पाँच सौ रुपये के इनाम का एलान सुन कर बारी-बारी सब ही ने कोशिश की। हिन्दुस्तानी चाबुक सवार, काबुली पठान, तोप ख़ाने के गोरे और सिपाही एक के बाद एक कितने ही घोड़ी पर सवार होने के वास्ते सर्कस के दायरे में दाख़िल हुए और तरह-तरह से कोशिशें कीं, लेकिन घोड़ी पर सवार होना तो दरकिनार उसकी रास तक छूना नसीब न हुई। जो भी आगे बढ़ा दोनों कान पीछे सुकेड़, दाँत निकाल हिनहिना के घोड़ी ऐसी काटने को दौड़ी कि बहुत से तो जब ही गिरते-पड़ते सर्कस की दीवार फाँद बाहर भागे और अगर एक-आध ढीट बेत या चाबुक घुमाता खड़ा भी रह गया तो फिर घोड़ी ने घूम-घूम के ऐसी दोलत्तियाँ चलाईं कि आख़िर मजबूर हो कर उसको भी पशेमान और शर्मिंदा बाहर आना पड़ा।
सर्कस के मैनेजर ने जो नीची सी दीवार के बाहर खड़ा था चारों तरफ़ सर घुमा-घुमा के तमाशा देखने वालों को मुख़ातिब करके फिर एलान किया, “इतना जेंटलमैन सिपाही और जवान चारों तरफ़ है। कोई और आए, आए, आए! जिसका हिम्मत हो, जो कोई इस घोड़ी पर बैठेगा और चार क़दम चलाएगा, सर्कस कम्पनी उसको पाँच सौ रुपया इनाम देगा।”
चारों तरफ़ कोचों, कुर्सियों और फिर छत तक पहुँच जाने वाली बेंचों पर हज़ारों आदमी बैठे थे। सर्कस खचाखच भरा हुआ था लेकिन अब किसी की हिम्मत न पड़ती थी कि कोई आए। हर तरफ़ सब ख़ामोश शर्मिंदा से बैठे थे और उनके सामने तमाशे के छोटे से गोल चक्कर के बीच में चमकदार, सियाह चिकनी-चुपड़ी, तन्दुरुस्त, नौजवान, फुरतीली, चुलबुली घोड़ी, गर्दन को मेहराबी ख़म दिए, हिनहिनाते हुए सर को झटके दे-दे कर और दुम की चूरी झपका-झपका कर अगले पैरों से ज़मीन पर टापें मार रही थी। उसकी इस हरकत में फ़तह की मुसर्रत, हुस्न का ग़ुरूर और शबाब की फड़क अयाँ थी और इस वक़्त जबकि दुनिया भर की निगाहें उस सियाह घोड़ी पर जमी हुई थीं सर्कस का चोर दरवाज़ा आहिस्ता से खुला, सन्न से भागती हुई एक लड़की हवा की तरह आई। बिजली की तरह उसका हंटर कौंदा, घोड़ी उछली, फड़की और भागी, हंटर कौंदा और फिर कौंदा। घोड़ी जान तोड़, सर्कस में चक्कर लगाने लगी, अब सब की निगाहें… इस सफ़ेद इंसानी बछड़ी पर जम गईं।
बूटा सा क़द, दोहरा जिस्म, सियाह बाल, खाल से चिमटा, चुस्त सर्कस का लिबास, हुस्न था, जादू था, क़हर था कि सहर था। उसके हाथ उसके पैर, उसका सीना, उसकी गर्दन, उसका सर, उसकी आँखें हर एक कशिश-ए-दिल का मरकज़ था और क्यों? इसलिए कि वह एक मुजस्समा-ए-शबाब थी। उसकी हर बात में शोख़ी थी, शरारत थी। हाथों में फड़क थी, पैरों में थिरक थी, गर्दन में लचक थी, आँखों में चमक थी, दुनिया उसको तकती थी और वह बेख़बर थी, हंटर घुमाते-घुमाते एक दफ़ा वह लपकी… सपाटे भरती घोड़ी पर हाथ लगाते ही बिजली की फुर्ती से सवार हो गई। दोनों हाथों से खुले हुए बालों को सँवारा और फिर भागती हुई घोड़ी की नंगी पीठ पर खड़ी हो गई, घोड़ी ने चक्कर पर चक्कर और तेज़ी से लगाना शुरू कर दिए। उस वक़्त उसके खुले हुए सियाह बाल गुलाबी रिबन की बंदिश से आधे आज़ाद पीछे-पीछे फड़फड़ाते। उसकी चुस्त पाजामे में क़ैद गोल-गोल टाँगें हल्के-हल्के लचकती थीं। दोनों हाथ हवा में लहराते थे। सरपट भागती हुई घोड़ी पर वह एक रक़्स सा कर रही थी, सब की निगाहें उधर ही लगी हुई थीं वहाँ चोर दरवाज़ा आहिस्ता से फिर खुल चुका था। चक्कर लगाते-लगाते एक दफ़ा उधर घूम घोड़ी अपने सवार के साथ उसके अन्दर ग़ायब हो गई। कई सेकंड तक तमाशबीन सक्ते की सी हालत में ख़ामोश रहे और फिर तालियों के शोर से आसमान सर पर उठा लिया।
