तितलियाँ ढूंढने वाली

नर्जिस ने सफ़ेद सर वाली अम्माँ को देखा जो सलाख़-दार दरवाज़े के दूसरी तरफ़ बैठी थीं और जिनकी आँखों से आंसुओं की झड़ी लगी हुई थी। भैया सर झुकाए हुए था। उसका चेहरा नर्जिस को नज़र नहीं आ रहा था।

मेहदी ताली बजा कर ज़ोर से हंसा फिर उसने सलाख़ों के दरमियान से अपने दोनों हाथ बाहर निकाल दिए। ‘मम्मा, मेरी टॉफ़ी!’ वह चहका। तब भैया ने अपना झुका हुआ सर उठाया और मेहदी के दोनों हाथ थाम लिए। नमकीन पानी के क़तरे मेहदी के गर्द-आलूद हाथों को धोने की नाकाम कोशिश करने लगे।

नर्जिस ने दूसरे अच्छे बुरे मंज़रों की तरह इस मंज़र को भी अपने अंदर रख लिया। उसके दिल को तसल्ली हुई। अम्माँ नहीं रहेंगी, तब भी मेहदी के सर पर हाथ रखने वाला तो रहेगा। भैया उसे जी जान से चाहता था। वह यक़ीनन मेहदी को बहुत अज़ीज़ रखेगा। भैया ने रहम की अपील पर दस्तख़त करवाने के लिए उससे कैसी कैसी मिन्नतें न की थीं, लेकिन नर्जिस के लिए बस यही मुमकिन न था। अपील का वक़्त गुज़र गया था और अब वह मौत के सामने खड़ी थी।

अम्माँ उसका हाथ यूँ थामे हुए थीं जैसे तैरने वाले डूबने वाले को थामते हैं। उस लम्स में बे-बसी थी, जुदाई थी, बे-पायाँ इस्म था। ये लम्स बाहर की दुनिया से उसका आख़री राब्ता था। वह दुनिया जो हुस्न और बदसूरती से, अच्छों और बुरों से, मोहब्बत से भरी हुई थी।

मेहदी खिलखिलाता रहा….भैया से बातें करता रहा। कभी दो सलाख़ों के दरमियान से अपना नन्हा सा चेहरा आगे निकाल कर ममता का चेहरा चूमता और कभी हाथ बढ़ा कर नन्ना के सफ़ेद बालों से उलझता रहा।

‘अम्माँ इसी बात पर ख़ुश हो लें कि मेहदी अब आज़ाद हो जाएगा। उसने सलाख़ों, हथकड़ियों, ज़ंजीरों और संगीनों के सिवा देखा भी क्या है। वह यहीं पैदा हुआ, यही बैरकें उसकी कुल कायनात हैं। अब वह स्कूल जाएगा, बाज़ार जाएगा, बाग़ में खेलेगा, भैया उसे झूले पर ज़रूर बिठाना।’

‘आपा! तुम्हें ख़ुदा रसूल का वास्ता, चुप रहो।’ भैया बिलकने लगा और वह ख़ामोश हो गई। वह अम्माँ की और भैया की तकलीफ़, उनका अज़ाब समझती थी, लेकिन उन्हें ये नहीं समझा सकती थी कि कभी इंसान अपने लिए मौत का चुनाव करता है ताकि दूसरे ज़िंदा रहें। मौत के प्याले में जब तक ज़िन्दगी के सिक्के न डाले जाएं, आदर्श हाथ नहीं आते।

वह और हुसैन एक साथ ही गिरफ़्तार हुए थे। फिर इत्तेला आई कि तफ़्तीश के दौरान हुसैन ने ख़ुदकुशी कर ली। नर्जिस जानती थी कि वह क़ैदी जो फ़ौजी हिरासत में मारपीट न सह पाने की वजह से मर जाए, उसकी मौत को क़ातिल ‘ख़ुदकुशी’ का ही नाम देते हैं। हुसैन पर से उसका ईमान एक लम्हे के लिए डगमगाया नहीं था। वह उसकी तरह ज़मीर का क़ैदी था और ज़मीर के क़ैदी ख़ुदकुशी नहीं करते, रहम की दरख़्वास्त नहीं करते।

