ये वाक़िआ है कि सदियों से दानिशवरों और अदीबों को समाज में वो हैसियत हासिल नहीं जो उनका हक़ है। हम सुनते हैं कि अह्द-ए-मलूकियत में आलिमों और शायरों को इनआम-ओ-इकराम से नवाज़ा जाता था मगर ये सब कुछ मराहिम-ए-ख़ुसरवाना के तौर पर होता था। इसे सिर्फ़ बख़्शिश-ओ-अता की सूरत हासिल होती थी न कि अदा-ए-हक़ की हैसियत।
हम अपना हक़ किसी से ब-क़ुव्वत न ले सके
जो कुछ यहाँ मिला ब-तरीक़-ए-अता मिला
रईस अमरोहवी
हमारे अदीबों और दानिशवरों के लिये तारीख़ का सबसे ज़ियादा ना-साज़गार दौर अंग्रेज़ों का दौर था। इस दौर में उन से जिस क़दर बे-नियाज़ी और बे-एतनाई बरती गई उसकी मिसाल नहीं मिल सकती। सौ साल की मुद्दत में कोई भी इस जिन्स-ए-नारवा का ख़रीदार न हुआ। आज़ादी से इस तबक़े को बड़ी उम्मीदें थीं लेकिन आज़ादी के बाद कोई एक उम्मीद भी पूरी न हुई।
अलबत्ता इस मुद्दत में अदीबों और शायरों की ख़िदमात ने समाज पर ये बात ज़रूर साबित कर दी कि उनकी भी एक ज़रूरत और क़ीमत है। उनके क़लम ने तहरीक-ए-आज़ादी के सिलसिले में तलवार से ज़ियादा काम किया था और आज इस हक़ीक़त से कोई एक फ़र्द भी इंकार नहीं कर सकता। हुसूल-ए-आज़ादी में सब से ज़ियादा हिस्सा अह्ल-ए-क़लम ही का था और वो भी उर्दू के अह्ल-ए-क़लम।
हमारा समाज चीज़ों की क़ीमत मुत्अय्यन करते वक़्त महज़ ख़ारजी पैमानों को मलहूज़ रखता है बल्कि आम तौर पर हर समाज का यही रुझान रहा है। लोग सिर्फ़ ये बात देखते हैं कि माद्दी फ़ायदा किस चीज़ में है। अलावा-अज़ीं वो तलब-ए-मन्फ़अत में इंतिहाई उजलत-पसंद वाक़े हुए हैं। भला शायराना तख़्ययुल और फ़लसफ़ियाना दानिश-पिज़ोही से उन्हें क्या हमदर्दी हो सकती है। अगर उनके बस में हो तो वो ग़ौर-ओ-फ़िक्र और तजस्सुस-ओ-तख़य्युल को जुर्म क़रार दे दें। एक ऐसा जुर्म जिस की सज़ा मौत है। ऐसा क्यूँ न हो जब कि फ़लसफ़ा-ओ-अदब समाज से अपना एहतिराम तो करा लेते हैं, मगर उसकी किसी ज़रूरत को पूरा करने के अहल साबित नहीं होते। इन्होंने आज तक न किसी मरीज़ का इलाज किया न किसी मुल्ज़िम की वकालत की बल्कि ख़ुद उनके लिये ज़ह्र का प्याला तजवीज़ कर दिया जाता है और वो ख़ामोश रहते हैं।
अह्द-ए-जदीद के सनअती और साइंसी इर्तिक़ा में भी समाज को ज़ाहिर-ब-ज़ाहिर फ़लसफ़ा-ओ-अदब का दख़्ल दिखाई नहीं देता न उन्होंने ईजादात की हैं और न इंकिशाफ़ात। हमें रोज़-मर्रा की ज़िंदगी में न किसी फ़लसफ़ी की ज़रूरत पेश आती है न किसी शायर की फिर समाज इनकी हैसियत को भला किस लिये तस्लीम करे।
मगर ये अंदाज़-ए-नज़र न सिर्फ़ ताजिराना और मुआमला-वराना है बल्कि मंतक़ी तौर पर ग़लत भी है अगर हर शय की आफ़ादियत को महज़ मन्फ़अत-पसंदी के साथ नापा गया तो फिर समाज का सारा निज़ाम तबाह हो जाएगा और दुनिया सिर्फ़ एक तिजारती मण्डी हो कर रह जाएगी। अगरचे इसके तिजारती मण्डी होने में अब भी कोई शुबा नहीं मगर चूँकि इस अंदाज़-ए-नज़र को अभी एक तयशुदा ज़ाब्ते की हैसियत हासिल नहीं इस लिये समाज में अभी तक बाज़ ज़हनी अक़दार का एहतिराम बाक़ी है।
