाई कैसे देता? वो तो जंगल की उस सम्त से निकला था, जिधर को हम जा रहे हैं।” “जब हम जंगल में दाख़िल हुए थे तो मय्यत किन लोगों ने उठाई हुई थी?” इस बात का जवाब कहीं से नहीं आया। बस वो चलते रहे। अंदर से ख़ौफ़ज़दा भी थे कि कहीं ऐसा न हो कि जंगल में चलते हुए ही उनकी ज़िंदगी ख़त्म हो जाए। भूख और प्यास से वो बेहाल होना शुरू हो गए थे। “चलते रहो कहीं ऐसा न हो कि हम सुस्ताने को रुकें और इसी हालत में मारे जाएँ। अगर हम मर गए तो इस मय्यत का क्या होगा।” वो दरख़्तों के तनों से बचते-बचाते जा रहे थे। वो जो ख़ुद भाग-भाग कर पहले मय्यत को काँधा दे रहे थे, अब उनकी कोशिश थी कि उनकी बारी न ही आए। धीरे-धीरे वो जंगल के किनारे की तरफ़ बढ़ रहे थे। दरख़्त अब कम होना शुरू हो गए थे। घना जंगल पीछे रह गया था। वो दरख़्तों के बीच ही चल रहे थे लेकिन अब दरख़्तों का फ़ासला बढ़ना शुरू हो गया था। सूरज एक दम सरों के ऊपर होने की वजह से ये अंदाज़ा नहीं हो रहा था कि वो किस सम्त से निकला है। “हम ख़्वाह-मख़्वाह डर रहे थे, जंगल का रक़बा इतना भी ज़ियादा नहीं था। अभी थोड़ी ही देर पहले तो हम दाख़िल हुए थे और अब बाहर भी आ गए।”
जंगल से निकलते ही उन्होंने थोड़ी देर सुस्ताने का फ़ैसला किया। “वो दूर किसी शहर के आसार दिखाई दे रहे हैं।” उन सबने इस बात पर हामी भरी। वो उठने के बारे में सोच ही रहे थे कि उन्हें शहर की तरफ़ से धूल सी उड़ती दिखाई दी। “शायद बहुत तेज़ आँधी आने वाली है।” उड़ती धूल उन्हीं की तरफ़ बढ़ रही थी। धूल में से पहले घोड़ों की थूथनियाँ बरामद हुईं और फिर घुड़सवार, जो अब पल-पल धूल से आगे बढ़ते चले आ रहे थे। उन्होंने उनके पास आकर मुश्किल से घोड़ों को रोका। घुड़सवार पचास के क़रीब थे। “आपके आने की ख़बर कल शाम ही हो गई थी। हम लगातार आप की तलाश में थे। पूरा शहर आपका इंतिज़ार कर रहा है। आप खाना खाएँ फिर आगे बढ़ते हैं।” ये कहकर उन्होंने घोड़ों पर लदा हुआ राशन उतारना शुरू कर दिया। उन्होंने हैरानी से घुड़सवार की बात सुनी। खाने के बर्तनों से उठती हुई अलग-अलग क़िस्म की ख़ुशबुओं ने उन पर जादू कर दिया। यही वजह थी कि उन्हें उसकी बात पे ग़ौर करने का मौक़ा नहीं मिला कि उनके आने की ख़बर शहर वालों को कैसे हुई?