आख़री मुलाक़ात का वक़्त ख़त्म हुआ तो अम्माँ ग़श खा गईं। भैया सलाख़ों से लिपट गया। वह उसके हाथों को प्यार कर रहा था, उसके बालों को छू रहा था। फिर वह लोग चले गए। नहीं, वह लोग गए नहीं, ले जाए गए। नर्जिस का कैसा जी चाहा था कि एक बार, आख़री बार भैया को सीने से लगा ले लेकिन ये मुमकिन न था। जेल के आदाब इंसानों ने बनाए थे। उनसे इंसानी रिश्तों और जज़्बों का ख़याल बेमानी था।

मम्मा चला गया, मेहदी बिलकने लगा। वह वहां जाना चाहता था जहाँ की कहानियाँ अम्मी ने सुनाई थीं लेकिन अम्मी तो उसे कहीं भी नहीं जाने देती थीं।

‘कल चले जाना। मम्मा तुम्हें कल ले जाएंगे।’ नर्जिस मेहदी के गाल चूमने लगी।

वार्डन मरियम ने माँ और बेटे पर एक नज़र डाली और सर झुका लिया। ये कैसी औरत थी जिसने मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ रहम की अपील नहीं की थी। जिसने फांसी घर पहुँच कर एक आंसू नहीं बहाया था, चीख़ें नहीं मारी थीं। ख़ुदा से लेकर जेलर तक किसी को भी गालियाँ नहीं दी थीं।

ये अजीब औरत थी कि जब इसे क़ुरआन दिया गया तो इसने उसे आँखों से लगा कर एक तरफ़ रख दिया और अपने बेटे को चूमती रही। मौलवी साहब ने आकर इसे नमाज़ पढ़ने की, ख़ुदा की बारगाह में तोबा, अस्तग़फ़ार करने की हिदायत की तो मुस्कुराती रही। मौलवी साहब के जाने के बाद इस ने जानमाज़ अपने तकिये के नीचे रख दी। फिर तकिये पर सर रख कर लेट गई और अपने बेटे को कहानियाँ सुनाने लगी।

ज़नाना वार्ड कैसी कैसी औरतों से भरा हुआ था, लेकिन नर्जिस उन सब को अपने आप में से नहीं लगती थी। पिछले चार बरसों में इन बुरी औरतों ने उसे बहुत अच्छी तरह रखा था। उसका एहतिराम करती थीं, उससे ख़ौफ़ खाती थीं। उनकी समझ में नहीं आता था कि जब उसने किसी की नाक, चुटिया नहीं काटी, किसी के मवेशी नहीं चुराए, कच्ची शराब और चरस नहीं बेची, किसी को क़त्ल नहीं किया तो फिर उसे किन गुनाहों की इतनी बड़ी सज़ा मिली है।

‘बीबी, तुम्हें डर नहीं लगता?’ फांसी घाट पहुँचने के कुछ दिन बाद वार्डन मरियम ने उससे पूछा था।

‘किस बात से डर?’ नर्जिस के लहजे में सुकून था।

‘मौत से।’

‘नहीं, मौत पर जब अपना इख़्तियार हो तो उससे डर नहीं लगता। फिर मेहदी भी तो है। वह मेरे बाद रहेगा और मैं उसमें रहूंगी। फिर जब वह चला जाएगा तो मैं उसके बच्चों में ज़िंदा रहूंगी।’

मरियम ने उसके बाद नर्जिस से कोई सवाल नहीं किया था। हाँ बैरकों में ये बात ज़रूर घूम गई थी कि फांसी घर में जो बीबी बंद है, वह बहुत पहुंची हुई है। उसे बशारत हुई है कि वह अपने बाद भी रहेगी, हाथी के कलेजे वाली है।

नर्जिस ने महसूस किया था कि उसके सामने पहुँच कर लेडी वार्डनों की निगाहें झुक जाती हैं। सुपरिंटेंडेंट जेल को उसकी कोठरी से जाने की जल्दी होती है और सुब्ह-ओ-शाम जब वह अपनी कोठरी से बाहर निकाली जाती है तो हर तरफ़ सन्नाटा छा जाता है। लड़ती हुई, शोर मचाती हुई औरतें ख़ामोश हो जाती हैं और सलाख़-दार दरवाज़ों के पीछे से उसे यूँ देखती हैं जैसे वह उनमें से नहीं है कहीं और से आई है।

वह खाना, वह आख़री खाना किस एहतिमाम से आया था। The Last Supper, उसे बड़े आर्टिस्टों की तसवीरें याद आईं। मेहदी उस खाने को देख कर किस क़दर ख़ुश हुआ था। ‘आज खाना बहुत मजे का है अम्मी।’ उसने माँ के गले में बाहें डाल दी थीं।