सर्कस के लखनऊ आने के चंद ही दिन बाद सारे शहर में घोड़ी और लड़की का शोहरा हो गया। उन दोनों के हुस्न, ख़ूबसूरती, शरारत और शह-सवारी पर तरह-तरह से इज़हार-ए-ख़याल होने लगे और बीसियों रिवायतें, अफ़वाहें फैलती चली गईं। किसी का ख़याल था कि लड़की आवारा है, कोई कहता था कि सर्कस वालों की सख़्त निगरानी करना और किसी की हवा तक न लगने देना मसलिहत से ख़ाली नहीं। बाज़ का शुबह था कि लड़की और मालिक-ए-सर्कस के गहरे तअल्लुक़ात हैं और बाज़ को यक़ीन था कि लड़की मालिक की बेटी है। मगर असल में यह सब अक़्लिया गधे ही थे क्योंकि सर्कस के कारकुनों और अदाकारों से मुलाक़ात या वाक़फ़ियत किसी को भी हासिल न थी। सर्कस के छोटे-बड़े जानवर, उनके पिंजरे और काम करने वालों की छोलदारियाँ और सब की चारों तरफ़ ऊँची-ऊँची क़नातें खड़ी करके उनको आवाम की नज़रों से पोशीदा कर दिया गया था। इसके साथ साथ सर्कस के मालिक या मैनेजर की अपने लोगों पर सख़्त हिदायत थी कि किसी से न मिलें-जुलें और न बाहर जाएँ। ऐसी हालत में लखनऊ की मख़्सूस ख़ल्क़त यानी शौक़ीन, आवारा-मनुश और मुफ़लिस शरीफ़ लोग, क़नातों के चारों तरफ़ और भी ज़्यादा चक्कर लगाने लगे। कोई क़नातों के नीचे से झुक कर देखता था, कोई दरवाज़े में झाँकता था और इस तरह से अगर किसी को हाथी के पैरों, शेर के खुर्रे या एक-आध आदमी की झलक नसीब हो जाती तो फिर वह तरह-तरह के चश्म-दीद अफ़साने बयान करता था। इन बातों का आख़िर नतीजा यह हुआ कि यह शोहरत नवाब महमूद अली ख़ान ताल्लुक़ादार डलियाबाद तक पहुँची और एक दिन वह ख़ुद ही सर्कस का तमाशा देखने आए जहाँ उनके वास्ते नशिसतें मख़्सूस करके आरास्ता कर दी गई थीं।
नवाब ने सब करतब हैरत से देखे और पसंद किए लेकिन सबसे ज़्यादा उस लड़की और घोड़ी का खेल पसंद किया। तमाशा ख़त्म होने पर उन्होंने सर्कस के मैनेजर को अपनी बैठक पर तलब किया और बड़ी देर तक उनके सर्कस की तारीफ़ें कीं। ख़ासकर उस लड़की की, यहाँ तक कि उन्होंने इनाम देने के वास्ते लड़की को भी अपने पास बुलाना चाहा मगर जब मैनेजर से यह मालूम हुआ कि लड़की का तमाशा करने के अलावा बाहर आना मुमकिन नहीं है, तो मैनेजर के लिए अपनी रिस्ट-वाच (wrist-watch) और पचास रुपया लड़की के वास्ते इनाम भिजवा दिए। न केवल यही बल्कि दूसरे रोज़ फिर तमाशे में बहुत पहले से आ गए। मैनेजर को बुलवाया, दुनिया भर की बातें और हेर-फेर के लड़की और घोड़ी की बातें करते रहे लेकिन उस वक़्त मैनेजर अपना ज़्यादा वक़्त नवाब साहब को न दे सका। उसे तमाशे की जल्दी थी, इसलिए चला गया।
तमाशा ख़त्म होने पर वह ख़ुद ही फिर आ गया। नवाब साहब ने सौ-सौ के पाँच नोट सर्कस को इनाम में दिए, बड़ी देर तक बातें कीं, इतनी कि रात गए वापस हुए।
दूसरे दिन नवाब साहब ने मैनेजर को अपने महल पर सुबह खाने पर दावत दी। नवाब साहब की इस ख़ास तवज्जो और मेहरबानी का मतलब मैनेजर भी पूरी तरह समझ गया था। सौ से ऊपर महल, पैंसठ बरस की उम्र, नवाब साहब की दौलत और उसके इस्तेमाल से कौन ऐसा था जो वाक़िफ़ न था। जहाँ-दीदा, जहाँ-गश्त मैनेजर ने भी समझ लिया था कि यही मौक़ा है, जो कुछ भी कमाया जा सके, कमा लिया जाए। इसलिए उसने बड़ी तदबीर और दूर-अंदेशी से काम लिया।
खाने के बाद जब असल मामले की बातें शुरू हुईं तो उसने पहले तो बड़ी ही परेशानी और घबराहट ज़ाहिर की। इस मामले में कुछ सुनना ही न चाहता था। उसका कहना था कि लड़की का बाप और बड़ा भाई दोनों साथ हैं, सख़्त निगरानी की जाती है, कुछ किया ही नहीं जा सकता। लेकिन फिर बाद में जब उसको बहुत कुछ लालच दिया गया तो बहुत हिचकिचाहट के बाद एक तजवीज़ इस तरह पेश की…
“नवाब साहब, आपके अख़लाक़ और मेहरबानी ने मुझको मजबूर कर दिया। लेकिन हुज़ूर देखें कि मैं किस क़दर ख़तरनाक काम करने पर आमादा हो गया हूँ। अगर कुछ भी गड़बड़ हो गई तो दस-बारह बरस जेल में चक्की पीसना पड़ेगा। बहरहाल अब जो कुछ भी हो, आपका काम तो पूरा ही करूँगा। कल इतवार का तमाशा ख़त्म करके हम लोग परसों यहाँ से कानपुर जाने वाले हैं। आप पीर की सुबह को अपना मोटर ख़ुद ही लेकर हम लोगों की क़नातों के गिर्द दरवाज़े पर आएँ और इंतज़ार करें। लड़की की तबीयत कुछ ख़राब रहती है, मैं उससे कहूँगा कि डॉक्टर के पास जाने के वास्ते मोटर है और इस धोखे से लाकर उसमें सवार करूँगा। उसको शक भी न होगा कि क्या हो रहा है। आप उससे कोई बात न करें, ख़ामोशी से बिठाए लिए चले जाएँ। महल में जाकर फिर जो कुछ भी हो सके ज़िम्मेदार आप हैं, जो कुछ भी इंतज़ाम करना हो कर लें। रहा मेरा और मेरे आदमियों का