वो सब घुड़सवारों के साथ में शहर की तरफ़ जा रहे थे। वो शानदार शहर पश्चिम की ओर था। “मेरे ख़याल के मुताबिक़ ये शहर पूरब की तरफ़ होना चाहिए था।” “हाँ हाँ! तुम ठीक कहते हो। जब हम जंगल में दाख़िल हुए थे तो हमारे चेहरे पूरब की ओर थे। इसका मतलब ये हुआ कि हम नाक की सीध में आगे नहीं बढ़े। तो क्या हम अँधेरे में चलते हुए एक बार फिर वहीं आ पहुँचे हैं?” “छोड़ो यार हमें पहले कौन सा समझ आ रहा है कि हम क्या कर रहे हैं। जितना हम ग़ौर करेंगे उलझ जाएँगे। बस चलते रहो।” जूँ-जूँ वो शहर के क़रीब हो रहे थे दोपहर को चमकता हुआ सूरज भी इमारतों को छू रहा था। शहर के क़रीब पहुँचने पर आसमान से बातें करती चंद इमारतों के साए आगे बढ़कर उनके पाँव चूमने को आ पहुँचे। थोड़ी ही देर में शहर की सारी इमारतों के सायों ने उन्हें अपनी आग़ोश में ले लिया। शाम के साए और ज़ियादा गहरे होते हुए अँधेरे में बदल चुके थे। शहर के लोग उनके इंतिज़ार में थे। उन्होंने बढ़कर मय्यत उठा ली। टेढ़े मेढ़े, बाज़-औक़ात तंग होते तो कभी खुले बाज़ार की सी सूरत इख़्तियार करते रास्ते पर वो शहर वालों के पीछे चल रहे थे। “मेरा ख़याल है यही जनाज़े का आख़िरी पड़ाव है।” “हाँ! लगता तो ऐसा ही है जैसे वो हमें खाना देने आए, जिस तरह वो हमारी तलाश में थे, जैसे अभी उन्होंने हमारा इस्तक़बाल किया।” “शहर की इमारतें कुछ ज़ियादा ही ऊँची नहीं हैं?” “यूँ लगता है, जैसे आसमान से उतरी हों।” “समझ नहीं आता वो सितारे हैं या इमारतों की खिड़कियों में रौशनी टिमटिमा रही है?” “ये हमारे पीछे कैसा शोर है?”
जनाज़ा ले जाने वालों के पीछे पूरा शहर हाथों में मशअलें लिए उमड़ आया था। रास्ते के बाएँ ओर औरतें और दाएँ तरफ़ मर्द अपने हाथों में मशअलें उठाए क़तारें बना कर चल रहे थे। वो जिस इमारत के पास से गुज़रते उसके बासी क़तारों के पीछे हो लेते। चलते-चलते वो शहर को पीछे छोड़ आए। उन्होंने मय्यत एक खुली जगह पे रखी। नौजवान के चेहरे का नक़ाब उलट दिया गया। मय्यत यहाँ तक लाने वाले तमाशाई बने खड़े थे। माहौल में घुटन थी लेकिन कभी कभार कोई झोंका राह भूलकर इस तरफ़ आ निकलता जिसके नतीजे में ख़ामोश मशअलों को झुरझुरी आ जाती। मर्द और औरत बराबर लेकिन दो अलग क़तारों में खड़े थे। हर कोई अपनी बारी आने पर मरने वाले का माथा चूमता और मद्धम आवाज़ में सिसकता हुआ पहले खड़े हुओं में शामिल हो जाता। रात ढलने के क़रीब थी जब ये प्रक्रिया पूरी हुई। फिर सफ़ेद चोग़े पहने चार बुज़ुर्ग मय्यत के क़रीब आए। उनके पीछे आने वाले नौजवानों ने पानी से भरे हुए बर्तन, वहाँ रखे। चार नौजवानों ने मिल कर मय्यत के चारो ओर सफ़ेद कपड़े का एक घेरा सा बना दिया। ये देख कर शहर के सभी लोग मय्यत की तरफ़ पीठ फेर कर खड़े हो गए। उनकी पैरवी करते हुए पहले से चारपाई उठाकर आने वालों ने भी अपने मुँह फेर लिए। “यही इस मुर्दे का आख़िरी ठिकाना था।” “हाँ ऐसा ही है।” मय्यत उठाकर आने वाला हर शख़्स यही सोच रहा था। ग़ुस्ल के बाद शहर वालों ने मय्यत को उठाया और वापस पलटने की बजाए, शहर से विपरीत दिशा में आगे बढ़ना शुरू हो गए। उनकी औरतें मशअलें लिए शहर को वापस चली गईं। “इसका मतलब ये है कि उन्होंने इसे दफ़्न करने के लिए ग़ुस्ल नहीं दिया।” “लग तो यही रहा है।” “पता नहीं कब तक हम यूँही चलते रहेंगे।” किसी तरफ़ से कोई जवाब न आया।