‘हाँ, मेरी जान! सच कहते हो।’ नर्जिस ने उसे निवाला बना कर देते हुए निगाहें झुका ली थीं ताकि मेहदी उन आंसुओं को न देख सके जो पलकों की चिलमन से लगे बैठे थे।

फिर रात हो गई। मेहदी ऊँघने लगा, लेकिन नर्जिस उससे जी भर कर बातें करना चाहती थी। उसकी आवाज़ सुनना चाहती थी, वह उसे देर तक जगाना चाहती थी ताकि वह लोग पौ फटने से पहले जब उसे लेने आएं तो वह मीठी नींद सो रहा हो।

नर्जिस ने उसकी रौशन आँखों को देखा, उसके ख़ूबसूरत माथे को देखा, ये हुसैन की आँखें थीं, ये हुसैन का माथा था। उस बदन से हुसैन की ख़ुशबू फूटती थी। हुस्न की , ज़िन्दगी की, उम्मीद की ख़ुशबू। हुसैन अब जबकि तुम कहीं नहीं हो तो क्या अब भी तुम कहीं रहते हो? ज़मीन और आसमान के दरमियान, उसके लहू में भंवर पड़ने लगे। उसने मेहदी को अपने सीने में समेट लिया।

‘बहुत जोर की नींद आ रही है अम्मी।’ मेहदी ने फ़रियाद की।

‘मेरी जान, बस अभी कुछ देर में सो जाना, मुझसे थोड़ी सी बातें और कर लो।’ नर्जिस की आवाज़ लरज़ने लगी। ‘कल सुबह तुम्हें मम्मा अपने घर ले जाएंगे। वह तुम्हें कहानियाँ सुनाएंगे, बाज़ार लेकर जाएंगे, जाओगे ना?’

‘सच अम्मी? हमारे साथ आप भी बजार चलेंगी ना?’ मेहदी नींद को भूल कर उठ बैठा।

‘मैं तुम्हारे साथ नहीं जाउंगी बेटे।’

‘तो क्या आप इसी घर में रहेंगी?’

‘नहीं बेटे! मैं तुम्हारे लिए तितलियाँ ढूंढने जाउंगी।’

राहदारी में आहट हुई, नर्जिस ने सर उठा कर देखा। वार्डन मरियम सलाख़ें थामे उन दोनों को देख रही थी।

‘अम्मी कल तितलियाँ ढूंढने जाएंगी।’ मेहदी ने ख़ुश हो कर मरियम को बताया। उसने तितलियाँ नहीं देखी थीं लेकिन अम्मी ने उसे तितलियों की बहुत सी कहानियाँ सुनाई थीं।

‘हाँ राजा। अम्मी से ख़ूब बातें कर लो, ख़ूब प्यार कर लो।’ मरियम की आवाज़ टूटने लगी और वह जल्दी से मुड़ गई।

‘आप शाम तक तो आ जाएंगी ना?’

‘नहीं मेहदी, तितलियाँ बहुत तेज़ उड़ती हैं, मैं उन्हें ढूंढने निकलूंगी तो बहुत दूर चली जाउंगी।’

‘आप कौनसी तितली ढूंढेंगी?’

नर्जिस एक लम्हे के लिए रुकी। ‘आज़ादी की तितली मेरी जान।’ उसने बेटे के बाल चूम लिए।

‘वह किस रंग की होती है?’

‘उसमें धनक के सातों रंग होते हैं।’

‘धनक कैसी होती है?’

‘इस बार जब बरसात हो तो मम्मा से कहना वह तुम्हें धनक दिखा देंगे।’

‘फिर मैं भी धनक तितलियाँ ढूंढूँगा।’

‘नहीं मेरी जान, धनक तितलियाँ अपने आप तुम्हारे पास आ जाएंगी। हम इसी लिए तो उन्हें ढूंढने निकले हैं ताकि तुम्हें हमारी तरह सफ़र न करना पड़े।’ नर्जिस का बदन कांपने लगा। वह दीवानावार उसकी बेदाग़ गर्दन चूमने लगी। इस एक हफ़्ते के दौरान उसकी आँखों से पहली बार आंसू गिर रहे थे।

मेहदी सो गया तो नर्जिस ने उसे उठा कर अपने सीने पर लिटा लिया। मेहदी के वुजूद में उम्मीद का पौधा नुमू पा रहा था और इसी उम्मीद ने उसके सीने में हौसले के पहाड़ रख दिए थे। उसे आने वाले ज़मानों में ज़िंदा रहने की बशारत दी थी।

