हुसैन आबिद की नज़्में

अवाइलबहार का इज़्तिराब

 

बारिश से भीगे रस्ते पर
जहाँ चेरी के शगूफ़े
पत्ती-पत्ती बिखर गए हैं
मैं अपने आप में गुम चलता हूँ
इर्द-गिर्द
तितलियों की परवाज़ में तुम्हारी चाप है
शहद की मक्खियों की धीमी गुनगुनाहट से
तुम्हारे लहजे का रस टपकता है
पेड़ों के भीगे तने तुम्हारी ओट हैं
लेकिन मैं जानता हूँ
तुम यहाँ नहीं हो
मेरे अंदर दूर-दूर तक
मौसमों के तग़य्युर से बेनियाज़
तुम्हारा चेहरा दमकता है
लेकिन मैं जानता हूँ
तुम यहाँ नहीं हो
यहाँ सिर्फ़ मेरा दिल है
मुज़्तरिब
कि जब तुम इस रस्ते पर आओ
तो शिद्दत-ए-इंतिज़ार से झुकती एक टहनी पर
एक चेरी पूरी तरह पक चुकी हो

٠٠٠

 

एक लम्हा काफ़ी है

 

किसी अजनबी, नीम-वा दरीचे से खनकती
हंसी पर ठिठकते
महबूब आँखों में झाँकते
पकी ख़ुशबू
और मासूम आवाज़ों के शोर में
बदन से दिन की मशक़्क़त धोते
या खुले, वसीअ मैदान में बहती
नदी के साथ चलते
जिस के किनारों की घास
पानी में डूब रही हो
वक़्त की धड़कती थैली में पड़ा
अबदी मुसर्रत का लम्हा
जो सारे मसामों से फूट निकले
एक गहरे दोस्त जैसा
जो कभी जुदा न हो
एक जुगनू जैसा
जो गम्भीर रात में चलते
अचानक तुम्हारे सामने आ निकले
एक लम्हा काफ़ी है

٠٠٠

 

बे लफ़्ज़ी का ख़ौफ़

 

लफ़्ज़ मुझ से रूठ गए हैं
या वो मानी की तलाश में चले गए हैं
रूठा हुआ लफ़्ज़ ज़ियादा दूर नहीं जा सकता
मानी का हमल सँभाले
उसकी साँस फूल सकती है
वो कहीं भी बैठ सकता है
किसी नीम-तारीक गली के मोड़ पर
दिन के सूर से मुतवह्हिश
दफ़्तरों, कारख़ानों, इबादत-गाहों में
पनाह लेती ख़िलक़त के बीचों-बीच
बचे-खुचे खेतों के पार
मादूम होते दरिया से पहले
आख़िरी पेड़ के नीचे
मानी से लबरेज़ हाँपते लफ़्ज़ को
कोई भी अग़वा कर सकता है
दुनिया बेमानी लोगों से भरी पड़ी है
मुझे फौरन उसकी तलाश में जाना चाहिये
मगर मैं ख़ौफ़ज़दा हूँ
अगर मेरे लफ़्ज़ मअनी की तलाश में गए हैं
तो क्या वापसी पर वो मुझे ढूँढ पाएँगे

٠٠٠

 

भैंसे का ख़ुदा

 

हम्द उसकी जो रौंद देता है
मिट्टी, रेत, ख़ारदार मैदान
दहला देता है टीलों के दिल
क़वी सुमों की धमक से
फाड़ देता है रक़ीब की पेशानी
अपनी अज़ीम टक्कर से
जिसके सींग शश-जिहत में फैले हैं
चमकीली अनियों में
ऐसे रहम-ए-मादर पिरोए
जिन में रक़ीब का जनीन पल सकता

आफ़ाक़ की सुर्ख़ी से लबरेज़
उसकी आँख
मादाओं की पुश्तें घेरे रहती है

भिन-भिन, भिन-भिन
मक्खियाँ घुस आती हैं
हर सुराख़ में
उनका काटा अपनी मोटी खाल पे लिखता हूँ
मगर ख़ुदा-वंद
उनकी भिन-भिन मेरी हम्द को छलनी कर देती है

٠٠٠

 

जेट सेट और लफ़ंगा तोता

 

कंधों और सरों पर पाँव रखता
कामयाबी के उफ़ुक़ पर चढ़ता
वो फिर गिर जाता है
तारीक रौशनी के ख़ला में
जो उसका दिल है

वो सूरज निकलने की दुआ माँगती है
जगमगाती रात में रक़्साँ लोगों के बीच
क़हक़हे लगाती
सर्द पैरों पर डगमगाती
अपने ज़र्क़-बर्क़ बजरे के अर्शे पर

वो एक बोलता तोता ले आए हैं
अपनी ख़्वाब-गाह के लिये
और जब वो मुब्तिला होते हैं
बे-लुत्फ़ हम-बिस्तरी में
तो वो उन पर लचर फ़िक़रे कसता है
और गालियाँ देता है अपनी दुरुश्त आवाज़ में
और जब वो मूंद लेते हैं थकी हुई आँखें
मुआहिदाती मशक़्क़त से उकता कर
तो वो उनकी ख़्वाबों से ख़ाली नींद
भर देता है
अपनी बदबू-दार बीटों से