मामला, तो अब जो भी क़िस्मत में बदा हो। लड़की के ग़ायब होते ही उसके बाप और भाई मेरी बोटियाँ नोच डालेंगे। न मालूम किन-किन मुसीबतों का सामना करना पड़े। फिर भी इतना तो मुझे ज़रूर ही करना होगा कि लड़की के चले जाने के बाद पुलिस में बाक़ायदा इत्तिला करूँगा, वरना मैं किसी तरह नहीं बच सकता। उसके बाप और भाई की ज़बान बंद करने के वास्ते भी हर मुमकिन तरीक़ा इख़्तियार करना होगा और इसलिए मैं हुज़ूर से साफ़-साफ़ कहे देता हूँ कि दस हज़ार से कम में यह काम करने पर मैं हरगिज़ तैयार नहीं हूँ। इसमें मुझे क्या मिलेगा, यह ख़ुदा ही बेहतर जानता है। पुलिस और उसके रिश्तेदारों को दे-दिला कर कुछ मिल गया तो मिल ही गया, वरना घाटे में चक्की पीसना तो बदी है। नवाब साहब, मैं तो फिर आप से इल्तिजा करूँगा कि उस लड़की का ख़याल छोड़ दें, वह आपके बस की चीज़ नहीं है।”
सर्कस बीस दिन लाल बाग़ में ठहरा। इतवार की शाम आख़िरी मर्तबा तमाशा करके पीर की सुबह को यहाँ से कूच का सामान होने लगा। सुबह अंधेरे ही साईस घोड़ों को लेकर पैदल रवाना हो गए थे। बाक़ी जानवरों के पिंजरे छकड़ों पर लादे जा रहे थे। लोगों की छोलदारियाँ गिरा-गिरा कर तह की जा रही थीं, हर आदमी किसी न किसी काम में मशग़ूल था।
एक तरफ़ एक हाथी बैठा था जिस पर बहुत सा सामान लदा हुआ था और उस पर चंद बंदर बँधे हुए थे। अब यह भी रवाना होने के वास्ते तैयार हो गया था। बाक़ी हाथी अभी यूँ ही खड़े झूम रहे थे। मैनेजर का छोटा सा ख़ैमा भी लगा हुआ था और वह उसके सामने आराम कुर्सी पर लेटा नवाब साहब की आमद का मुंतज़िर था। एक-आध आदमी इधर-उधर से आकर उससे कुछ पूछ-गछ जाता था, जिस पर वह उनको मामूली हिदायतें भी देता था और फिर घड़ी को देख कर इंतज़ार में लेट जाता था। नौ बजे के क़रीब नवाब साहब के मोटर का हॉर्न बजा, मैनेजर फ़ौरन उठ कर क़नातों से बाहर गया। वहाँ एक बहुत बड़े मोटर में जिस पर परदे लगे हुए थे, नवाब साहब ख़ुद कुर्ता-पाजामा पहने ड्राइवर की जगह बैठे थे, मैनेजर ने पास जाकर सलाम किया। नवाब साहब की आँखें चमक रही थीं। चेहरा ख़ौफ़ से सुर्ख़ था। मुस्कुरा कर घबराई हुई आवाज़ में पूछा, “कहिए!”
मैनेजर, (इत्मीनान से) “सब इंतज़ाम ठीक है।”
नवाब साहब, (जल्दी से) “बेहतर है। फिर जाइए जल्दी कीजिए।”
मैनेजर, (निहायत इत्मीनान से) “मेरी तरफ़ से मुतमइन रहें। अब आप भी तो मुझे इत्मीनान दिलाएँ। देखिए नवाब साहब इस वाक़िए के बाद मेरा आपके महल पर जाना किसी तरह ठीक न होगा और न आपका या आपके किसी आदमी का ही आना ठीक होगा। दूसरे किसी और शख़्स का बीच भी पसंद नहीं करता।”
नवाब साहब, (जल्दी से गद्दी के नीचे से नोटों का बंडल घसीट कर और उनको खोलते और बंद करते हुए) “आपकी रक़म आपके इत्मीनान के वास्ते मौजूद है, एक हाथ से लड़की को सवार कीजिए, दूसरे हाथ से अपना मुआवज़ा लीजिए। जाइए जल्दी कीजिए, मेरा यहाँ इस तरह से ज़्यादा देर ठहरना नाज़ेबा है।”
मैनेजर ने एक दफ़ा नोटों पर नज़र डाली, मुस्कुराता हुआ क़नातों के घेर के अन्दर गया, अपने डेरे के पास जाकर उसमें झाँका और हाथ से इशारा किया। अन्दर से वही लड़की, वही तमाशा करने का चुस्त लिबास पहने मुस्कुराती हुई निकली और मैनेजर के पीछे-पीछे चल दी। बाहर मोटर का इंजन पहले से घनघना रहा था। नवाब साहब स्टीयरिंग-गियर दोनों हाथों से थामे बिल्कुल तैयार बैठे थे। जूँ ही ये दोनों पास आए नवाब साहब ने ललचाई हुई एक निगाह जल्दी से लड़की पर डाली। उसके गाल सुर्ख़ थे, होठों पर लाली थी, माथे पर से होता हुआ गुद्दी के चारों तरफ़ एक रिबन बँधा हुआ था, उसके नीचे सियाह बाल खुले शानों पर पड़े थे। वह नवाब साहब पर एक निगाह डालती हुई मुस्कुराती मोटर के पास आई, मैनेजर ने दरवाज़ा खोल दिया और वह उसमें बैठ गई।
मैनेजर दरवाज़ा बंद करके नवाब साहब के पास आया, उन्होंने खिसकते हुए मोटर में से नोटों का बंडल मैनेजर को दे दिया और रफ़्तार बढ़ा दी। लम्हा भर में मोटर सामने के मोड़ पर घूम कर नज़रों से ग़ायब हो गया। क़नातों से बाहर फ़ुटपाथ पर मैनेजर साहब तन्हा मुस्कुराते हुए नोटों के गड्डी में से परतें हटा-हटा कर कुछ देखते रहे और फिर उनको पतलून की जेब में ठूँसते हुए अन्दर रवाना हुए।