आस पास की बैरकों से आयतें पढ़ने और कलमा दोहराने की आवाज़ें आने लगीं। कोई औरत बड़ी ख़ुश-अल्हानी से सूरा-ए-रहमान की तिलावत कर रही थी। सबको मालूम था कि आज बीबी रुख़सत होने वाली है और ये उसी की रुख़सत की तैयारियां थीं।

उसके सीने में किसी ने बरछी मारी। भैया जेल के सद्र-दरवाज़े के सामने ख़ाक पर बैठा होगा। उसने जब शुमारयात (Statistics) में एम.एस. किया था तो उसके गुमान में भी न होगा कि कभी वह आपा की ज़िन्दगी के लम्हों को भी गिनेगा और बिलकुल तनहा होगा।

चेहरे उसकी आँखों के सामने चक-फेरियां खाने लगे। मेहरबान और ना-मेहरबान चेहरे। अजनबी और आशना आवाज़ें। नर्जिस को उन आवाज़ों पर बे-साख़्ता प्यार आया जो उसका आख़री सफ़र आसान करने के लिए अपनी नीन्दें क़ुर्बान कर रही थीं। एक हफ़्ते पहले तक वह उन आवाज़ों के साथ थी लेकिन ये आवाज़ें उसे ज़रा भी नहीं समझती थीं, उसके बारे में कुछ भी तो नहीं जानती थीं।

जिस दिन रहम की अपील की मुद्दत ख़त्म हुई और ख़बर आई कि सुपरिंटेंडेंट और डिप्टी सुपरिंटेंडेंट जेल उसे बैरक से फांसी-घर ले जाने के लिए आ रहे हैं तो हर तरफ़ सन्नाटा था। वह और मेहदी बैरक से रुख़सत हुए तो उसने कुछ औरतों को चुपके चुपके आंसू पोंछते और चेहरे झुकाते देखा। ये वह औरतें थीं जो छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे को गालियाँ देती थीं। गरेबान तार तार करती थीं और जिन्हें अलग करने के लिए मेट्रन और वार्डन को छड़ी का आज़ादाना इस्तेमाल करना पड़ता था।

नर्जिस को नींद का झोंका छू कर गुज़रा। उसका दिल ऐंठने लगा। मेहदी का दिल उसके साथ धड़क रहा था। उस नन्हे से दिल का धड़कते रहना ही मौत के सामने उसकी सबसे बड़ी जीत थी। वह अपने बाद भी रहेगी। लेकिन रूह क्या थी और अगर थी तो बदन से निकल कर कहाँ रहती थी? हुसैन कहाँ था? कहीं भी नहीं। सब कुछ फ़ना हो गया था। फ़ना का मतलब क्या है? वैसे तो उसे मालूम था, मगर उसका अहसास अब होने ही वाला था।

‘बीबी।’ मरियम ने सलाख़ों के पास आकर धीरे से आवाज़ दी।

‘हाँ मरियम?’

‘राजा को बिस्तर पर लिटा दो बीबी। वह लोग आ रहे हैं।’ मरियम की आवाज़ टूटने लगी।

एक लम्हे के लिए नर्जिस को ज़मीन हिलती हुई महसूस हुई। फिर संभल कर उसने करवट ली और सीने से लिपटे हुए मेहदी को बिस्तर पर लिटा दिया। इसे भला मेरी सूरत क्या याद रहेगी। इसके लिए तो मैं महज़ एक नाम, एक ख़याल रहूंगी।

‘सारी ख़ताएँ माफ़ करदेना बीबी, हम रोटी इसी की खाते हैं, पेट बड़ा बदकार है बीबी।’ मरियम सलाख़ों से सर टिका कर बिलकने लगी। नर्जिस ने चारपाई से उतर कर दोनों हाथ सलाख़ों से बाहर निकाले और मरियम का कन्धा थपथपया। उसने सर उठा कर लबरेज़ आँखें साफ़ कीं और अटेन्शन खड़ी हो गई।

मरियम ने ताले में चाबी घुमाई और फिर जिस क़दर आहिस्तगी से मुमकिन था, दरवाज़ा खोल दिया। लोहे के दरवाज़े को सुपरिंटेंडेंट जेल ने धक्का दिया तो दीवार से टकरा कर आवाज़ हुई।

‘साहब जी, बच्चा सो रहा है। जाग न जाए।’ वार्डन ने अपनी हद से आगे निकल कर आने वालों को याद दिलाया।

‘अच्छा बक बक मत करो, बड़ी आई बच्चे की सगी।’ सुपरिंटेंडेंट ने उसको तेज़ आवाज़ में झिड़का।

‘Sir! I request you not to talk loudly.’