इस अंदाज़-ए-नज़र की सब से ज़ियादा मायूस-कुन ख़राबी ये है कि इस में वाक़िआत-ओ-हालात के असबाब-ए-अव्वलिया को मलहूज़ नहीं रखा जाता। समाज इस अंदाज़-ए-नज़र के पेश-ए-नज़र माद्दी तरक़्क़ियों को मोजिज़े के तौर पर तस्लीम कर लेता है और उन मोअस्सरात-ओ-अवामिल को क़तअन नज़र-अंदाज़ कर देता है जिन पर उन की तमाम तरक़्क़ियों की इमारत बुलंद हुई है। जदीद सनअती और साइंसी अह्द की अगर तहलील की जाए तो हमें चंद मुफ़क्किरीन के नज़रियात और दानिशवरों के ख़यालात मिलेंगे, इन्हीं नज़रियात-ओ-ख़यालात पर माद्दी तरक़्क़ी का इनहिसार है।
इस तमाम बह्स से क़त्अ-नज़र हम ये कहेंगे कि माद्दी इर्तिक़ा ब-ज़ात-ए-ख़ुद कोई चीज़ नहीं, वो सिर्फ़ एक ज़रिया है, ज़हनी और रूहानी लज़्ज़तों के हुसूल का। इस सिलसिले में इंगलिस्तान के मशहूर इर्तियाबी दानिशवर डेविड ह्यूम ने बड़ी अच्छी बात कही है। वो कहते हैं-
“दानिश-ओ-हिकमत से तफ़क्कुर-ओ-तहक़ीक़ की तबई तिश्नगी बुझाने के अलावा फ़र्ज़ कर लीजिये कि अगर कोई और फ़ायदा न भी होता फिर भी ये उलूम-ओ-मआरिफ़ हक़ीर न थे, इस लिये कि इंसान को फ़ितरत की तरफ़ से जो चंद बे-ज़रर लज़्ज़तें और सआदतें वदीअत होती हैं उन में एक ये भी है कि वो अपने तफ़क्कुर-ओ-तजस्सुस की तसल्ली से लज़्ज़तयाब होता है। ज़िंदगी की सब से ज़ियादा ख़ुश-गवार और बे-ख़तर रहगुज़र दानिश-ओ-हिकमत ही के सायादार-ओ-सब्ज़-पोश दरख़्तों से हो कर गुज़री है। जो शख़्स इस रहगुज़र से कोई काँटा साफ़ करता है या इस की आराइश-ओ-ज़ेबाइश में कुछ इज़ाफ़ा करता है तो वो बिला शुबा नो-ए-बशर का मोहसिन है और अगरचे फ़लसफ़ियाना दिक़्क़त-पसंदी और कद-ओ-काविश अवाम-उन-नास पर बे-हद गिराँ गुज़रती है लेकिन ग़ैर मामूली ज़हानत-ओ-फ़तानत रखने वाले अफ़राद अपनी इस काविश से लुत्फ़ उठाते हैं। तीरगी ज़ेह्न के लिये भी इसी क़दर ईज़ा-रसाँ है जिस क़दर आँखों के लिये और तीरगी को रौशनी में बदलने के लिये ख़्वाह कितनी ही ज़हमत क्यूँ न बर्दाश्त करनी पड़े, वो हर हाल में लज़्ज़त-बख़्श और मसर्रत-आफ़रीन होती है।“
ब-हर-हाल समाज के सतही मज़ाक़ को किसी तरह भी ज़िंदगी के उमूर-ओ-मसाइल का मुतवल्ली और हकम नहीं बनाया जा सकता। इसे चीज़ों के बारे में फ़ैसले सादिर करने का कोई हक़ नहीं। ये दुनिया चंद इंसानियत-परस्त और मिसालियत-पसंद दानिशवरों की दुनिया है। ये कितनी अजीब बात है कि वो समाज के रहम-ओ-करम पर हों दराँ-हाले कि समाज सिर्फ़ उनकी हिफ़ाज़त के लिये वुजूद में आया है। अगर ज़मीर-ए-फ़ितरत और समाज के दरमियान कोई वास्ता है तो वो सिर्फ़ दानिशवर हैं। वो समाज जिस में दानिशवर मौजूद न हों वो जोश-ओ-बहाइम का समाज है। समाज के सामने सिर्फ़ वही मेआर होना चाहियें जो उन्होनें तजवीज़ कर दिये हैं, इस लिये कि बुलंदियों और पस्तियों के दरमियान अगर कोई मेआर मौजूद है तो वो सिर्फ़ उन्हीं का बख़्शा हुआ है।
मगर दानिशवर हैं कौन लोग?