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हर रोज़ लोग जनाज़े में शामिल हो रहे थे। कोई हाँफता-काँपता आता और कहता कि हमें तो फ़लाँ गाँव वालों ने बताया कि जनाज़ा इस सम्त को गया है। कोई कहता कि नदी किनारे बंजारन औरतें और बच्चे थे, उन्होंने हमें रास्ता दिखाया तो हम यहाँ तक पहुँचे। “ज़ख़्मों से चूर हमें एक दीवाना मिला था जो अब तक हो सकता है, मर-खप गया हो। उसका कहना ये था कि जनाज़ा उठा के हम चार चले थे। अपनी ख़राब हालत की वजह से हम जनाज़े वालों का दूर तक साथ न दे सके और वापस पलट आए। वापसी के सफ़र में मेरे तीन साथी मर गए। मैं अकेला ही बचा हूँ।” “हमें कहीं से कोई ख़बर नहीं मिल रही थी, इसलिए हमारे पास उस पागल की बात पर यक़ीन करने के सिवा कोई चारा न था। हमें जनाज़े में शिरकत की जल्दी थी वरना उस मरते हुए आदमी के लिए मरहम का सामान ज़रूर करते। वैसे भी उसकी हालत इतनी ख़राब थी कि कोई दवा भी उसके लिए कारगर न होती।” “एक ऐसे शहर से हमें जनाज़े की ख़बर मिली जहाँ की औरतें सारी रात मशअलें लिए अपने मर्दों का इंतिज़ार करती हैं, जो जनाज़े की आख़िरी रस्में अदा करके अभी तक वापस नहीं पलटे थे। उनका कहना था कि वो दिन शहर में और रातें मशअलों की रौशनी में शहर से बाहर बसर करती हैं।”
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“पिछले चंद दिनों से लड़ाई में तेज़ी आ गई थी। उस दिन दोनों फ़ौजें फ़ैसला-कुन लड़ाई लड़ने जा रही थीं। फ़ौजें तैनात हो चुकी थीं। नारों के बाद का दोनों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ था। किसी भी लम्हे ललकार हो सकती थी। दूर से आने वाली आवाज़ों और शोर ने फ़ौजियों का ध्यान अपनी तरफ़ ख़ींचा लिया। यूँ लग रहा था जैसे कोई तीसरी फ़ौज उनकी तरफ़ बढ़ रही हो। आवाज़ें उस सम्त से आ रही थीं, जिधर जंगल और पहाड़ मिलते थे। दोनों फ़ौजें घबरा कर एक दूसरे की तरफ़ देख रही थीं। उनके पास फ़ैसला करने के लिए वक़्त बहुत कम था। एक और बड़ी ताक़त पल-पल उनके क़रीब हो रही थी। दोनों फ़ौजों के सिपाह-सालार अपनी-अपनी कमान से निकल कर पलक झपकते ही जंग के मैदान के एक दम बीच में पहुँच कर दोबारा अपनी अपनी जगह पर आ खड़े हुए थे। तीसरी ताक़त से मिल कर निपटने का फ़ैसला हो चुका था। तीरों और तलवारों से लैस फ़ौजी हमला करने को तैयार थे जब निहत्थे लोगों की भीड़ दरख़्तों के बीच से बाहर निकलना शुरू हुई। तादाद गिनती में नहीं आ रही थी। सारे फ़ौजी उनकी तरफ़ और कभी अपने अपने सिपाह-सालारों की तरफ़ हक्के-बक्के देख रहे थे। उन्होंने काँधे पर एक चारपाई उठा रखी थी। उनके मुताबिक़ वो उसकी आख़िरी रस्में अदा करने को जा रहे थे। उन्होंने थोड़ी देर मरे हुए और ज़ख़्मी फ़ौजियों के बीच में पड़ाव किया। कुछ खाया पिया और आगे चल दिए।”