नौजवान मजिस्ट्रेट ने एक नज़र सोए हुए मेहदी पर डाली और पसीना पोंछते हुए कहा।

सुपरिंटेंडेंट के माथे पर बल पड़ गए। ये नौजवान अफ़सर अपने आपको जाने क्या समझते हैं। उसका मुंह कड़वा हो गया। फिर उसने ख़ुद पर क़ाबू पाते हुए ज़ाब्ते की कार्रवाई शुरू कर दी। उसने पहले नर्जिस को शनाख़्त किया, फिर एक काग़ज़ खोल कर दफ़्तरी लहजे में उसकी इबारत बुलंद आवाज़ में पढ़ने लगा। ये काग़ज़ बिस्मिल्लाह से शुरू हो कर इस बात पर ख़त्म हुआ, ‘मुजरिमा के गले में फांसी का फंदा उस वक़्त तक पड़ा रहे जब तक कि उसका दम न निकल जाए।’

मेडिकल अफ़सर ने आगे बढ़ कर नब्ज़ देखी, दिल की धड़कन सुनी और आहिस्ता से सर हिला दिया। डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ने उससे कुछ काग़ज़ों पर दस्तख़त करवाए। नौजवान मजिस्ट्रेट ने उन दस्तख़तों की तस्दीक़ की और सुपरिंटेंडेंट कोठरी से निकल गया।

डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ने वार्डन मरियम को इशारा किया। वह अंदर आई। उसका चेहरा जैसे कांसे में ढल गया था। निगाहें झुकी हुई थीं। वह नर्जिस के दोनों हाथ बाँध कर पीठ पर ले गई और उन्हें चमड़े के तस्मे से बाँधने लगी। नर्जिस ने उसकी उँगलियों की कपकपाहट और नरमी को महसूस किया। वह तनहा नहीं थी। बाहर बहुत से लोग थे, अंदर भी बहुत से लोग थे। तमाम बैरकों पर उस वक़्त राइफ़ल-बरदार सिपाहियों का पहरा होगा। सद्र-दरवाज़े पर बारह वार्डनों की एक पल्टन तैनात हो चुकी होगी। उन सबकी राइफ़लों में दस दस गोलियाँ होंगी और वहीं सामने ख़ाक पर भैया बैठा होगा।

मेहदी का चेहरा उसकी निगाहों के सामने था। वह उसे एक टक देख रही थी। मेट्रन के इशारे पर मरियम ने उसका बाज़ू थामा। ‘चलो बीबी!’

वह एक क़दम बढ़ी, फिर पलट कर उसने मेहदी को देखा। वह कुलबुला रहा था। सिसकियाँ ले रहा था। शायद कोई डरावना ख़्वाब देख रहा है। नर्जिस का दिल किसी ने मुठ्ठी में जकड़ लिया। आँखों की देहलीज़ तक आने वाले आंसुओं को उसने ज़बरदस्ती पीछे धकेला। वह उन लोगों के सामने थी जिन्होंने उसके और उस जैसे दूसरों के हौसलों को शिकस्त देने की तमाम कोशिशें की थीं, लेकिन वह उनसे हारी नहीं थी तो अब आख़री लम्हों में उन्हें जीत के मज़े से क्यों आशना करवाए?

नौजवान मजिस्ट्रेट की निगाहों ने उसकी निगाहों का पीछा किया। ‘बच्चा कहाँ रहेगा?’ उसने मेट्रन से पूछा।

नर्जिस के सीने पर घूँसा लगा। भैया को उसने किस इम्तिहान में डाल दिया था।

मजिस्ट्रेट की पेशानी पर शिकन थी। उसने नर्जिस पर एक गहरी नज़र डाली, फिर राहदारी में खड़ी हुई एक वार्डन को आवाज़ दी।

‘जी साहब!’ वार्डन अंदर आ गई।

‘बच्चे को गोद में उठा लो। ज़रा एहतियात से।’

‘साहब जी! मैं उठा लूँ?’ मरियम ने इल्तिजा की।

‘चलो तुम ही सही, इस बीबी के साथ लेकर चलो।’

‘लेकिन ये तो जेल मेनुअल के….’ डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ने दख़्ल देना चाहा।

‘To hell with the jail manual.’