मोटर सड़क पर ग़ैं-ग़ैं, इधर घूम, यह जा वह जा, निकला चला गया। यहाँ तक कि शहर का किनारा आ गया और अब वह सीधा डलियाबाद की तरफ़ रवाना हो गया। जहाँ पूरी पुख़्तगी और एहतियात के साथ सब इंतज़ाम हो चुके थे। महल के ज़नाने फाटक में जूँ ही मोटर दाख़िल हुआ, बड़ा फाटक बंद कर लिया गया। उसके अन्दर सहन में दो-चार क्यारियाँ, चंद दरख़्त और पौधे थे, एक तरफ़ तीन-चार मुलाज़िम बैठे थे, एक लम्बे दालान के सामने ऊँचा सा चबूतरा था, मोटर उसके सामने रुका। मोटी सी अधेड़ उम्र की एक मामा चाँदी का मनों ज़ेवर पहने मोटर के पास आई, दरवाज़ा खोला, बड़े ठस्से से बोली, “उतरिए, आइए मेरे साथ चली आइए।”
लड़की अब भी इसी तरह ख़ामोश मुस्कुराती हुई ख़ुश-ख़ुश फुर्ती से उतरी और उसके पीछे-पीछे तेज़ी से चल दी। मामा ने बरामदे के कोने पर एक और दरवाज़ा खोला, यह ज़ीना था। दोनों ऊपर चढ़े। एक और छोटा सा सहन मिला। उसके दूसरी तरफ़ एक बड़ा आरास्ता कमरा था जिसमें ज़मीन पर फ़र्श, क़ालीन, गाव-तकिये थे, दीवारों पर भद्दी रंगीन तस्वीरें और बड़े-बड़े आईने थे। एक तरफ़ एक बहुत बड़ी महरी मच्छरदानी से ढकी हुई थी। दूसरी तरफ़ तख़्तों का छोटा सा तख़्त था, उस पर भी चाँदनी के क़ालीन, गाव-तकिये वग़ैरह लगे थे, जा-ब-जा चाँदी के उगालदान रखे थे। क़ालीनों के कोनों पर अगरबत्तियाँ जल-जल कर ख़ुशबूदार धुएँ से कमरे को मोअत्तर कर रही थीं। एक चौकी पर लोटा, सुराही, साबुनदानी, बेसनदानी सब चाँदी के रखे थे, फ़र्श पर गाव-तकिये के बराबर क़ालीन पर एक गंगा-जमुनी पानदान, दूसरी तरफ़ आबनूसी इत्रदान रखे हुए थे। एक कोने में एक छोटी सी मेज़ पर सब्ज़-सुर्ख़ रंग के पटाख़ेदार ख़्वानपोश से ढकी एक सीनी रखी थी। कमरे के छत और दीवारें तरह-तरह के रंगों से बने हुए फूलों और पत्तियों से नज़रों को घायल किए देती थीं। छत में रंगीन शीशे के दो झालर लटक रहे थे। मामा लड़की को लिए हुए इस कमरे में दाख़िल हुई, तख़्तों की तरफ़ बैठने का इशारा किया और उल्टे पैरों वापस लौट गई।
लड़की ने ख़ुशी से मुस्कुराते हुए कमरे में चारों तरफ़ निगाह डाली, हर चीज़ को हैरत से देखा। तख़्तों के पास गई, पैर लटका कर बैठी लेकिन फ़ौरन ही झुक कर आबनूसी इत्रदान को छुआ और फिर सीधी हो गई। चारों तरफ़ देखा कि कोई देखता तो नहीं है। फिर झुक कर इत्रदान के नक़ूश पर हाथ फेरा। नवाब साहब अँगनाई की दूसरी सम्त के एक कमरे में से झाँक रहे थे। बाहर आकर हँसते हुए उस कमरे में दाख़िल हुए, “हाँ हाँ इत्र लगाओ, इत्र लगाओ, यह तुम्हारे ही वास्ते है।” उनके आने पर लड़की सीधी हो बैठी और उनकी तरफ़ देख कर ज़ेर-ए-लब मुस्कुराई।
नवाब साहब ने और आगे बढ़ते हुए कहा, “किस ग़ज़ब की तुम्हारी मुस्कराहट है।”
और आगे बढ़े, दोनों हाथ लड़की की तरफ़ बढ़ाए। आनन-फ़ानन में लड़की के मुस्कुराने में बदलाव पैदा हुआ। हँसी ग़ायब होकर संजीदगी पैदा हुई। अचानक संजीदगी से परेशानी और परेशानी से ग़ुस्से के आसार उसके चेहरे पर आए। अब वह साकित खड़ी उस सफ़ेद बूढ़े को ग़ुस्से से तक रही थी। नवाब साहब ने यह कहते हुए कि “दुनिया का हर ऐश यहाँ तुम्हारे वास्ते मुहैया करूँगा, अब तुमको मेरा ही होकर रहना होगा।” फिर अपना हाथ लड़की की तरफ़ बढ़ाया। लड़की फुर्ती से एक क़दम पीछे हटी, दोनों हाथ उठा कर अपने चेहरे को रगड़ डाला। फिर कंधों पर बढ़े हुए गेसू सर से नोच नवाब साहब के सामने ज़मीन पर दे मारे और इसके बाद उसने पहली मर्तबा अपनी आवाज़ निकाली, “आवाओआआ, आवाओआ।”
नवाब साहब मुजस्समा-ए-हैरत बने साकित खड़े देख रहे थे। उनके सामने चौदह बरस की बद-शक्ल गूँगी लड़की ग़ुस्से में भरी बे-हंगम आवाज़ें निकाल रही थी। ज़ोर-ज़ोर से हाथ रगड़ने से उसके चेहरे का ग़ाज़ा जा-ब-जा से उड़ चुका था, जिससे उसका असली सियाह रंग चितकबरा हो गया था। चेहरे पर ज़ख़्म का एक बदनुमा दाग़ दाएँ गाल से लेकर कनपटी तक चला गया था। दूसरा दाग़ ख़शख़शी बालों से आरास्ता सर के बीचों-बीच नुमायाँ चमक रहा था।