“हैरान करने वाली बात ये हुई कि हमारी और दुश्मन की फ़ौज के सभी सिपाही भी उनके साथ ये कहकर हो लिए: ‘ये जनाज़ा शायद किसी बहुत पहुँची हुई हस्ती का है। इसकी आख़िरी रस्मों के बाद ही बाक़ी लड़ाई होगी।’ ये कहकर वो तो चल दिए और हम औरतें और बच्चे इन मर्दों और ज़ख़्मियों की उस वक़्त तक रखवाली करेंगे जब तक वो वापस नहीं आ जाते।” आने वालों ने जनाज़े में शामिल होकर ये बताया कि उस औरत की निशानदेही पर हम यहाँ पहुँचे जो मैदाने जंग में रह जाने वालों में से एक थी।
“बारात धूम-धाम से चल रही थी। जब हमने इंसानों का एक समुन्दर देखा। हमारे दिलों में जनाज़े की ख़ौफ़ बैठ गया। आगे बढ़ना मुमकिन नहीं था। हमने अपनी औरतों और बच्चों से कहा कि उस वक़्त तक जगह नहीं छोड़नी जब तक हम लौट नहीं आते। सो हम भी चले आए।”
“वो मरने वाला मेरा भाई था। उसकी आख़िरी रस्में होने के क़रीब थीं जब ये जनाज़ा वहाँ से गुज़रा। हम सब अपना दुख भूल गए। मय्यत को ठिकाने लगाए बग़ैर ही हम चले आए। अब वहाँ सिर्फ़ मय्यत ही होगी और हम यहाँ आप लोगों के साथ चल रहे हैं।”
“हम तो किसी क़ाफ़िले के इंतिज़ार में घात लगाए बैठे थे। रात का पिछला पहर होगा। हवा का रुख़ हमारी तरफ़ होने की वजह से आवाज़ें कई कोस दूर से हम तक पहुँचना शुरू हो गई थीं। हम सौ के क़रीब लोग थे। आने वालों के शोर और आवाज़ों से ये अंदाज़ा करना मुश्किल नहीं था कि उनकी तादाद हज़ारों में है। यूँ लग रहा था जैसे कोई बहुत बड़ा फ़ौजी लश्कर है जो रात के अँधेरे में सोए हुए दुश्मन को सोते में जा लेना चाहता है। हम अंदर से डर रहे थे कि कहीं ऐसा न हो हमें लूटने के चक्कर में लेने के देने न पड़ जाएँ। क़रीब आने पर पता चला कि ये तो किसी का जनाज़ा है जिसके साथ हज़ारों की तादाद में लोग हैं। ये देखो हम अपने हथियार भी साथ ही ले आए हैं।”
4
एक समुन्दर था जो लहरें लेता हुआ आगे बढ़ रहा था। कुछ तलाश करते करते वहाँ पहुँचते तो कुछ रास्ते से मिल जाते। जैसे दुनिया भर के लोगों को ख़बर हो गई हो। पीछे रह जाने वालों में सिर्फ़ बच्चे, औरतें, बीमार और बूढ़े ही थे। बहुत से ऐसे भी थे जो सिर्फ़ इतना बड़ा मजमा देख कर ही आते गए। मजमे में शामिल होने के बाद ही उन्हें पता चलता कि ये तो कोई जनाज़ा है। लोग खिंचते चले आ रहे थे। सियाह पानियों में बिना पतवार के डोलती कश्ती की तरह जनाज़ा दो क़दम आगे तो कभी पीछे हो रहा था। कोई नहीं जानता था कि कहाँ जाना है। वो तो बस किसी सम्मोहन में आगे बढ़ रहे थे। जो साथ चले थे वो सरकते-सरकते एक दूसरे से मीलों दूर पहुँच चुके थे। परिचित चेहरे एक दूसरे से कब के जुदा हो चुके थे। इसी वजह से अब वो आपस में कोई बात नहीं कर रहे थे। पहले तो नए शामिल होने वाले जब आते तो शोर मच जाता लेकिन अब हाल ये था कि या तो दुनिया भर के लोग शामिल हो चुके थे, कोई बाक़ी नहीं बचा था और या वो चुपचाप शामिल होते चले जा रहे थे। ये समझ न आने की सबसे बड़ी वजह ये थी कि पहले चलने वालों को चलते हुए चारों सम्त में ख़ाली ज़मीन भी दूर तक नज़र नहीं आती थी।