क्या हमारे ज़माने के वो मसख़रे जिन का सब से ज़ियादा नुमायाँ वस्फ़ जहालत है और ख़ुद-नुमाई, जहालत और लाफ़ज़नी, लाफ़ज़नी और हेच-नवेसी, जिन के बारे में किसी दानिशवर ने कहा है था कि मेरी संजीदगी को इन मसख़रों से बचाओ! हमारे अह्द में दानिशवर, अदीब और शायर के मिसदाक़-ओ-मफ़हूम में जिस क़दर इनहितात वाक़े हुआ है उसकी मिसाल नहीं मिल सकती। आज हर वो शख़्स दानिशवर, शायर और नक़्क़ाद होने का मुद्दई है जो समाज का सब से नालायक़ फ़र्द हो। मशहूर तज़्किरा-निगार वाला दाग़िस्तानी ने अह्द-ए-सफ़वी से क़ब्ल की अदबी फ़ज़ा का जायज़ा लेते हुए अपनी तसनीफ़ रियाज़-उश-शोअरा में लिखा था कि-
“फ़न-ए-शाइरी कि फ़ज़ीलत-ए-उलूम रा लाज़िमा दाश्त, अज़ इल्म जुदा शुद दह्र-ए-बे-माया-ब-महज़
तबीय्यत-ए-मौज़ूं इरादा-ए-शायरी कर्द, रफ़्ता-रफ़्ता फ़न-ए-शायरी कि अलतफ़-ए-फ़ुनून बूद अज़-दर्जा-ए-ऐतबार उफ़्तादा-ब-मज़हका-अन्जामेद”
बिलकुल यही हाल आज भी है बल्कि इस से भी ज़ियादा बदतर। आज हर बे-माया सिर्फ़ मौज़ूनी-ए-तब्अ के सहारे मीर-ओ-ग़ालिब बना हुआ है। नतीजा ये है कि अब अदब-ओ-शेर का ज़रा भी ऐतबार-ओ-वक़ार बाक़ी न रहा और सक़ाफ़त के मोअज़्ज़ज़-तरीन शोबे मज़हका-ख़ेज़ बन कर रह गए हैं। हर पेशा कुछ न कुछ रियाज़ चाहता है यहाँ तक कि एक गदागर भी रियाज़त के बग़ैर अगर चाहे तो एक पैसा भी हासिल नहीं कर सकता लेकिन शायर, दानिशवर एक सत्र पढ़े बग़ैर आठ दीवानों का ख़ालिक़ और दस किताबों का मुसन्निफ़ हो सकता है , इसकी सब से नुमायाँ ख़ुसूसियत ये है कि ये उर्दू ज़बान का अह्ल-ए-क़लम है मगर इसे उर्दू ही नहीं आती, यहाँ तक कि बाज़ हालात में इसका इमला भी दुरुस्त नहीं होता।
ऐसे आलम में हम समाज के सामने क्या मुँह ले कर जाएँ उससे किस एहतिराम की तवक़्क़ो रखें। हम जानते हैं कि समाज में अगर किसी को किसी पर बरतरी हासिल है तो सिर्फ़ दानिशवर ही सब से ज़ियादा बुलंद मर्तबा क़रार पाएँगे मगर क्या हमने दानिशवरी की किसी एक शर्त को भी पूरा किया है? हमें इस तमाम बहस के बाद अपने दानिशवरों से सिर्फ़ यही सवाल करना है और बस।
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