नौजवान मजिस्ट्रेट ने कहा और तेज़ क़दमों से बाहर निकल गया। मरियम ने आगे बढ़ कर मेहदी को उठाया और सीने से लगा लिया। वह कुलबुलाया और फिर गहरी नींद में चला गया।

डिप्टी सुपरिंटेंडेंट की सरबराही में क़ाफ़ला आगे बढ़ा। दो सिपाही आगे चल रहे थे और दो पीछे। दरमियान में वह थी और उसके दाएं मरियम और बाएं दूसरी वार्डन चल रही थी। चलते हुए नर्जिस की निगाहें मेहदी पर जमी हुई थीं।

बाहर मई के महीने की रात में पौ फटने से पहले की ख़ुशगवार ख़ुनकी रची हुई थी। डूबते हुए चाँद की रौशनी में उसने फांसी के तख़्ते को देखा। सीढ़ियाँ उसे नज़र आ रही थीं। मौत पाताल में उतरने का नाम है। इस पाताल में उतरने के लिए सीढ़ियाँ क्यों चढ़नी पड़ती हैं? उसे जल्लाद नज़र आया। आज उसके बच्चे कितने ख़ुश होंगे। बाप को आज फांसी भत्ता मिलेगा। दस रूपए, दस रूपए तो बहुत होते हैं। इन रुपयों से कई चीज़ें ख़रीदी जा सकती हैं। नर्जिस का ज़हन भटक रहा था। लेकिन उसके पैरों में कोई कपकपाहट नहीं थीं। अचानक वह रुक गई। ‘मरियम।’ उसकी आवाज़ सन्नाटे में बिजली की तरह चमकी।

‘हुक्म बीबी।’ वार्डन मरियम की आवाज़ आंसुओं से भीगी हुई थी। जाने कौन हाकिम था और कौन महकूम। उसने मरियम को क़रीब आने का इशारा किया। मरियम उसके सामने झुक गई। पीठ पर बंधे हुए नर्जिस के दोनों हाथ मेहदी को छूने के लिए फड़के फिर अपनी जगह जम गए। मेहदी नींद में हंस रहा था। शायद परियों से खेल रहा था। नर्जिस ने धुंधलाई हुई आँखों से ज़िन्दगी को देखा फिर आहिस्ता से झुक कर उसका माथा चूमा। गाल चूमे, ज़िन्दगी ज़िन्दगी से रुख़सत हो रही थी।

वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। फांसी के तख़्ते पर पहुंची तो सरकारी जल्लाद उसके क़दमों में झुका और तस्मे से पैर बाँधने लगा। नर्जिस ने ओझल होते मंज़र पर एक नज़र डाली फिर उसे भी अपने अंदर रख लिया। उसकी आँखें बंद थीं और मंज़र उसके अंदर था। वह जानती थी कि चाँद डूब रहा है। सुबह का सितारा निकल आया है। मेहदी परियों से खेल रहा है। सूरज निकलने ही वाला है और अल्लाह के बरकत वाले नाम से शुरू होने वाले हुक्मनामे पर अमल होने का वक़्त आ पहुंचा है।

***

 

ज़ाहिदा हिना के नाम को किसी तआर्रुफ़ की ज़रूरत नहीं है। उनका काम हिंदी वालों के बीच भी गाहे गाहे पहुँचता रहा है। मुझे उनकी किताब औरत : ज़िन्दगी का ज़िन्दाँख़ास तौर पर बहुत पसंद है। उस किताब को उर्दू में The Second Sex जैसा दर्जा हासिल होना चाहिए। बहरहाल उनकी एक कहानी, जो मेरे ख़याल में इससे पहले हिंदी में नहीं आई है, यहाँ पेश की जा रही है। इस कहानी में रियासत की मुजरिम एक ऐसी औरत के वक़ार को ज़ाहिदा हिना ने काग़ज़ पर उतारा है, जिसे पता है कि उसको मौत की सज़ा दी जा चुकी है, उसका शौहर पहले ही जेल की सख़्तियों को झेल कर दुनिया से जा चुका है और उसके साथ उसकी एक नन्ही सी औलाद भी है, फिर भी उसने ख़ुद को कमज़ोर पड़ने से बचा लिया है। कहानी की फ़िज़ा बहुत संजीदा है और बेहद नाज़ुक लम्हों को समेटते हुए इस मुख़्तसर अफ़साने में कई जगह इंसान की बे-रहमी, बुज़दिली और लाचारी पर सवालों के साए मंडराते हुए महसूस किये जा सकते हैं।

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