लोग ही लोग थे, ज़मीन का कहीं निशान नहीं था। ऊँचे-नीचे रास्तों पर सरकते हुए वो आगे बढ़ रहे थे। हमवार जगह पर तो इंसान थे ही, कोसों दूर नज़र आने वाले पहाड़ भी लोगों से लदे हुए थे। पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते हुओं को आगे और पीछे जहाँ तक नज़र जा रही थी सर ही सर दिखाई दे रहे थे। हज़ारों लोग ऐसे थे जिन्होंने जनाज़ा नहीं देखा था। वो तो बस पवित्र काम समझ कर आ शामिल हुए थे। बेशुमार ऐसे भी थे जिन्हें पता ही नहीं था कि इतने सारे लोगों के जमा होने की वजह क्या है। जो पहले बहुत जोश-ओ-ख़रोश से चल रहे थे, बढ़ती तादाद और थकावट की वजह से उनकी रफ़्तार कम होते होते रुक सी गई थी। सूरज एक बार फिर लोगों के सरों को छूता हुआ डूब रहा था।
5
काफ़ी देर रुके रहने की वजह से, जिन्हें पता था कि एक जनाज़े के साथ निकले हुए हैं, वो यही समझ रहे थे कि आख़िरी रस्मों का वक़्त आ गया है। वो एक दूसरे से पूछना ज़रूर चाहते थे कि हम कब तक यहाँ रुकेंगे, ये क्या हो रहा है? पहले-पहल तो नए मिलने वाले रास्ता दिखा रहे थे लेकिन अब मार्गदर्शक भी भटक चुके थे। ज़ियादा देर रुके रहने की वजह से उनके जी घबराने लगे थे। साँस लेना दुश्वार हो रहा था। एक अथाह ख़ामोशी थी जो टूटने का नाम नहीं ले रही थी। वक़्त जैसे थम गया था। इस स्थिति से निकलने का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। ख़ुद को इस गंभीरता से बचाने के लिए उन्होंने बातें करना शुरू कर दीं:
“ये हम इतनी देर से क्यों चल रहे थे?” इस सहमी हुई सरगोशी ने अनंत सरगोशियों के लिए रास्ता तैयार किया। भीड़ के हर हिस्से से सरगोशियों का सिलसिला शुरू हो गया। वो जो पहले-पहल सहमे-सहमे से बोल रहे थे, अब ऊँची आवाज़ में एक दूसरे से बातें कर रहे थे। आवाज़ें ही आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। “चारपाई पे कुछ है भी या नहीं?” “वैसे मैंने तो चारपाई देखी तक नहीं।” “हो सकता है वो कोई मरा हुआ शख़्स हो ही ना, वो किसी बीमार को लेकर जा रहे हों।” “हम बग़ैर सोचे समझे उनके पीछे यहाँ तक आ गए हैं?” “रास्ते में कितने कठिन मौसमों का हमें सामना रहा पर हम रुके नहीं।” “जैसे किसी ने हम पर जादू कर दिया हो।” “ये भी संभव है चारपाई ख़ाली हो और वो किसी मरे हुए शख़्स को ले जाने के लिए जा रहे हों।” “नहीं मेरे ख़याल में वो शायद किसी को दफ़्न करके आ रहे थे।” “इससे पहले हम जहाँ भी रुके अपनी मर्ज़ी से रुके, लेकिन यहाँ तो जैसे हमें आगे बढ़ने से रोक दिया गया है।” “वो चारपाई उठाने वाले हैं कहाँ? उन्हीं से जाकर पूछते हैं कि कहाँ जाना है, क्या करना है, हम कब तक इसी जगह रुके रहेंगे?” “अच्छा ये कोई जनाज़ा था। हम लोग तो इतना बड़ा हुजूम देखकर ही चले आए कि देखें कि ये कौन लोग हैं और कहाँ जा रहे हैं।” “रुकने से बेहतर है कि चलें वरना यहीं दम घुटने से हम सब मारे जाएँगे।” “मेरे ख़याल में हमें उन्हें ढूँढना चाहिए। ऐसा न हो हम इधर ही खड़े रह जाएँ।” “संभव है आगे रास्ता ही बंद हो।” “जब से हम चले हैं किसी जगह भी इतनी देर नहीं रुके।” “चलो वापस चलते हैं, लगता है आगे रास्ता बंद है।” “हाँ! हाँ! चलो-चलो उन्हें तलाश करें और उनसे पूछें कि ये मय्यत किसकी है और अब हमें क्या करना है?” “चलने की बात तो सारे कर रहे हैं लेकिन किसी को पता भी है कि जाना कहाँ है?” “तुम इस बात को छोड़ो और चलने का नाम लो बस।” फिर क्या था कुछ लोग धक्कम-पेल करते हुए चलना शुरू हो गए। जिसकी समझ में जिधर बढ़ना चाहिए था, वो उधर ही बढ़ने की कोशिश करने लगा।