٠٠٠

 

फिर कोई पेड़

 

बैठे-बैठे रस्ते निकल आते हैं
चलते-चलते गुम जाते हैं
फिर कोई पेड़ निकल आता है
जिस के नीचे बैठ के हम
गुम रस्ते दोहराते हैं
लम्हा भर सुस्ताते हैं
बैठे-बैठे रस्ते निकल आते हैं

٠٠٠

 

दरख़्त और लाइट हाउस

 

सितारे आसमान पर हैं
ज़मीन पर पानी
बीच में रात तनी है
मेरे जज़ीरे से
तुम्हारे जज़ीरे तक

यहाँ एक पेड़ है
जिस से मैं टेक लगाए बैठा हूँ
और जिसे कश्ती बनाने के मंसूबे बाँधता हूँ
लेकिन वो दिन में गुम हो जाता है
दिन में मुझे अपनी पुश्त पर
दीमक का ढेर मिलता है

महबूब औरत
क्या तुम अपने दिल के लाइट हाउस की
एक मज़बूत शुआ
इधर मर्कूज़ रख सकती हो
ताकि मैं रात में कश्ती बना सकूँ

٠٠٠

 

पेशवा बेसवा है

 

मुनाजात के ख़मीर से
दिन मीठी दही नहीं बनता
फट जाता है
फटे दिन की लस्सी
रात की रानों से बहती है
जरसूमे जनती है

वो
जो इन्कार की मशाल चूमते हैं
होंट जला लेते हैं लेकिन
पेशानी पर-दाग़ नहीं पड़ने देते
तुम्हारे सज्दे हमें ले डूबेंगे
मैंने ख़ुदा को मरते देखा है
जवान और नंगा
गोलियों, थप्पड़ों, घूंसों, लातों, गालियों की यलग़ार में

एक औरत यहाँ खड़ी है
फटे दिन को ठोकर मारती
और उस का मर्द
सच के ख़मीर से लबा-लब भरा

٠٠٠

 

मैं किसी जज़ीरे पर नहीं जाना चाहता

 

इस सर्द शाम में
दुनिया कितनी मसरूफ़ है
बातें करने में
तेज़-तेज़ चलने में
ख़ुशियाँ ढोने में
ग़म धोने में
सर्द हाथों से कोई
ग़म कैसे धो सकता है
मुझे सार्त्र और ग़ालिब से कुछ कहना सुनना नहीं
तारक्वोस्की, ऑलिवर स्टोन
और तल्ख़ चाँद के ख़ालिक़ पोलांस्की को
मैं कमरे से निकाल चुका हूँ
कास्त्रो मर चुका है
मैं किसी जज़ीरे पर नहीं जाना चाहता
मैं कहीं नहीं जाना चाहता
तुम्हारी तलब की अँगीठी पर
हाथ तापते
मैं कहाँ जा सकता हूँ
दुनिया कितनी मसरूफ़ है
बातें करने में
तेज़-तेज़ चलने में
ख़ुशियां ढोने में
ग़म धोने में
सर्द हाथों से कोई
ग़म कैसे धो सकता है

٠٠٠

 

सीधी बारिश में खड़ा आदमी

 

बारिश बहुत है
वो टीन की छत को छेदती
दिमाग़ के गूदे में
और दिल के पर्दों में
छेद करती
पैरों की सूखी हड्डियाँ छेद रही है
मैं चाहता हूँ
छत पे जा कर लेट जाऊँ
और सुराख़ों को
छलनी वुजूद के बोझ से
बंद कर दूँ
मगर
सीधी बारिश की मेख़ों ने
पाँव
बहते फ़र्श में गाड़ दिये हैं

٠٠٠

 

तपस्या की इब्तिदा

 

नदी वही है
पानी वैसा ही उजला है
अब मैं आग जलाता हूँ
दुश्मन
मेरे दिल से बाहर आ
गुम हो जा
दुश्मन गुम हो जा
भागती बर्क़ी गाड़ी की
खिड़की तोड़ के कूद गया हूँ खेतों में
अब मैं आग जलाता हूँ

٠٠٠

 

हुसैन आबिद पाकिस्तान से तअल्लुक़ रखने वाले उर्दू के शायर हैं, वो कई वर्षों से जर्मनी में रह रहे हैं. संगीत की दुनिया से वाबस्ता हैं और शायरी भी करते हैं. अब तक उनकी नज़्मों की चार किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें धुंधलाए दिन की हिद्दत‘, ‘क़हक़हा इंसान ने ईजाद किया‘, ‘काग़ज़ पे बनी धूपऔर बहते अक्स का बुलावाशामिल हैं.

हुसैन आबिद के बारे में साक़ी फ़ारूक़ी अहम शायर का कहना है कि उनकी नज़्में बहुत ताक़तवर हैं और उनके यहाँ ज़िन्दगी की ताज़ा हवा के झोंके हैं. हुसैन आबिद को पढ़ते हुए महसूस होता है कि कोई धीमे लहजे में ज़िन्दगी के नक़्श बनाने के साथ साथ समाज की फ़र्सूदा और थकी हुई सोच का विरोध भी कर रहा हो. ये नज़्में ज़रा ग़ौर से पढ़े जाने का तक़ाज़ा करती हैं.