***
वहाँ न बाप था न भाई। मकरूह सूरत लावारिस लड़की की फ़िक्र कौन करता। अलबत्ता घोड़ी की फ़िक्र में सब ही पड़ गए। कानपुर पहुँच कर अब हर एक की यह कोशिश होने लगी कि लड़की की जगह वह ले ले। उन्होंने हर तरह से उसे राम करने की कोशिश की लेकिन प्यार, दिलासा, मार-फटकार कुछ भी कारगार न हुआ। क्योंकि बचपन से उन्हीं लोगों ने रोज़ाना उसके हज़ारों सुइयाँ चुभो-चुभो कर उसे दुनिया भर के इंसानों से डरा दिया था। ये लोग सर्कस के घेरे में लाकर तरह-तरह के लिबास बदल कर उसके पास आते थे, उसके सुइयाँ चुभोते थे। उसे मालूम था कि जब तक वह थान पर बंधी है ख़ैरियत है और जहाँ इस जगह से हटी या आज़ाद हुई, सिवाए उस लड़की के जो भी पास आएगा किसी न किसी तरह सुई ज़रूर चुभोएगा।
उसको हर इंसान से दिली नफ़रत और अदावत हो गई थी। उसकी क़ुदरती मोहब्बत का रुझान दुनिया भर से सिमट कर इस लड़की पर क़ायम हो चुका था। वह नौ-उम्र बेज़ुबान जानवर आशिक़ की तरह मोहब्बत करने को बेक़रार, माशूक़ की तरह मोहब्बत किए जाने का मुंतज़िर। काली घोड़ी ख़ामोश खड़ी सर को झटके देती और दुम से मक्खियाँ झलती थी। न आँखों में अश्क, न लब पर फ़रियाद। अगाड़ी-पिछाड़ी बंधी खड़ी है। कभी दो एक मुँह घास खा ली और खड़ी है। कान आगे किए, पीछे से सर को झटके दिए। दुम की चूरी चल रही है। ख़ामोश खड़ी है। उसमें इंतज़ार है, ग़म है और फिर इंतज़ार है।
उस पर तरह-तरह के ज़ुल्म हुए। तरह-तरह की मार पड़ी, हर-हर तरह से उस पर सवार होने की कोशिश की गई। मगर उसने हिम्मत न हारी। उसको लड़की का इंतज़ार था, वही उस पर सवार हो सकती थी। दूसरे को कैसे पास आने देती। यहाँ तक कि जब पैरों में संदे (रस्सी का छोटा टुकड़ा जो चाल की रोक के लिए जानवरों के दो पैरों में डाल दिया जाता है) डाल कर और मुँह पर मोहरा बाँध कर उसको चलने, दुलत्ती चलाने और काटने से भी बिल्कुल नाकारा कर दिया गया तो फिर उसने धड़ाधड़ अपने तईं खड़े क़द से गिरा-गिरा दिया लेकिन किसी को सवार न होने दिया।
इसी तरह दिन-दिन भर उस पर सख़्तियाँ हुईं और जब लोगों ने हार के, झक मार के फिर उसे थान पर लाकर बाँधा, वह ख़ामोश खड़ी हो गई। न आँसू, न आवाज़, न सर्द आहें, न फ़रियाद। ख़ामोश बेज़ुबान की एक ही ज़ुबान, ख़ामोशी। सर को दो एक झटके दिए, दुम हिलाई, ख़ामोश खड़ी है। घंटों खड़ी है, दो झटके सर को दिए, दुम हिलाई और खड़ी है। सर्कस वालों में इधर यह हो रहा था कि “अच्छा, अब साली को जुलाब और फ़ाक़े दिए जाएँ।” उधर उसने ख़ुद दाना और घास छोड़ दिया। बाँसों की मार से और खड़े क़द से गिर-गिर पड़ने से बदन फोड़ा हो रहा था। लड़की की याद में दिल बेक़रार था। हर तरफ़ आँखें उसी को ढूँढती थीं। न भूख थी न प्यास। ऊपरी चोटें, अंदरूनी ग़म।
चंद दिन और जो गुज़रे तो घोड़ी की सूरत ही और हो गई। भड़कती, थिरकती हुई मोटी-ताज़ी सियाह चमकती बछड़ी के बजाय सुस्त, मरियल, हठीली, सियाह नुची-खुची, घुड़िया सर झुकाए ऊँघती हुई सी खड़ी है। टाँगों पर मक्खियाँ, आँखों पर भुनगे चिमटे हुए हैं। कभी दुम हिलाती तो हिलाती, वरना सर नीचा है, खड़ी है। अजीब हालत हो गई। आख़िरी दिन जब सर्कस कानपुर से भी कूच करने लगा तो उसका नीलाम बोल दिया गया। पैंतीस रुपये और मालिक-ए-सर्कस की जेब में आए और घुड़िया भी यहाँ से रुख़सत हो गई। क़िस्सा ख़त्म हुआ। चार दिन बाद भूले से भी कोई क्यों उनको याद करता, कैसी लड़की, किसकी घोड़ी! घास-कूड़ा उसका पड़ा है तो पड़ा है, नहीं तो आँधी आई उड़ गया, पानी आया बह गया। ये दोनों भी दुनिया के समुंदर में थपेड़े खाते बहते चल दिए। एक मशरिक़ उड़ गया, दूसरा मग़रिब बहा। पत्थर की सिलें दिल के आरज़े से आज़ाद, बेहिस, सदियों पहाड़ों बैठी जीती हैं।