6
बढ़ते अँधेरे में कुछ सुझाई नहीं दे रहा था। घुटी-घुटी गुर्राहटें तो कहीं आसमान को चीरती हुई चीख़ें, एक दूसरे के साथ-साथ भी चल रही थीं और एक दूसरे को काट भी रही थीं। जत्थे के जत्थे एक सम्त तो कभी दूसरी सम्त डोलते फिर रहे थे। प्रकृति ने अँधेरे की अनंत चादर बिछा कर उनके लिए बहुत आसानी पैदा कर दी थी। ज़िंदा रहने कशमकश में बेशुमार बिछड़े हुए भी एक दूसरे के आमने सामने आए। भागने वालों के क़दमों तले की ज़मीन गिरे हुओं की वजह से नर्म और ऊबड़-खाबड़ हो गई थी। कुछ ज़िंदों के दरमियान फँसे हुए मुर्दे भी थे जिन्हें नीचे गिरने को जगह नहीं मिल रही थी। हर शख़्स इस कोशिश में था कि जैसे भी मुमकिन हो ख़ुद को दूसरे शख़्स के सामने आने से बचाया जाए जिसके हाथ किसी भी लम्हे उसकी गर्दन को दबोच सकते थे। मौत रात भर अपने शाश्वत रंग में नृत्य करती रही।
सूरज निकलने तक तूफ़ान यूँ थम चुका था जैसे रात भर कुछ हुआ ही नहीं। जहाँ तक नज़र जाती थी, पड़ी हुई टेढ़ी-मेढ़ी लाशें, रात का भयावह दृश्य का मुँह बोलता सबूत थीं। बीच में कहीं ऊँचे नीचे टीले भी थे जिन्हें देख कर ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि मरे हुए लोगों ने टीलों को छुपा रखा था या लोग एक-दूसरे के ऊपर यूँ मरे पड़े थे कि उन्होंने टीलों का रूप ले लिया है। चारपाई गहरे गाढ़े ख़ून में जमती हुई लाशों की ढेरियों के बीच में पड़ी थी। अपनी असली हालत क़ायम रखने वाला ये इकलौता बदन था जिसे खरोंच तक नहीं आई थी। बच जाने वाले लड़खड़ा कर मरे हुओं के सहारे उठने की कोशिश कर रहे थे। जहाँ निगाह काम करना छोड़ देती, यूँ लग रहा था जैसे लाल रंग की फुहार पड़ रही हो और उसके पीछे भी यही मंज़र हो। ये चारों वो थे जो उस वक़्त चारपाई के नीचे थे। उनकी तमाम रात इसे बचाते हुए गुज़र गई। चारों तरफ़ से जब शोर उनकी तरफ़ बढ़ने लगा तो उन्हें मय्यत की पड़ गई। पहले तो उन्होंने बड़ी हिम्मत से मय्यत को ज़मीन पर रखने के लिए जगह बनाई फिर अपनी तरफ़ बढ़ने वालों का रास्ता रोकने लगे। धक्कम-पेल में रात गुज़र गई। तीन से चार क़दम छोड़ कर कोई चार पाँच हाथ ऊँचा लाशों का ढेर था जो मय्यत के पास गोले की रूप में पड़ा था। ये वही लोग थे जो मरकर आगे बढ़ने वालों को रोकने में कामयाब हो गए थे। अभी सूरज निकलने में कुछ वक़्त था लेकिन रौशनी दूर तक देखने को काफ़ी थी।
“कल शाम तक तो सब ठीक था, ये अचानक सब को क्या हो गया? वो चारों तरफ़ से चीख़ते-चिल्लाते हमारी तरफ़ क्यों बढ़ते चले आ रहे थे? जब से हम इनमें शामिल हुए हैं सभी आराम से चले आ रहे थे, एक दम उन्हें क्या हो गया? ये महज़ भगदड़ थी या कोई साज़िश?”
“देखो! दूर तक लाशें ही लाशें हैं।” “हाँ हमारे क़रीब वाले सब मारे गए।” “शुक्र है मय्यत को कुछ नहीं हुआ। उनकी क़ुर्बानी बेकार नहीं गई।” “मेरा ख़याल है हम चारों के सिवा कोई ज़िंदा नहीं बचा।” “चोटें बहुत ज़ियादा तो नहीं आईं लेकिन इतनी कम भी नहीं कि आसानी से हम मय्यत उठा कर चल सकें। वो जो आगे बढ़ने वालों को रोक रहे थे उनकी वजह से हम बच गए।” “ये अच्छा हुआ कि हम चार हैं, अगर तीन या दो होते तो चारपाई उठाना कितना मुश्किल हो जाता।” “नहीं! हम उनकी वजह से नहीं, मरे हुए नौजवान की वजह से बचे हैं। सोचो, सिर्फ़ हम चार ही क्यों बचे हैं?” “हाँ तुम ठीक कहते हो, मय्यत ने ही हमें बचाया है। हम भला इसे कैसे बचा सकते थे?” “इसे अपनी आख़िरी रस्मों के लिए चार काँधे दरकार थे, सो उसने हमें बचा लिया।” “तब तक आख़िरी रस्में संभव नहीं जब तक हमें कुछ और ज़िंदा लोग न मिल जाएँ।” “वैसे भी लाशों के बीच इसकी आख़िरी रस्में संभव नहीं हैं।” “जल्दी इस काम को पूरा करके अपने घर वालों की ख़बर भी लेनी है। एक अर्सा हो गया हमें घरों से निकले हुए, कहीं ऐसा न हो वो हमें मरा हुआ समझ कर सब्र करके बैठ गए हों।” “हमारी उम्मीद के उलट वापसी उन्हें निहाल कर देगी।” “पहाड़ियों की तरफ़ ही चलो, हो सकता है उस पार लाशें न हों।”
वो चारपाई उठाए, लाशों पे पाँव धरते, लड़खड़ाते, उन दो पहाड़ियों की सम्त चल दिए जिनके बीच से सूरज इंसानी क़द के बराबर उभर आया था।
ज़हीर अब्बास लाहौर के रहने वाले हैं। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से एम.ए. (उर्दू) और गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से एम.फिल. तथा पीएच.डी. की पढ़ाई की। इस समय वो ओरिएंटल कॉलेज, पंजाब विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में पढ़ा रहे हैं। उनकी खास दिलचस्पी कहानी और उपन्यास में है। उनका कहानी-संग्रह “मदफ़न की तलाश” भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा उनकी एक शोध पुस्तक भी प्रकाशित है। इन दिनों वो एक उपन्यास लिख रहे हैं।
मदफ़न के मानी क़ब्र के हैं, कहानी में कुछ लोग बस एक जनाज़े को उठा कर ले जा रहे हैं। बज़ाहिर इसमें ऐसी कोई बड़ी वारदात नहीं घटती है मगर ये कहानी अपने अन्दरून में बहुत कुछ ऐसा रखती है जो हमारे कांधों पर सवार बे-ज़रुरत और मुर्दा तक़द्दुस के बोझ को नुमायाँ करने में कामयाब है। इस तरह की कहानी, जिसमें आम तौर पर इतने इशाराती तौर पर बात की जाए, उसे निभाना मुश्किल है, ये वो क्राफ़्ट है, जिसको फूहड़ता से बरता जाए तो वो ‘जदीदियों की उर्दू कहानी‘ बन जाती है, जिसमें मानी की तलाश में निकली हुई कहानी सिर्फ़ लफ़्ज़ों के भारी पत्थर से सर टकरा कर लहू-लुहान होती रहती है। ज़हीर अब्बास ने इस क्राफ़्ट को बख़ूबी निभाया और वो इस मौज़ू पर एक यादगार कहानी लिखने में सफल हो गए हैं।