जाड़े जाते हैं, बहारें आती हैं, जुग पर जुग, सदियाँ आती और जाती हैं। क़ौमों पर क़ौमें आती हैं। नस्लों पर नस्लें जाती हैं। पर यह बैठी-बैठी तकती हैं और हम आँधी के तिनके अब उड़े जब गिरे, पल भर ही में उड़ते हैं। फिर भी क़िस्मत के मारे उल्फ़त, मोहब्बत, यास-ओ-हसरत, आरज़ू और तमन्ना का घरौंदा यानी लप-लप करता दिल पहलू में लिए फिरते हैं। इत्तिफ़ाक़ ने इकट्ठा कर दिया मिल गए, हादसात ने जुदा कर दिया अलग हो गए। न उसका कोई घर न द्वारा।
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सर्कस की ज़िंदगी क्या थी सुबह का ख़्वाब था। चौंकते तो कुछ न था। घोड़ी के लिए यक्का था, यक्के वाला था। कानपुर की सड़कें गलियाँ थीं। उधर लड़की के लिए चूल्हा था, बर्तन थे, सिल थी और बट्टा था और दो बीबियों की ख़िदमत थी। मसाला पीसना, बर्तन माँझना, खाना पकाना, घर भर को खिलाना, बचा-खुचा ख़ुद खाना और फिर इसी को दोहराना। यही ज़िंदगी थी, बरस पर बरस गुज़रे। गूँगी लड़की, बेज़ुबान, सिल पर हल्दी, धनिया, मिर्चें, दोनों हाथों में बट्टा उकड़ूँ बैठी, आगे-पीछे, आगे-पीछे, हिल-हिल-हिल, जिस्म-ए-मुजस्सम मसाला पीसने में लगा है और दिल, कमबख़्त दिल! सर्कस, सियाह घोड़ी। घोड़ी की मोहब्बत भरी निगाहें। उसकी ख़मीदा (झुकी हुई) गर्दन, उसका ख़ुशनुमा माथा। उसका सर घुमा के देखना, उसका उससे मिलना, उसको घास-दाना देना। उसकी दौड़, उसकी सवारी, उस पर करतब, हज़ारों आदमियों का हैरत से देखना, वह तालियाँ… वह तालियाँ…
जब दुनिया तकती थी, दुनिया हैरत करती थी, यही वह ज़िंदगी, यही ज़िंदगी की मेराज (शिखर) था। लेकिन यह सब न आँखें देख सकीं न कान सुन सके, लोगों से निहाँ (छुपा), दुनिया से पिन्हाँ (ग़ायब), गीली गाद लकड़ियों के धुएँ में फूँकते हुए, काली चिकनी हंडियों को सरसराते जाड़ों की रातों में माँझते हुए, न मिटने वाली और न हटने वाली याद, बेज़ुबान को सताती थी। जाड़ों में किट-किट काँपते हुए, गर्मी में पसीने से शराबोर हाँपते हुए, बरसों बाद गूँगी ने वही गुज़रे हुए दिन याद किए, पर क़िस्मत ने किसी पहलू कोई पलटा न खाया और ज़माना पलटा भी तो क्या पलटा। न माँ न बाप थे, न भाई-बहन, न रिश्तेदार थे, न मिलने वाले, शौहर नहीं, औलाद नहीं, उसकी ज़िंदगी में कोई तग़य्युर (बदलाव) हो ही कैसे सकता था, उम्मीद भी क्या होती, तमन्ना क्या होती, बे-आसरा, बे-आरज़ू दिन कटते गए।
नवाब महमूद अली ख़ान ने चीख़-चिल्ला के नदामत और ख़जालत का ग़ुस्सा नौकरों पर उतार के लड़की को काले ख़ाँ बावर्ची के सुपुर्द कर दिया था और हिदायत कर दी थी कि घर से बाहर न निकलने दें। नवाब साहब के मुलाज़िम बक़द्र-ए-हैसियत ख़ुद भी आक़ा के क़दम-ब-क़दम चलते थे, ज़्यादा नहीं तो घर में दो ही बीवियाँ थीं, लड़की थी कम-उम्र, उन दोनों ने इस ख़याल से कि कहीं सौतन बन कर न खड़ी हो ख़ूब ही दुर्गत बनाई। चढ़े शबाब में लड़की उनके हवाले की गई थी, सुघड़ बीवियों ने सलीक़े से शबाब को बुढ़ापे में बदलना शुरू कर दिया। चंद साल में लड़की से बुढ़िया हो गई। जूते खाते, ख़िदमत करते पन्द्रह बरस गुज़र गए।
हम रोज़ देखते हैं कि सुबह को हल्की रोशनी में हर चीज़ ख़ुशहाल, तरो-ताज़ा, शादाब होती है, भीगी-भीगी ठंडी हवा के झोंके चलते हैं, चिड़ियाँ चहचहाती हैं, फूल मुस्कुराते हैं, सब्ज़ा लहलहाता है और फिर चंद ही घंटे बाद चौंधियाती धूप में हर चीज़ दमकती है, झुलसती है, हवाएँ गर्म और ख़ाक-आलूदा हो जाती हैं। चिड़ियाँ इधर-उधर छुप जाती हैं। फूल निढाल होकर कुम्हलाते और गिरते हैं, हरियाली पर धूप पड़ती है, ख़ाक उड़ती है, दिन-रात यही क़ुदरत के पलटे हैं, फिर कौन सी हैरत की बात है।
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सर्कस की वह तन्दुरुस्त, सियाह चिकनी, शोख़ घोड़ी, कानपुर में नीलाम होने के चंद दिन बाद यक्के में जुतने वाली घुड़िया हो गई। अपनी पीठ पर किसी को न बैठने दिया तो क्या? खड़खड़ाता भारी यक्का दुम के पीछे लग गया। अब टख़-टख़ घुड़िया, सटासट चाबुक, दिन भर शहर की गलियाँ और स्टेशन के फेरे होने लगे। दिन भर की थकी शाम को घर आई, ढेर सी भुस-मिलाई हुई थोड़ा दाना, थोड़ी घास मिली। रात भर मच्छरों ने काटा। सुबह हुई फिर चल दी शहर भर की ख़ाक छानने। न शबाब रुका, न जवानी ही आई। इस मार और मेहनत से दोनों ही भाग गए।
बछड़ी से यक्के की घड़िया हो गई। स्टेशन पर जुती खड़ी ऊँघ रही है। मज़दूरी मिल गई, सामान रखा गया, सवारियाँ बैठ गईं तो यक्के वाले ने रास को दो झटके दिए, चाबुक चलाया। टख़-टख़ की, घुड़िया ने दुम हिलाई, सर ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे हिलाया और फिर मुंडिया नीचे। ग़ोते में खड़ी हो गई, “ओ घोड़ी, ओ घोड़ी तेरा सत्यानाश हो चल, टख़-टख़, टख़-टख़।” सट चाबुक… सट चाबुक। घुड़िया ने फिर दुम हिलाई, सर हिलाया, दुम हिलाई, सर हिलाया और खड़ी है। फिर रास को करारे झटके दिए गए, “ओ घोड़ी, ओ घोड़ी चल तेरा सत्यानाश लगे, टख़-टख़, टख़-टख़।” अब पैरों से ज़्यादा सर को ऊपर-नीचे हिलाती ठुमक-ठुमक घोड़ी चल पड़ी तो और सटासट चाबुक पड़ने लगे, “चल ओ घोड़ी चल, चल, चल। ओ घोड़ी, ओ घोड़ी तेरा नास हो, टख़-टख़, टख़-टख़।”
इसी टख़-टख़ में घोड़ी की उम्र कट गई। पन्द्रह बरस हो गए, बूढ़ी हो गई। पैर काँपने लगे, रास्ता चलना दुश्वार हो गया। एक रोज़ हस्ब-ए-मअमूल (आदतन) घुड़िया यक्का खींचती ठुमक ठुमक चली जा रही थी। बाज़ार में एक जगह उसे रोका गया, रुक गई, मुंडिया नीची कर खड़ी हो गई। यक्के पर परदे पड़े थे, उसमें दो ज़नानी सवारियाँ थीं। एक मर्द साथ था, मर्द वही काले ख़ाँ बावर्ची थे। सवारियों में एक बीवी, दूसरी गूँगी मामा थी। काले ख़ान ने एक दुकान पर से ज़नाने गुरगाबी जूते ला कर परदे के अन्दर सर डाल कर बीवी को दिखाए, उनमें से दो पसंद आए, पहन कर देखे, फिर उन दो में से एक लेने को बता दिया। जूते लेकर फिर दुकान की तरफ़ चले, बीवी की नीयत इस जोड़े से उस जोड़े पर डाँवाडोल हुई। अब क्या करती, गूँगी को इशारा किया—बुला मियाँ को बुला। वह बेचारी अपनी ज़ुबान में चिल्लाई, “आवाओआ… वा… आवा!”
उदास और मुरझाई हुई बूढ़ी घोड़ी ने बरसों-बरस के बाद फिर वही आवाज़ सुनी। वही आवाज़ जो मोहब्बत का पैग़ाम थी। वह आवाज़ जिससे ज़िंदगी की पुर-मुसर्रत गुज़री हुई घड़ियाँ वाबस्ता थीं। यकायक यह आवाज़ जो आई, घोड़ी चौंकी, दोनों कान पीछे दबा ख़ामोश खड़ी हो गई। बाज़ार की चीख़-ओ-पुकार में मियाँ ने आवाज़ न सुनी इसलिए गूँगी ने फिर वही आवाज़ निकाली। घोड़ी ने कान आगे-पीछे हिलाते हुए फिर उस आवाज़ को सुना…
दुनिया की तमाम आवाज़ों में यही एक आवाज़ थी जो उससे तअल्लुक़ रखती थी। बरसों-बरसों से इसके लिए कान तरस रहे थे, बरसों-बरसों से इस आवाज़ के सुनने से ना-उम्मीद हो चुकी थी। “यह आवाज़, यह आवाज़। लड़की आ गई। मिल गई। कहाँ है? चली जाएगी। फिर न मिलेगी। क्या करूँ।” ग़ालिबन कुछ इसी क़िस्म के ख़याल घोड़ी के दिमाग़ में आए होंगे। या जो कुछ भी, लेकिन यह वाक़िया है कि दोबारा जो घोड़ी ने इस आवाज़ को सुना तो फिर यह मालूम हुआ कि उस मरियल घोड़ी में किसी ने बिजली भर दी। उसने एक दफ़ा हिनहिनाने की तड़प मारी, जाल में फँसे हुए जंगली हिरन की तरह वह तड़पी और फड़की।
देखते-देखते साज़ के टुकड़े-टुकड़े हो गए। घोड़ी आज़ाद बमों से निकल यक्के के चारों तरफ़ फिरने लगी। वह रुकती-भागती, कभी अलिफ़ (सीधी खड़ी) होती, कभी दुलत्तियाँ चलाने लगती, कान सुकेड़े, दाँत निकाले यक्के के गिर्द घूमने लगी। चारों तरफ़ सैकड़ों आदमी जमा हो गए थे लेकिन ख़ौफ़ज़दा, भागने के वास्ते तैयार, दूर ही से तमाशा देख रहे थे। उन्हीं में यक्के वाला और मियाँ काले ख़ाँ बावर्ची भी शामिल थे जो कि फ़ासले ही से नुमायाँ उछल-कूद और बुलंद तर चीख़ों से अपनी वाबस्तगी उस ग़िलाफ़-पोश यक्के से ज़ाहिर कर रहे थे जो कि अब टेढ़ा बमों को लटकाए झुकी हुई सी हालत में ख़ामोश खड़ा था और उसके इर्द-गिर्द ख़ौफ़नाक वहशी काली घोड़ी इस इरादे से चक्कर लगा रही थी कि अगर कोई पास आया तो जान ही ले लूँगी और सफ़ेद परदे का यक्का बीच में अजीब मज़लूमियत से ख़ामोश टेढ़ा झुका खड़ा था। दरास्ल यह मालूम हो रहा था कि दुआ माँग रहा है। उसके परदों के अन्दर भी बिल्कुल ख़ामोशी थी। बीवी डर के मारे बेहोश हो चुकी थी। गूँगी परदे का एक कोना हटाके यक्के के डंडे पकड़े ख़ामोश बैठी बाहर देख रही थी। आँखों से आँसू जारी थे, जो बराबर एक के बाद एक गालों पर से बह-बह कर टप-टप गिर रहे थे। उसके चारों तरफ़ दो हज़ार आदमियों का मजमा था और इर्द-गिर्द घोड़ी के वहशियाना करतब थे। उसने इस वक़्त फिर अपनी पुरानी दुनिया को ज़िंदा होते देखा। उसके मुर्दा पैरों में एक रूह सी दौड़ी। वह परदे हटा यक्के से कूद सड़क पर लम्हा भर खड़ी हुई और फिर हज़ारों हैरान आदमियों के सामने वह बदसूरत, लाग़र, अधेड़ उम्र की औरत घोड़ी की तरफ़ लपकी और उछल कर उसकी नंगी पीठ पर बैठ गई। इसके साथ ही घोड़ी भी जिधर उसका मुँह था उधर ही सीधी सरपट दौड़ी। लोगों की भीड़ काई की तरह फटती चली गई और घोड़ी तीर की तरह निकल, यह जा वह जा निकली चली गई।
बूढ़ी औरत को लिए बूढ़ी घोड़ी बेतहाशा भागी। चौराहों पर होती, जगह-जगह घूमती, बाज़ारों में कतराती भागती चली गई। मोहल्लों पर मोहल्ले गुज़र गए और वह भागती ही चलती चली गई। यहाँ तक कि शहर का किनारा भी आया और निकल गया। अब लम्बी सीधी कालपी रोड थी। उस पर भी वह दोनों मीलों चले गए। पाँच और दस और फिर पन्द्रह मील हो गए, तो फिर वह दोनों मिस्कीन बेज़ुबान मुसाफ़िर असली मंज़िल-ए-मक़सूद को पहुँच गए, जिधर हम सब दुनिया के मुसाफ़िर बढ़े चले जा रहे हैं। पन्द्रह मील के बाद बुड्ढी घोड़ी के पैर लड़खड़ाए। सरपट भागते में ठोकर खाई, मुँह के बल ज़मीन पर गिरी। उसका सर पाश-पाश हो गया। गूँगी औरत की भी हड्डी-मड्डी टूट गई जिसने कि घोड़ी से भी दस गज़ आगे पक्की सड़क पर पटख़नी खाई थी।
ऐ दोस्त! मायूस न हो, यही वह आख़िरी मंज़िल-ए-मक़सूद है जिसके हासिल करने के वास्ते ये दोनों जुदा-जुदा जी रहे थे। वरना और क्या था। किसका आसरा था, क्या हासिल करने की तमन्ना थी। शबाब लुट चुका था, जवानी उजड़ चुकी थी। बुढ़ापे में एक कहीं दूसरा कहीं। किसी न किसी तरह आदम की राह पर बढ़ चले। चंद मिनट की ही सही, आख़िर यकजाई फिर हुई। फिर वही शबाब का मश्ग़ला कुछ देर नसीब हुआ और यह ख़त्म भी न हुआ था कि ड्राप-सीन (drop scene) हुआ।
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सय्यद रफ़ीक़ हुसैन 1894 या 1895 में पैदा हुए और 1944 में उनका इन्तिक़ाल हुआ। तअल्लुक़ लखनऊ से था और 1944 में उनकी कहानियों का एक मजमूआ ‘आईना-ए-हैरत‘ के नाम से साक़ी बुक-डेपो, दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। रफ़ीक़ हुसैन की कहानियाँ उर्दू अफ़सानों में अपने नए पन और उस्लूब की वजह से बहुत बड़ा मक़ाम रखती हैं, ख़ास तौर पर बेज़ुबान जानवरों के जज़्बात को उनकी कहानियों में जो जगह दी गई है, उसने उन्हें और अहम बना दिया है। हाल ही में उर्दू के मारूफ़ स्कॉलर ‘अब्दुर रशीद साहब‘ ने उनकी कुछ ऐसी कहानियाँ ढूंढ कर ‘आईना-ए-हैरत‘ का एक नया एडिशन छापा, जिसमें उनकी वो कहानियाँ शामिल थीं, जो इससे पहले सामने नहीं आ सकी थीं। रफ़ीक़ हुसैन उर्दू अफ़साने की रिवायत में इतना नाम होते हुए भी लम्बे वक़्त तक पढ़ने वालों की वैसी तवज्जोह हासिल नहीं कर सके, जैसा उनका हक़ था। हिंदी में उनकी किसी भी कहानी के तर्जुमे का शायद ये पहला मौक़ा है।
इंसान हो या जानवर, मोहब्बत से ख़ाली नहीं होता। वह ज़िन्दगी में ख़ुद से मोहब्बत करने वाले की दर्दमंदी और इनायत को भूल नहीं सकता। ये अलग बात है कि कोई हादसा या दूसरे इंसानों की लालच या तरकीबों से उसे अपने महबूब से अलग होना पड़े, मगर उसकी ज़िन्दगी का मक़सद दोबारा अपने महबूब को हासिल करना, उसके साथ सुकून के कुछ पल गुज़ारना और ज़ुल्म और लालच में डूबी हुई दुनिया से हवा हो जाना होता है। ये बातें रफ़ीक़ हुसैन ने अपनी कहानी ‘बेज़ुबान‘ में कुछ इस तरह बयान की हैं कि ये क़िस्सा बेहद मायूस अंजाम के बावजूद उम्मीद और मोहब्बत की एक अनोखी कहानी की तरह दिल में महफ़ूज़ हो जाता है और उनके कहानी कहने का अंदाज़ कितना ख़ुश-रंग है, वह तो कहानी का पहला हिस्सा पढ़ते ही समझ में आ जाता है।